अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2021 : महिलाओं का संघर्ष, शोषण-मुक्त समाज की ओर!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के कार्यकर्ताओं ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2021 के अवसर पर नयी दिल्ली में एक जोशपूर्ण सभा आयोजित की। इसमें महिलाओं और नौजवानों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। “महिलाओं का संघर्ष, शोषण-मुक्त समाज की ओर!” – इस शीर्षक के तहत सभा की गयी।

सभागृह के मंच और दीवारों को महिलाओं के वर्तमान समय के अनेक संघर्षों की मुख्य मांगों के बैनरों से सजाया गया था। इनमें कुछ नारे इस प्रकार थे: “तीनों किसान-विरोधी कानूनों को रद्द करो!”, “सभी फ़सलों के लिए एम.एस.पी. सुनिश्चित करो!”, “हमारी रोज़गार और अधिकारों पर हमले मुर्दाबाद!”, “चारों लेबर कोड रद्द करो!”, “महिलाओं पर बढ़ती हिंसा मुर्दाबाद!”, “सामान काम के लिए सामान वेतन!”, “कार्यस्थल पर सुरक्षा सुनिश्चित करो!”, “शासन-सत्ता अपने हाथ, जुल्म-अन्याय करें समाप्त!”

आज जिन तमाम मोर्चों पर महिलाएं आगे आकर संघर्ष कर रही हैं, उनको दर्शाते हुए एक फोटो प्रदर्शनी लगाई थी। दिल्ली की सीमाओं पर धरने पर बैठी किसान महिलाएं; रेलवे, टेलिकॉम, बैंकिंग, बीमा और रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक कारोबारों के निजीकरण के विरोध में महिलाएं; आंगनवाड़ी और आशा मज़दूर महिलाएं अपनी मान्यता के लिए संघर्ष करती हुई; महिला डॉक्टर और नर्स बीते कई महीनों के वेतन और सुरक्षित काम की हालतों की मांग करती हुई; शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ अध्यापिकाएं; महिला बस चालक अपने तीव्र शोषण के खि़लाफ़; सी.ए.ए. और एन.आर.सी. का विरोध करती हुई महिलाएं; राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और राजकीय आतंक के खि़लाफ़ संघर्ष में महिलाएं – इन सब को फोटो के माध्यम से दर्शाया गया।

सभा की शुरुआत “बढ़े चलो!” गीत के साथ हुयी, जिसमें महिलाएं कहती हैं कि हम न्याय के लिए पुलिस और कोर्ट-कचहरी पर निर्भर नहीं हो सकते, बल्कि हमें अपनी ताक़त पर निर्भर होकर, अपने शोषित भाइयों के साथ मिलाकर, अपना संगठन बनाकर आगे बढ़ना होगा।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के प्रतिनिधि ने सभा को संबोधित किया। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2021 पर देश और दुनिया की सभी संघर्षरत महिलाओं को सलाम किया। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के इतिहास की याद दिलाते हुए, उन्होंने बताया कि पूंजीवादी शोषण के खि़लाफ़ और शोषण-मुक्त समाज के लिए महिलाओं के संघर्ष की परंपरा को इस अवसर पर मनाया जाता है।

उन्होंने बीते तीन महीनों से दिल्ली की सीमाओं पर विरोध कर रही लाखों-लाखों किसान बहनों को लाल सलाम का अभिवादन पेश किया। ये महिलाएं अपने किसान भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मांग कर रही हैं कि तीनों किसान-विरोधी कानूनों को रद्द किया जाये और सभी कृषि उपज के लिए लागत के डेढ़ गुना दाम पर एम.एस.पी. की कानूनी गारंटी दी जाये। वे किसान संघर्ष को बदनाम करने और तोड़ने की कोशिशों का विरोध कर रही हैं। वे हमारे देश की शासन-सत्ता पर सवाल उठा रही हैं, जहां लोगों से सलाह किये बिना और लोगों के हितों के खि़लाफ़ कानून बनाये जाते हैं।

आज देश में महिलाएं बहुत सारे क्षेत्रों में संघर्ष में अगुवाई कर रही हैं – सार्वजनिक कारोबारों के निजीकरण के विरोध में संघर्ष, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी आवश्यक सेवाओं के निजीकरण के खि़लाफ़ संघर्ष, चार लेबर कोड के ज़रिये हमारी रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर हमलों के खि़लाफ़ संघर्ष, रोजी-रोटी की सुरक्षा, न्यूनतम वेतन और काम के बेहतर हालातों के लिए आंगनवाड़ी, आशा और मिड-डे मील कर्मियों, स्वास्थ्य कर्मियों, डॉक्टरों और नर्सों व शिक्षकों के संघर्ष, सामान काम के लिए सामान वेतन की मांग को लेकर संघर्ष, पारिवारिक संपत्ति में बराबर के हिस्से के लिए संघर्ष, किसान महिलाओं का अपनी ज़मीन पर मालिकाना हक़ के लिए संघर्ष, अपने जल-जंगल-ज़मीन पर अधिकार के लिए आदिवासी महिलाओं का संघर्ष, राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और आतंक और लोगों को बांटने के राज्य के प्रयासों के खि़लाफ़ संघर्ष, जातिवादी दमन और भेदभाव के खि़लाफ़ संघर्ष, काम पर, घर के अन्दर और सड़कों पर यौन हिंसा के खि़लाफ़ संघर्ष, इत्यादि।

उन्होंने समझाया कि महिलाओं के जीवन का अनुभव यह साफ-साफ दिखाता है कि हम अपनी मुक्ति के लिए वर्तमान राज्य और राजनीतिक व्यवस्था व प्रक्रिया पर निर्भर नहीं हो सकते। राज्य और उसके सारे संस्थान इजारेदार पूंजीवादी घरानों के अधिकतम मुनाफ़ों को सुनिश्चित करने का काम करते हैं और उन्हें हमारे श्रम, ज़मीन और कुदरती संसाधनों को लूटने की पूरी छूट देते हैं। वे महिलाओं के लिए सम्मान और सुरक्षा वाली ज़िन्दगी सुनिश्चित नहीं करते। जो महिला और पुरुष इस नाइंसाफी के खि़लाफ़ अपनी आवाज़ उठाते हैं, उन्हें “राष्ट्र-विरोधी” और “राजद्रोही” करार दिया जाता है – जैसे कि आजकल किसानों के साथ किया जा रहा है – और यू.ए.पी.ए. जैसे काले कानूनों के तहत बंद कर दिया जाता है ।

हम अधिकतम महिला और पुरुष फ़ैसले लेने के अधिकार से पूरी तरह वंचित हैं। सत्तारूढ़ पार्टी का मंत्रीमंडल सारे फ़ैसले लेता है। हर चुनाव में बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घराने अपनी पसंद की पार्टी की तिजौरियों में लाखों-करोड़ों रुपये डालते हैं ताकि वह जीतकर कॉर्पोरेट घरानों के हितों की बेहतरीन तरीके से सेवा करे।

उन्होंने महिलाओं से आह्वान किया कि अपने इस शोषण-दमन की हालतों को बदलने के लिए हमें संगठित होना होगा। हमें अपनी संघर्ष समितियां बनानी होंगी और अपने अधिकारों व सम्मान पर हर प्रकार के हमले के खि़लाफ़ अपनी आवाज़ उठानी होगी। पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर एकजुट संघर्ष करके ही हम कॉर्पोरेट घरानों और उनके राज्य के सब-तरफा हमलों को चुनौती दे सकते हैं।

महिलाओं की मुक्ति का रास्ता है सभी शोषितों के साथ एकता बनाकर एक ऐसी नयी राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया के लिए संघर्ष करना, जिसमें लोग फ़ैसले ले सकेंगे। हमें चुनावों के उम्मीदवार चुनने, चुने गए प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराने और उन्हें वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए। हमें अपने हित में कानून बनाने और उन्हें बदलने का अधिकार होना चाहिए।

उन्होंने सभी उत्पीड़ित महिलाओं और पुरुषों से आह्वान किया कि हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हो जायें। हमें एक ऐसी नयी अर्थव्यवस्था चाहिए जिसका काम होगा लोगों की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करना। हमें एक ऐसी नयी राजनीतिक व्यवस्था चाहिए जिसमें लोग फ़ैसले लेंगे।

भाषण के बाद कई नौजवान कार्यकर्ताओं ने बारी-बारी से मंच पर आकर अपनी बातें रखीं। उन्होंने बताया कि अधिकारी जन-विरोधी हैं, कि राज्य के सारे संस्थान सिर्फ टाटा, अम्बानी आदि के हितों की ही रक्षा करते हैं। अनेक जवान लड़कियों और लड़कों ने बढ़ती बेरोज़गारी, नौकरियों की असुरक्षा, सरकारी स्कूलों-कालेजों की दुर्दशा, निजी शिक्षा के बढ़ते खर्च, लॉकडाउन के दौरान छात्रों की कठिनाइयों, महिलाओं पर बढ़ती हिंसा और हमारे जनवादी अधिकारों व आज़ादियों पर हमलों के बारे में अपनी चिंताओं को प्रकट किया। एक फैक्ट्री में नौकरी करने वाली युवती ने बहुत ही भावुक होकर बताया कि वह 11 घंटे की शिफ्ट में काम करने को मजबूर है, जिसके लिए उसे प्रति माह मात्र 8,000 रुपये मिलते हैं। जब-जब उसका बच्चा बीमार होता है और उसे छुट्टी लेनी पड़ती है तो उसके पैसे काट लिए जाते हैं। एक छात्र ने कहा कि असली आतंकवादी किसान या नौजवान नहीं हैं, जो नाइंसाफी के खि़लाफ़ लड़ रहे हैं, बल्कि वे जो सत्ता पर बैठे हैं, जो हमारी एकता को तोड़ने के लिए सांप्रदायिक हिंसा और आतंक फैलाते हैं।

नौजवान कार्यकर्ताओं ने एक और गीत प्रस्तुत किया, “ऊषा की लालिमा फैली है”, जिसमें हमारी बहादुर महिलाओं और पुरुषों के संघर्षों और कुर्बानियों के बारे में बताते हुए यह उत्साहपूर्ण नजारा पेश किया गया कि ”वह दिन अब इतना दूर नहीं…” जब हमारे संघर्षों की फतह होगी!

“अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ज़िंदाबाद!”, “शोषण-मुक्त समाज के लिए संघर्ष ज़िंदाबाद!” – इन नारों के साथ सभा का समापन हुआ।

सभा के अंत में, सभी सहभागियों को दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आन्दोलन में महिला किसानों के साथ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने के लिए, पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ जुड़ने को आमंत्रित किया गया।

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