मार्च 7 को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिन मनाया गया

हिन्दोस्तान के इतिहास में इस साल का अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिन बहुत विशेष है। पिछले पूरे साल और उसके पहले से ही हिन्दोस्तानी महिलाएं अपने हकों के लिए बहुत जबरदस्त तरीके से रास्तों पर उतरी हैं। सरकार की किसान-विरोधी, मज़दूर-विरोधी तथा इजारेदारों के फायदे में बनायी गयी नीतियों का महिलाएं बहादुरी से विरोध कर रही हैं। हजारों महिलाओं ने अपने किसान भाइयों के साथ बहुत जुर्रत से दिल्ली की सीमाओं पर कड़ाके की ठंड का सामना किया है और अब तेज गर्मी का सामना करने की तैयारी कर रही हैं।

2020 में हम ने अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिन ऐसे समय मनाया था जब हिन्दोस्तानी महिला – पुरुष, देश भर में आयोजित किये हुए हजारों प्रदर्शनों तथा धरनों के द्वारा पूरी तरह से अन्यायपूर्ण तथा साम्प्रदायिक सी.ए.ए.-एन.आर.सी. को स्वीकार करने से इन्कार कर रहे थे। साम्प्रदायिकता तथा फूट डालों और राज करो का धिक्कार करने में, और खास तौर पर इस्लाम-फोबिया या इस्लाम द्वेष के खिलाफ करोड़ो आवाजें एक सुर में बुलंद हो रही थीं।

यह सब और इस से भी अधिक बहुत कुछ, रविवार, 7 मार्च को इंटरनेट पर आयोजित एक सभा में प्रस्तुत किया गया था। सभा का सह-आयोजन भारतीय महिला फेडरेशन की ठाणे समिति, ठाणे प्रदेश के जमात-ए-इस्लामी हिंद, लोक राज संगठन की महाराष्ट्र कौंसिल, म्यूज फाउंडेशन तथा ठाणे मतदाता जागरण अभियान ने किया था।

लोक राज संगठन के बदलापूर समिति के साथियों ने ’’आओ बहनों, कदम उठाओ, महिला मुक्ति है मंजिल!’’ गाने से सभा का उद्घाटन किया। लोक राज संगठन की उपाध्यक्षा, डॉ. संजीवनी जैन ने सभा का संचालन किया। ठाणे प्रदेश के जमात-ए-इस्लामी हिंद की सुश्री असीफा शिराझी तथा ठाणे मतदाता जागरण अभियान की डॉ. चेतना दीक्षित ने सभा को संबोधित किया।

ठाणे, कल्याण-डोम्बिवली तथा लोक राज संगठन, पुणे एवं म्यूज फाउंडेशन, ठाणे के युवतियों ने तथा युवकों ने मिल कर एक बहुत ही रोचक प्रस्तुति पेश की जिस में विविध विषयों पर उन्होंने प्रकाश डाला। पहले भाग में अमेरिका तथा यूरोप के मजदूरों के समाजवाद के लिए संघर्ष के एक हिस्से बतौर अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिन का इतिहास, सोवियत संघ के मज़दूर-किसानों के राज्य ने कौन-कौन से कदम उठाये थे ताकि समाज के समान सदस्य बतौर, सामाजिक कार्यों में सीधा योगदान देकर महिला एक समृद्ध जिंदगी बिता सकें, वेदिक समय से लेकर आजादी के संग्राम में और उसके बाद भी हिन्दोस्तान में महिलाओं ने कैसे महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है, इन सब पर बात रखी गयी। दूसरा भाग था महिलाओं के बारे में तथा अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिन के बारे में जान-बूझकर जो मिथक तथा भ्रम फैलाये जाते हैं उनका पर्दाफाश। प्रस्तुति का अगला भाग था महिलाओं पर होनेवाली हिंसा के विषय में। यह दर्शाया गया कि कैसे आज की प्रणालि में सेना-पुलिस तथा न्यायाधीशों की जवाबदेही गुनहगार राजनैतिक पार्टियों के नेताओं के प्रति होती है, न कि लोगों के प्रति। इसके विपरीत, जब लोगों का शासन-नियोजन चलता है, जैसे कि आज दिल्ली की सीमाओं पर चल रहा है, तब महिलाओं की सुरक्षा तथा इज्जत को सुनिश्चित किया जाता है।

राज्य द्वारा आयोजित साम्प्रदायिक हिंसा के खिलाफ महिलाओं के बुलंद आवाजों के बारे में अगला भाग था। उसके बाद हिन्दोस्तानी महिलाओं ने जिन विविध संघर्षों में भाग लिया था, उनकी झांकियां दिखायी गयी। एक प्रस्तुति में आज चल रहे किसान आंदोलन में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका का विवरण था। अंतिम प्रस्तुति में समझाया गया कि कैसे अपने हाथों में अनगिनत संसाधन होने के बावजूद सरकार तथा अधिकारियों ने लोगों की सुरक्षा तथा सुखचैन सुनिश्चित बिल्कुल नहीं किया है, जब कि अपने हाथों में मर्यादित संसाधन होने के बावजूद विविध संघर्षों में तथा खास करके किसान आंदोलन में लोगों ने यह काम किया है। यह भी दर्शाया गया कि कैसे भविष्य में लोगों का, और खास करके महिलाओं का सबलीकरण आवश्यक है।

प्रस्तुतियों के विविध भागों के बीच पुरोगामी तथा क्रांतिकारी कविताएं तथा नगमे पेश किये गये। करीबन सत्तर साल की उम्र की भारतीय महिला फेडरेशन की एक कार्यकर्ता, वंदना ताई शिंदे ने एक गाना ’’ऐसा खत में लिखो!’’ पेश किया, जिस में एक अनपढ़ महिला दूरदेश में काम कर रहे अपने पति को चिट्ठी भेजती है, इस सवाल के साथ कि उसे भी क्यों नहीं अपने बच्चे के लिये एक बेहतर दुनिया बनाने के संघर्ष में हिस्सा लेना चाहिये। इस गाने ने लोगों की नब्ज पकड़ ली और उन्होंने जिस अंदाज से गाना पेश किया, उसने सब का दिल जीत लिया। भारतीय महिला फेडरेशन की ठाणे समिति की नेता और पूरी जिंदगी मजदूरों के अधिकारों के लिए लड़ने वाली कॉ. गीता महाजन ने एक बहुत बढ़िया गाना पेश किया। सभा संचालक ने सब के दिल की बात कही, जब उन्होंने कॉ. को कहा कि उन्हें इस गाने का हिंदी में अनुवाद करना चाहिए जिससे कि वह इसे सभी हिन्दोस्तानी लोगों तक पहुंचा पाएंगी।

महिलागों के खिलाफ हिंसा जो होती है, उस विषय पर चर्चा के बाद बदलापुर से एक नौजवान ने मजबूती से ललकारा, ’’उठो, द्रौपदी, शस्त्र उठाओ, अब गोविंद न आएंगे!’’ यह गाना तो वाइरल हो चुका है। सत्ताधारी वर्ग के हमलों की चर्चा के बाद बदलापुर के एक युवा शायर ने अपना ताजा काव्य पेश किया, ’’कितने कायर हैं वोह!’’ किसान आंदोलन में महिलाओं की भूमिका के बारे में पेशकश के बाद भारतीय महिला फेडरेशन की कार्यकर्ता, कॉ सुनीता कुलकर्णी ने एक काव्य पढ़ा जिस में सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायाधीश को चुनौति दी गयी थी। किसान संघर्ष को दुर्बल बनाने के इरादे से सुरक्षा के बहाने, उन्होंने सभी महिलाओं को घर वापस जाने की हिदायत जो दी थी।

संचालक ने बताया कि सब संयोजक संगठनों ने निश्चय किया है कि आनेवाले दिनों में वे महिला मुक्ति के लिए मिलकर काम करती रहेंगी और किसान आंदोलन के समर्थन में तथा निजीकरण जैसे मज़दूर विरोधी नीतियों तथा कानूनों के खिलाफ संघर्षों के समर्थन में अपना कार्य जारी रखेंगी।

लोक राज संगठन की ठाणे समिति के तरफ से एक गाना पेश किया गया जिसमें आजादी के संग्राम में अपनी जानें निछावर करनेवाली महिलाओं को याद किया गया था। ’’उषा की लालिमा …’’ इस गाने ने सब को बताया कि कैसे नये भोर की लाली फैल रही है और जल्द ही लोगों के पर सूरज चमकेगा।

’’अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिन जिंदाबाद!’’, ’’हम हैं इसके मालिक, हम हैं हिन्दोस्तान, मजदूर, किसान, औरत और जवान!’’ तथा ’’इंकलाब जिंदाबाद!’’ के जोरदार नारों के साथ सभा का समापन हुआ।

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