प्रदर्शनों के दौरान हुए नुकसान की भरपाई के लिए हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने कानून बनाये :

जन प्रदर्शनों को कुचलने के लिए कानून

प्रदर्शनों के दौरान हुए नुकसान की भरपाई के लिए हरियाणा विधानसभा ने 18 मार्च, 2021 को एक विधेयक पारित किया। विपक्षी पार्टियों के सदस्यों द्वारा इन पर सवाल उठाये जाने के बावजूद यह विधेयक पारित हो गया।

सार्वजनिक व्यवस्था में गड़बड़ी के दौरान संपत्ति के नुकसान की भरपाई वसूली विधेयक-2021 राज्य प्रशासन को अधिकार देता है कि वह “दंगों और हिंसक घटनाओं सहित, प्रदर्शनों के दौरान, सार्वजनिक और निजी संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई करने” की मांग कर सकता है।

इस विधेयक में दावा अधिकरण (क्लेम ट्रिब्यूनल) के गठन का प्रावधान किया गया है, जो नुकसान का अनुमान लगाएगा और नुकसान के लिए ज़िम्मेदार व्यक्तियों की पहचान करेगा, जिन पर जुर्माना लगाया जायेगा। इस विधेयक के अनुसार, दावा अधिकरण के तहत की गयी कार्यवाही को न्यायिक कार्यवाही माना जायेगा। इस दावा अधिकरण को यह भी अधिकार दिया गया है कि वह किसी भी व्यक्ति के ख़िलाफ़ उसकी गैर-मौजूदगी में सज़ा सुना सकता है, यदि वह सूचित किए जाने के बावजूद हाजिर नहीं होता है।

यह विधेयक जिला कलेक्टर को किसी भी व्यक्ति की संपत्ति या बैंक खाते को संलग्न करने का अधिकार देता है, जिसके ख़िलाफ़ दावा अधिकरण ने आदेश सुनाया है। इसके अलावा, किसी भी अदालत को इस कानून के तहत तय किये गए हर्जाने की रकम के ख़िलाफ़ सवाल उठाने या आदेश पारित करने का अधिकार नहीं होगा।

यह विधेयक ऐसे समय पर पारित किया गया है, जब पंजाब व अन्य राज्यों के किसानों के साथ हरियाणा के लाखों किसान पिछले 3 महीने से दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन पर रहे हैं। वे मांग कर रहे हैं कि केंद्र सरकार किसान-विरोधी कानूनों को रद्द करे और उनकी सभी फ़सलों के लिए लाभकारी मूल्य पर ख़रीदी की गारंटी दे। केंद्र सरकार के साथ सांठगांठ में हरियाणा सरकार ने किसानों के विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के लिए दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन के स्थानों पर सड़कों में गहरे गड्ढे खोद दिए हैं, नुकीली कीलें गाड़ दी हंै और कंटीले तार लगा दिये हैं। इन सभी कठिनाइयों का सामना करते हुए किसान अपने संघर्ष में डटे हुए हैं।

इस विधेयक को पारित करते हुए अपने संबोधन में हरियाणा के मुख्यमंत्री ने खुद अपनी ही जुबान से इसके असली मक़सद का भी पर्दाफाश कर दिया। विधेयक को सही बताते हुए उन्होंने कहा कि इसका मक़सद उन लोगों के दिलों में “ख़ौफ पैदा” करना है जो राज्य के जन-विरोधी क़दमों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं।

इसी तरह से संसदीय विरोधियों को नज़रंदाज करते हुए 2 मार्च, 2021 को उत्तर प्रदेश विधानसभा ने भी ऐसा ही एक विधेयक पारित किया जिसके तहत सार्वजनिक और निजी संपत्ति को हुए नुकसान की वसूली प्रदर्शनकारियों से की जाएगी।

उत्तर प्रदेश सार्वजनिक और निजी संपत्ति नुकसान वसूली विधेयक-2021 के अनुसार, जो भी प्रदर्शनकारी सरकारी या निजी संपत्ति को नुकसान करते हुए पाया जायेगा, उसे 1 साल की सज़ा काटनी होगी या 5000 से 1 लाख रुपये का जुर्माना देना होगा। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश विधानसभा ने उत्तर प्रदेश गुंडा (संशोधन) विधेयक-2021 भी पारित किया है। यह विधेयक पुलिस के संयुक्त और डिप्टी कमिश्नर को अधिकार देता है कि वह किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन को “आपराधिक कार्यवाही” घोषित कर सकता है।

मार्च 2020 में उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रीमंडल ने “राजनीतिक कार्यक्रमों के दौरान सरकारी और निजी संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई करवाने” के नाम पर, “उत्तर प्रदेश सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान की वसूली अध्यादेश-2020” को मंजूरी दी थी। यह उस समय किया गया जब सरकार द्वारा लोगों के बीच धर्म के आधार पर भेदभाव करने और सांप्रदायिक हिंसा और नफ़रत फैलाने के ख़िलाफ़ लाखों महिलाएं और नौजवान सी.ए.ए.-विरोधी प्रदर्शनों में सड़कों पर उतर आये थे। दिल्ली, लखनऊ, अलीगढ़, कानपुर सहित देशभर में कई शहरों में हजारों महिलाएं और नौजवान शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में हिस्सा ले रहे थे। अब उसी अध्यादेश को कानून बनाया गया है।

उस अध्यादेश से पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने लोगों पर बर्बर हमले किये। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों को बदनाम करने के लिए राज्य प्रशासन ने लोगों को उकसाने की कोशिश की और अराजकता और हिंसा आयोजित की। नौजवानों और छात्रों को धमकियां दी गयीं और लोगों को बदनाम करने की कोशिश में उनके नाम और फोटो को सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित किया गया।

ये दोनों ही विधेयक हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया के संपूर्ण गैर-जनतांत्रिक और जन-विरोधी चरित्र का पर्दाफाश करते हैं जो केवल सबसे बड़े इजारेदार पूंजीपतियों के हितों की सेवा करते हैं सरकार को इन इजारेदार पूंजीवादी घरानों के राज के ख़िलाफ़ उठती हर एक आवाज़ को कुचलने का काम दिया गया है। यू.ए.पी.ए. के अलावा हमारे देश में ऐसे कई कानून हैं जो “सार्वजनिक सुरक्षा”, इत्यादि के नाम पर जन-प्रदर्शनों को आपराधिक कार्यवाही करार देते हैं और इन्हें आयोजित करने वालों को सज़ा देते हैं। ये विधेयक राज्य प्रशासन के हाथों में सबसे नए हथियार हैं, जिनसे न्याय और अपने अधिकारों की हिफ़ाज़त में खड़े होने वाले मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों को आतंकित किया जायेगा।

यह सर्व-विदित है कि राज्य और उसकी एजेंसियां खुद ही लोगों के बीच भड़काऊ कार्यवाही, अराजकता और हिंसा आयोजित करते हंै, ताकि लोगों के संघर्षों को बदनाम किया जा सके और उनके ख़िलाफ़ किये जा रहे दमन को जायज़ ठहराया जा सके। लोगों के तमाम तरह के विरोध प्रदर्शनों को वे अक्सर “राजद्रोही”, “राष्ट्र-विरोधी” और “देश की एकता और अखंडता को ख़तरा”, करार देते हैं ताकि उन्हें वहशी दमन के ज़रिये कुचले जाने को जायज़ ठहराया जा सके।

ये विधेयक क्रूर बर्तानवी बस्तीवादी तरीकों की याद दिलाते हैं, जहां “संपत्ति का नुकसान” के नाम पर पूरे गांव और समुदाय पर सामुदायिक जुर्माना लगाया जाता था, जब लोग बस्तीवादी हुक्मरानों की नाइंसाफी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत करते थे। यह एक बार फिर दिखाता है कि बर्तानवी बस्तीवादी राज्य की ही तरह, मौजूदा हिन्दोस्तानी राज्य भी अपने ही देश के लोगों के साथ अपराधियों जैसा बर्ताव करता है। यह हिन्दोस्तानी राज्य सबसे बड़े इजारेदार पूंजीवादी घरानों के राज की हिफ़ाज़त करने के लिए हर प्रकार के विरोध प्रदर्शन और असहमति को आपराधिक कार्यवाही करार देता है और मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों को बर्बरता से कुचलता है, जो अपने अधिकारों की हिफ़ाज़त में एकजुट हो रहे हैं और सड़कों पर उतर रहे हैं।

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