भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत की 90वीं सालगिरह पर:

शहीदों की पुकार

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 20 मार्च, 2021

इस वर्ष के 23 मार्च को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत की 90वीं सालगिरह है। अंग्रेज हुक्मरानों ने 1931 में, इस दिन पर, उन तीन नौजवानों को फांसी की सजा दी थी, क्योंकि उन्होंने बस्तीवादी व्यवस्था का पूरी तरह तख्तापलट करने के लिए अडिग संघर्ष किया था। उन्हें ‘ख़तरनाक आतंकवादी’ करार दिया गया था और उन्हें मौत की सज़ा दी गयी थी।

अंग्रेज हुक्मरानों ने सैकड़ों-सैकड़ों देशभक्त और क्रान्तिकारी हिन्दोस्तानियों को जेलों में बंद कर दिया या फांसी पर चढ़ा दिया था। इनमें शामिल थे 1857 के वीर, हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी के सदस्य और अनगिनत ऐसे लोग, जिन्होंने हिन्दोस्तानी लोगों को हर प्रकार के शोषण और दमन से मुक्त कराने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था।

आज लाखों-लाखों मज़दूर, किसान, महिला और नौजवान सड़कों पर उतरकर विरोध कर रहे हैं। वे सब अपनी रोजी-रोटी और अधिकारों पर हमलों का विरोध कर रहे हैं। वे जातिवादी भेदभाव और महिलाओं पर अत्याचार का विरोध कर रहे हैं। वे धर्म के आधार पर भेदभाव और देश के अन्दर बसे विभिन्न राष्ट्रीयताओं के लोगों के उत्पीड़न का विरोध कर रहे हैं। वे सब उस शोषण-मुक्त हिन्दोस्तान की स्थापना करने के प्रयास कर रहे हैं, जिसके लिए हमारे शहीदों ने अपनी जानें कुर्बान की थीं।

हिन्दोस्तानी गणराज्य, जो खुद को स्वतंत्र और लोकतांत्रिक बताता है, वह अपनी जनता के साथ उसी वहशी तरीके से बर्ताव करता है, जैसा कि अंग्रेजों का राज करता था। जो भी अपने अधिकारों की मांग करते हैं, जो भी नाइंसाफी के ख़िलाफ़ अपनी आवाज उठाते हैं, उन्हें राष्ट्र-विरोधी करार दिया जाता है। उन पर राज-द्रोह का आरोप लगाया जाता है, उन्हें जेलों में बंद कर दिया जाता है और उन्हें जमानत देने से इंकार किया जाता है।

गणतंत्र दिवस पर जो घटनाएं हुईं, उनका बहाना बनाकर, किसान आन्दोलन के भागीदारों पर भयानक दमन किया जा रहा है। बड़े पैमाने पर लोगों को गिरफ़्तार किया जाना, उन पर झूठे मामले दर्ज किये जाने, दिल्ली की सीमाओं पर सुरक्षा बलों की भारी तैनाती, कांटेदार तार के बेड़े लगाये जाने और इंटरनेट कनेक्शन काट दिया जाना – इस प्रकार के बहुत सारे दमनकारी कदम उठाये गए हैं। लोगों को गिरफ़्तार करने में पुलिस की मदद करने वालों के लिए लाखों-लाखों रुपयों के इनाम घोषित किये जा रहे हैं। इस राजकीय आतंकवाद के साथ-साथ, टीवी और सोशल मीडिया पर दिन-रात झूठा प्रचार किया जा रहा है कि ट्रेक्टर रैली में भाग लेने वाले लोग अपराधी और आतंकवादी हैं।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी यह मानती है कि किसान आन्दोलन के भागीदारों को गिरफ्तार करना पूरी तरह नाजायज़ है। 26 जनवरी के दिन जो भी घटनाएं हुईं, उनके लिए केंद्र सरकार को जवाब देना होगा। आंखो-देखा हाल और दूसरे तथ्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि उन घटनाओं के लिए केंद्र सरकार ही जिम्मेदार थी, न कि प्रदर्शनकारी किसान।
किसान आन्दोलन की मांगें – कि पूंजीवाद-परस्त कानूनों को रद्द किया जाये और सभी फ़सलों के लिए लाभकारी दामों पर सरकारी खरीदी सुनिश्चित की जाये – ये पूरी तरह जायज़ हैं। केंद्र सरकार किसानों की सुरक्षित रोजी-रोटी के अधिकार को छीन रही है। केंद्र सरकार किसानों की जायज आर्थिक और राजनीतिक मांगों के लिए संघर्ष को “कानून-व्यवस्था की समस्या” बता रही है।

इस हालत में किसानों और मज़दूरों के सारे संगठनों को मिलकर अपनी आवाज उठानी चाहिए। हमें यह मांग करनी चाहिए कि किसान आन्दोलन के जिन सारे कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया है, उन्हें फौरन रिहा कर दिया जाये। देश भर में किसान आन्दोलन के कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ दर्ज किये गए सभी मामलों और उनकी गिरफ़्तारी के लिए जारी किये गए सारे वारंटों को वापस लिया जाये। हमें यह मांग करनी होगी कि केंद्र सरकार तीनों किसान-विरोधी कानूनों को रद्द करे और सभी फसलों के लिए लाभकारी दामों पर सरकारी खरीदी सुनिश्चित करे।

साथियों और दोस्तों,

शहीद भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत को याद करना तभी सार्थक होगा अगर हम उनके दिखाए गए रास्ते पर आगे बढ़ते हैं। उनका रास्ता था हिन्दोस्तान की भूमि और श्रम की लूट और शोषण का डटकर विरोध करना। उनके संघर्ष का मकसद था बस्तीवादी राज को जड़ से उखाड़ फेंकना और एक नए राज्य की स्थापना करना, एक ऐसे हिन्दोस्तान की स्थापना करना जिसमें इंसान द्वारा इंसान का शोषण नहीं होगा और राष्ट्रों व लोगों का दमन नहीं होगा।

हमें अपने क्रन्तिकारी शहीदों के इन शब्दों को याद रखना होगा:

“हमारा संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक कुछ मुट्ठीभर लोग, देशी या विदेशी या दोनों का गठबंधन, हमारी जनता के श्रम और संसाधनों का शोषण करते रहेंगे। हमें इस रास्ते से कोई नहीं हटा सकता”।

हिन्दोस्तान को 1947 में राजनीतिक आजादी मिली, परन्तु वर्ग-शोषण, दमन और जातिवादी भेदभाव से मुक्ति के रास्ते को बंद कर दिया गया है। बीते 73 से अधिक सालों से इजारेदार कॉर्पोरेट घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग, अपने भरोसेमंद राजनीतिक पार्टियों के सहारे, हमारे ऊपर राज करता आ रहा है।

हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों ने आजाद हिन्दोस्तान के श्रम और संसाधनों का शोषण जारी रखने के लिए विदेशी पूंजीपतियों के साथ गठबंधन बना रखा है। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा स्थापित की गयी शोषण-लूट की व्यवस्था को जारी रखा है और उसे विकसित किया है। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा स्थापित की गयी राजनीतिक व्यवस्था को कायम रखा है, जिसका उद्देश्य है मेहनतकश जनसमुदाय को सत्ता से बाहर रखना। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा स्थापित की गयी न्याय व्यवस्था को बरकरार रखा है, जिसके अनुसार शोषण-दमन का विरोध करना अपराध माना जाता है।

पूंजीपति वर्ग ने कांग्रेस पार्टी और भाजपा जैसी अपनी राजनीतिक पार्टियां तैयार कर रखी हैं, जो बारी-बारी से सरकार में आकर, पूंजीपतियों के जन-विरोधी कार्यक्रम को लागू करती हैं। मुट्ठीभर शोषक धोखा-धड़ी, भटकाववादी हरकतों, सांप्रदायिक बंटवारे और मजदूरों, किसानों व सभी दबे-कुचले लोगों को बेरहमी से दबाकर शासन करते हैं।

भाजपा कांग्रेस पार्टी की भूतपूर्व सरकारों को बेरोजगारी, गरीबी, किसानों की घटती आमदनी और सभी समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार बताती है। भाजपा “इस्लामी कट्टरपंथियों”, खालिस्तानियों और कम्युनिस्टों को हिन्दोस्तान के विकास को रोकने के लिए ज़िम्मेदार बताती है। वह अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों को राष्ट्र-विरोधी बताती है। वह हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ाने के लिए मजदूरों और किसानों पर एक से बढ़कर एक हमला करती जा रही है।

कांग्रेस पार्टी कह रही है कि भाजपा और उसके शासन करने के तौर-तरीके ही सारी समस्याओं के कारण हैं। कांग्रेस पार्टी का कहना है कि आज हमारे सामने सबसे बड़ा ख़तरा “हिंदुत्व फासीवाद” है। कांग्रेस पार्टी इस बात को छुपा रही है कि उसने भी कई दशकों तक इजारेदार पूंजीवादी घरानों के कार्यक्रम को लागू करने का काम किया है। कांग्रेस पार्टी “सिख उग्रवाद” के खिलाफ लड़ने के नाम पर राजकीय आतंकवाद और सांप्रदायिक कत्लेआम आयोजित करने के अपने काले कारनामों को लोगों के मन से मिटा देना चाहती है।

हमारी समस्याओं की जड़ लोगों के अलग-अलग विचारों या आस्थाओं में नहीं है। हमारी समस्याओं की जड़ मुट्ठीभर शोषकों की हुकूमत है, जो हमारे आपसी भेदभावों का इस्तेमाल करके, सांप्रदायिक झगड़े भड़काती है और इस तरह अपनी हुकूमत को बरकरार रखती है।

हमारा संघर्ष न तो हिन्दुओं और मुसलामानों के बीच में है और न ही सिखों और कम्युनिस्टों के बीच में। असली संघर्ष तो शोषकों और शोषितों के बीच में है। इस संघर्ष में, पूंजीपति वर्ग एक पक्ष में है और मजदूर, किसान तथा सभी उत्पीड़ित लोग दूसरे पक्ष में। हम चाहे हिन्दू हों या मुसलमान, सिख, ईसाई, जैन या बौद्ध या नास्तिक, हम सब पूंजीपति वर्ग की इस दमनकारी हुकूमत के खिलाफ, मजदूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों के एक संघर्ष के हिस्से हैं।

टाटा, अंबानी, बिरला, अदानी और कई दूसरे इजारेदार कॉर्पोरेट घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग आज समाज के सर्वोच्च फैसले लेता है। इजारेदार पूंजीवादी घराने अपनी इस ताकत का इस्तेमाल करके, अपनी दौलत को बढ़ाते रहते हैं और दुनिया के दूसरे इजारेदार पूंजीपतियों के साथ स्पर्धा करते रहते हैं। वे चुनावों के जरिये अपनी पसंद की पार्टी को सरकार चलाने का काम-काज सौंपती हैं।

भाजपा और कांग्रेस पार्टी, दोनों एक ही वर्ग के हितों की सेवा करती हैं। पूंजीपति वर्ग की “बांटो और राज करो” की रणनीति में ये दोनों पार्टियां एक-दूसरे की सहायक भूमिकाएं अदा करती हैं।

जो ऐसा दावा करते हैं कि भाजपा को सरकार से हटाकर और कांग्रेस पार्टी या दूसरी प्रांतीय पार्टियों के किसी गठबंधन की सरकार बनाकर मजदूरों और किसानों की समस्याएं हल हो जायेंगी, वे लोगों को धोखा दे रहे हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि चुनाव के जरिये पूंजीपति वर्ग की किसी एक पार्टी को सरकार से हटाकर किसी दूसरी पार्टी की सरकार बनाने से न तो राजनीतिक सत्ता का चरित्र बदलता है और न ही अर्थव्यवस्था की दिशा। इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग द्वारा तय किया हुआ कार्यक्रम ही लागू होता है।

शहीद भगत सिंह और उनके साथियों ने अंग्रेज हुक्मरानों द्वारा स्थापित राजनीतिक व्यवस्था को ठुकरा दिया था। उन्होंने यह समझ लिया था कि अंग्रेजों द्वारा स्थापित संस्थानों और कानूनों के जरिये हिन्दोस्तानी समाज का उद्धार नहीं हो सकता है। उन्होंने क्रान्तिकारी परिवर्तन की जरूरत को समझ लिया था और उसी आधार पर उन्होंने अपना संघर्ष किया था। उनके संघर्ष का लक्ष्य था एक ऐसे नए राज्य और व्यवस्था की स्थापना करना जिसमें सब को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित हो।

वर्तमान संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था पर भरोसा करने वाले और इसी व्यवस्था के अन्दर सारी समस्याओं के समाधान के बारे में भ्रम फैलाने वाले लोग हमारे क्रान्तिकारी शहीदों के रास्ते पर नहीं चल रहे हैं। यह हो सकता है कि हर साल 23 मार्च पर वे शहीद भगत सिंह और उनके साथियों का गुणगान करते हों, उनकी तस्वीरों पर फूल मालाएं चढ़ाते हों। परन्तु पूंजीवादी लोकतंत्र की व्यवस्था के सामने घुटने टेक कर, वे इन शहीदों की याद का घोर अपमान कर रहे हैं।

असली समाधान है पूंजीपति वर्ग की हुकूमत को ख़त्म करना और उसकी जगह पर मज़दूर-किसान का राज स्थापित करना। वर्तमान राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था के साथ पूरी तरह से नाता तोड़ना होगा। हमें एक ऐसे नए राज्य और व्यवस्था की नींव डालनी होगी, जिसमें हम – मज़दूर, किसान, महिलाएं और नौजवान – कानून बनायेंगे और सरकारी नीतियों के बारे में फैसले लेंगे। हमें एक ऐसे नए हिन्दोस्तानी संघ की जरूरत है जिसमें हरेक घटक राष्ट्र के राष्ट्रीय अधिकारों को मान्यता दी जायेगी और समाज के सभी सदस्यों के मानव अधिकारों व जनवादी अधिकारों का आदर किया जायेगा। हमें सब को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करने की नयी दिशा में अर्थव्यवस्था को चलाना होगा, न कि इजारेदार पूंजीपतियों के मुनाफों को बढ़ाने की वर्तमान दिशा में।

शहीदी दिवस 2021 के अवसर पर, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी अपने अधिकारों की हिफाजत में बहादुरी से संघर्ष कर रहे मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों को सलाम करती है। आइये, अपने देश में पूंजीपतियों की हुकूमत को खत्म करने और मजदूर-किसान का राज स्थापित करने के अपूर्ण कार्य को पूरा करें!

आइये, उस नए हिन्दोस्तान का निर्माण करें, जिसके लिए हमारे शहीदों ने संघर्ष किया था और अपनी जानों की क़ुर्बानी दी थी!

हम हैं इसके मालिक, हम हैं हिन्दोस्तान,
मज़दूर, किसान, औरत और जवान!

इंकलाब ज़िन्दाबाद!

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