दिल्ली के महिला संगठनों ने मिलकर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया

सैकड़ों महिलाएं, पुरुष और नौजवान 8 मार्च, 2021 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने के लिए नयी दिल्ली के जंतर-मंतर पर एकत्रित हुए।

मंच को एक बहुत ही उत्साहकारी बैनर के साथ सजाया गया था, जिस पर दिल्ली की सीमाओं पर संघर्ष कर रही लाखों-लाखों किसान बहनों की तस्वीर बनी हुयी थी। “किसान-मज़दूर-महिला, 8 मार्च, साथ मार्च!”, यह नारा बैनर पर लिखा हुआ था। सहभागी संगठनों के बैनरों से आस-पास की दीवारें सजाई गयी थीं, जिन पर महिलाओं के संघर्षों की मुख्य मांगों के नारे इस प्रकार थे – “तीनों किसान-विरोधी कानूनों को रद्द करो!”, “एम.एस.पी. सुनिश्चित करो!”, “हमारे अधिकारों पर हमले मुर्दाबाद!”, “चारों लेबर कोड रद्द करो!”, “महिलाओं पर बढ़ती हिंसा मुर्दाबाद!”, “समान काम के लिए समान वेतन!”, “महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करो!”, “शासन-सत्ता अपने हाथ, जुल्म-अन्याय करें समाप्त!”, इत्यादि।

सभा की शुरुआत में उन लाखों-लाखों किसान बहनों और भाइयों को सलाम किया गया, जो तीन महीनों से अडिग रहकर, राज्य के दमन का सामना कर रहे हैं और यह मांग रहे हैं कि उनकी ज़िंदगी को तबाह कर देने वाले कानूनों को रद्द किया जाये। उन सैकड़ों लोगों को भी सलाम किया गया, जो दबी-कुचली जनता के अधिकारों की हिफ़ाज़त में अपनी आवाज़ उठाने के लिए गिरफ़्तार हुए हैं और राज्य के उत्पीड़न को झेल रहे हैं। कश्मीर में राज्य के हाथों अमानवीय अत्याचार और असम्मान का सामना करने वाली हमारी बहनों और भाइयों के साथ भाईचारा प्रकट किया गया। एक मिनट का मौन रखा गया उन किसानों की याद में जो इस आन्दोलन के चलते अपनी जान की कुरबानी दे चुके हैं और उन अनेक शहीदों की याद में जो दबे-कुचले लोगों के लिए लड़ते हुए राज्य के दमन के शिकार बन गए हैं।

जाने-माने शायर और राजनीतिक कार्यकर्ता, गौहर रजा ने बहादुर किसानों के संघर्ष के समर्थन में और अपने हक़ों व सम्मान के लिए लड़ रही महिलाओं के समर्थन में कुछ स्व-रचित कवितायें पेश कीं।

उसके बाद सहभागी संगठनों के प्रतिनिधियों ने सभा को संबोधित किया।

वक्ताओं ने सबको याद दिलाया कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस नाइंसाफी और दमन के खि़लाफ़ महिलाओं के संघर्ष की परंपरा का प्रतीक है, जबकि हमारे हुक्मरान इस बात को भुलाने की बहुत कोशिश करते हैं। महिलाओं पर हो रहे तरह-तरह के हमलों की कड़ी निंदा की गयी – किसान महिलाओं को 100 दिनों तक बाहर बैठ कर विरोध करने को मजबूर करना, रोज़गार की बढ़ती असुरक्षा, महिला मज़दूरों के अधिकारों पर हमले, क़ीमती राष्ट्रीय संसाधनों का बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों को बेचा जाना, शिक्षा, स्वास्थ्य और जन-परिवहन जैसी आवश्यक सेवाओं का निजीकरण, अपना जीवन साथी चुनने की महिलाओं की आज़ादी और अन्य आज़ादियों पर हमले, राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और आतंक, धर्म के आधार पर हमें बांटने की कोशिशें, दलित महिलाओं पर जातिवादी हमले, महिलाओं का बलात्कार और हत्या, अन्याय के खि़लाफ़ आवाज़ उठाने वाली महिलाओं को जेलों में बंद किया जाना और प्रताड़ित किया जाना, आदि। इन सारे संघर्षों में महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलकर, आगे आ रही हैं।

वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि सरकार बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों की सेवा में काम कर रही है, लोगों के हित के लिए नहीं। महिलाओं के जनवादी अधिकारों पर हमलों, विरोध करने, अपना विचार प्रकट करने और अपना भविष्य तय करने के अधिकारों पर हमलों की निंदा की गयी। अपने अधिकारों की हिफ़ाज़त के लिए महिलाओं को संगठित होना होगा, इस पर ज़ोर दिया गया। वक्ताओं ने महिलाओं से आह्वान किया कि मज़दूर बतौर, किसान बतौर, नौजवान बतौर, पुरुषों के साथ मिलकर, एक नए समाज, शोषण और अन्याय से मुक्त समाज के निर्माण के लिए संघर्ष करें।

इस कार्यक्रम में भाग लेने वाले संगठन थे एडवा, एन.एफ.आई.डब्ल्यू., पुरोगामी महिला संगठन, सी.एस.डब्ल्यू., एपवा, ए.आई.एम.एस.एस. और स्वास्तिक महिला संगठन। एक महिला वकील ने सामाजिक पिछड़ेपन के खि़लाफ़ संघर्ष पर ज़ोर दिया। महिलाओं के संघर्षों के समर्थन में कवितायें, गीत और एक नुक्कड़ नाटक पेश किये गए।

“अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ज़िंदाबाद!”, “आवाज़ दो हम एक हैं!”, “लड़ेंगे, जीतेंगे!”, “इंक़लाब ज़िंदाबाद!”, इन नारों के साथ सभा को समाप्त किया गया।

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