देश के नव-निर्माण के संघर्ष में महिलाएं आगे-आगे!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 8 मार्च, 2021

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2021 पर, हिन्दोस्तानी समाज में बड़ा उफान है। सदियों से चल रही पूर्वधारणाओं और बेड़ियों को तोड़ती हुयी, दसों-हजारों महिलाएं सड़कों पर उतरकर, संसद में पास किये गए कानूनों और केंद्र सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रही हैं।

2019 के अंत में, जब धर्म के आधार पर नागरिकता के मुद्दे को लेकर, सी.ए.ए.-विरोधी और एन.आर.सी.-विरोधी संघर्ष चला था, तो उसमें महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। आंगनवाड़ी और आशा कर्मी, नर्सें, वस्त्र मज़दूर और अलग-अलग क्षेत्रों की महिला मज़दूर ट्रेड यूनियनों में संगठित होकर, बढ़-चढ़कर संघर्षों में हिस्सा ले रही हैं। बीते नवम्बर से, जब से किसान आन्दोलन ने दिल्ली की सीमाओं पर अपना प्रस्थान और धरना शुरू किया, तब से उस जन आन्दोलन में महिलाओं की भागीदारी नयी ऊंचाइयों को छूने लगी है। पूरे-पूरे गांवों की महिलाएं और पुरुष, जाति और लिंग के भेदभावों को भुलाकर, एकजुट होकर इस संघर्ष में आगे आ रहे हैं।

हमारी सरकार महिला सशक्तिकरण के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करती है। पर वास्तव में, महिलाओं के अधिकारों को पांव तले कुचल दिया जाता है। हिन्दोस्तानी समाज में आज भी महिलाओं पर तरह-तरह का दमन और शोषण होता है, जिसमें जातिवादी दमन भी शामिल है। जवान महिलाओं को अपना जीवन साथी चुनने की इजाज़त नहीं दी जाती है। आज, 21वीं सदी में भी अपनी पसंद से विवाह करने वाली महिला के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है जैसे कि वह कोई अपराधी है। महिलाओं को काम की जगह पर यौन शोषण और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। घर से काम पर जाने के रास्ते में उन पर शारीरिक हमलों का ख़तरा बना रहता है।

महिलाएं अगली पीढ़ी को जन्म देती हैं। परन्तु शहरों और गांवों में हजारों मेहनतकश महिलाओं को बच्चा पैदा करने की सुरक्षित हालतें उपलब्ध नहीं होतीं। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की घोर उपेक्षा के चलते, हमारी बहनें बार-बार ऐसी बीमारियों का शिकार हो जाती हैं जिन्हें रोका जा सकता है, और जवान उम्र में ही मर जाती हैं।

सरकार यह दावा करती है कि हमने बहुत तरक्की कर ली है, कि हम जल्द ही एक वैश्विक ताक़त बनने जा रहे हैं। पर हिन्दोस्तान में आज भी महिला के श्रम का मूल्य पुरुष के श्रम के बराबर नहीं है। महिला होने के नाते, हमारा दोहरा शोषण और दमन होता है। देश के अनेक भागों में महिला किसानों का उस ज़मीन पर कोई मालिकाना हक़ नहीं है जिसे वे जोतती हैं। जब उनके पति खुदकुशी करने को मजबूर होते हैं, तो उन महिलाओं को अक्सर उस ज़मीन से हाथ धोना पड़ता है।

महिलाएं मज़दूर बतौर अपने अधिकारों की मांग कर रही हैं, मज़दूर बतौर अपनी मान्यता की मांग कर रही हैं, किसान बतौर अपने

अधिकारों की मांग कर रही हैं। महिलाएं कृषि भूमि पर मालिकाना हक़ मांग रही हैं और अपनी उपज के लिए लाभकारी दाम की मांग कर रही हैं। महिलाएं इस कृषि संकट के समाधान की मांग रही हैं, जिसके चलते लाखों-लाखों किसान मौत के घाट उतारे गए हैं।

महिलाएं यह मांग कर रही हैं कि इंसान होने के नाते और नयी पीढ़ी की जन्मदाता होने के नाते उन्हें जो अधिकार मिलने चाहियें, उन अधिकारों को समाज और राज्य सुनिश्चित करें।

जो महिलाएं अपने अधिकारों के लिए और सरकार की नाइंसाफी केख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाने की जुर्रत करती हैं, उन्हें जेल में बंद कर दिया जाता है। उन्हें राजद्रोह के झूठे आरोप के आधार पर, यू.ए.पी.ए. या किसी दूसरे काले कानून के तहत गिरफ़्तार कर लिया जाता है और अनिश्चित समय के लिए जेल में बंद रखा जाता है।

इस हिन्दोस्तानी गणराज्य में अगर आप सत्ता का विरोध करते हैं, तो आप को दबाया जायेगा और बंद कर दिया जायेगा, चाहे आप स्त्री हों या पुरुष।

हिन्दोस्तानी समाज के सब-तरफा संकट का आधार पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था का संकट है। यह व्यवस्था मानव श्रम के शोषण और महिलाओं के अति-शोषण पर आधारित है। घर के अन्दर महिलाओं के अवैतनिक श्रम का फ़ायदा उठाकर, पूंजीपति वर्ग सभी मज़दूरों के वेतनों को कम से कम रखता है। पूंजीवाद के चलते, एक ध्रुव पर बेशुमार दौलत पैदा होती है तो दूसरे ध्रुव पर बढ़ती ग़रीबी। इसलिए पूंजीवाद बार-बार संकट में फंसता रहता है, क्योंकि पैदा की गयी वस्तुओं को खरीदने के लिए मज़दूरों और किसानों के पास पैसे नहीं हैं। इजारेदार पूंजीपति चारों तरफ मौत और तबाही फैलाये बिना अधिक से अधिक मुनाफ़े नहीं बना सकते हैं।

हिन्दोस्तान के इजारेदार पूंजीपति अमरीका, चीन और अन्य देशों के इजारेदार पूंजीपतियों के साथ स्पर्धा और सहयोग करने में व्यस्त हैं। वे उम्मीद कर रहे हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के बेहद समाज-विरोधी कार्यक्रम को तेज़ गति से लागू करके, वे अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा कर पाएंगे। इस कार्यक्रम के चलते, सभी आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं – खाद्य, स्वास्थ्य, शिक्षा, आदि – को सरकारी ज़िम्मेदारी से हटा दया जा रहा है और देशी-विदेशी विशाल इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों के अधिकतम निजी मुनाफ़ों के स्रोत में बदल दिया जा रहा है।

इस समाज-विरोधी कार्यक्रम के लागू होने से महिलाओं की समस्याएं और ज्यादा बढ़ गयी हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया के ज़रिये अश्लील साम्राज्यवादी विचारधारा का अनियंत्रित प्रसार होता है, जिसके चलते महिलाएं यौन सुख का साधन मानी जाती हैं। महिलाओं पर हिंसा दिन-ब-दिन बद से बदतर होती जा रही है।

लोकतंत्र की वर्तमान व्यवस्था में अपराधी पार्टियां राजनीतिक प्रक्रिया पर हावी हैं, इसलिए महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध जारी हैं व बढ़ते जा रहे हैं। प्रतिस्पर्धी पूंजीवादी पार्टियां धनबल के साथ-साथ, तरह-तरह के अपराधी तत्वों को पालती हैं और उनके बाहुबल का इस्तेमाल करती हैं। ऐसे तत्व और राजनीतिक तौर पर प्रभावशाली मां-बाप के बेटे नियमित रूप से जवान लड़कियों और महिलाओं का बलात्कार और क़त्ल करते हैं।

चुनावों के ज़रिये इस या उस अपराधी पार्टी के शासन को वैधता दी जाती है। अपने मतदाता क्षेत्र से चुनाव में कौन खड़ा होगा, इसे तय करने में लोगों की कोई भूमिका नहीं होती। पूंजीपतियों द्वारा समर्थित पार्टियों के उम्मीदवारों में से किसी एक को ही चुनना पड़ता है। लोग किसी भी तरीक़े से यह नहीं सुनिश्चित कर सकते कि संसद में उनके हितों की बात की जायेगी। वोट डालने से पहले और बाद में लोगों की कोई भूमिका नहीं होती है। लोग अपने निर्वाचित सांसद को वापस भी नहीं बुला सकते हैं, चाहे वह कितना ही जन-विरोधी काम करता हो।

संसद सिर्फ बाजारू बातें करने की जगह है। वहां जो वाद-विवाद होते हैं, उनका अंतिम फैसले पर बहुत ही कम असर होता है। करोड़ों-करोड़ों लोगों के जीवन पर असर डालने वाले फैसले सत्तारूढ़ पार्टी के मंत्रीमंडल द्वारा लिए जाते हैं। प्रधानमंत्री निर्वाचित सांसदों में से अपना मंत्रीमंडल चुनते हैं, और यह मंत्रीमंडल ही पूंजीपति वर्ग के हितों के अनुसार सारे फैसले लेता है।

केंद्र और राज्य सरकारों, पूरी अफसरशाही, न्यायपालिका तथा सत्ता के सभी अन्य संस्थानों पर इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग का नियंत्रण होता है।

मोदी की भाजपा सरकार ने कोरोना वायरस के लॉकडाउन के कारण पैदा हुए भयानक संकट का फ़़ायदा उठाकर, हुक्मरान वर्ग की सेवा में, संसद के ज़रिये कई मज़दूर-विरोधी और किसान-विरोधी कानूनों को पारित कर दिया है। परन्तु आंशिक लॉकडाउन के बावजूद जिस तरह जन-विरोध बढ़ता हुआ दिख रहा है, उससे साफ पता चलता है कि लोग बड़ी संख्या में बाहर निकलकर, अपनी रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर इन हमलों का जमकर विरोध कर रहे हैं।

हम, इस देश की मेहनतकश महिलाएं और पुरुष, यह मांग कर रहे हैं कि अपनी रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर असर डालने वाले मामलों पर फ़ैसले लेने का अधिकार हमें होना चाहिए। हम राजनीतिक सत्ता से दरकिनार किये जाने केख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं। हम अपने हाथों में राजनीतिक सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

महिला, मज़दूर, किसान बतौर हमारे हित टाटा, अंबानी, बिरला, अडानी और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घरानों के हितों के बिल्कुल विपरीत हैं। हमें ऐसी व्यवस्था मंजूर नहीं है, जिसमें इजारेदार पूंजीपतियों के हितों की नुमाइन्दगी करने वाला एक छोटा गुट ही सारे फ़ैसले लेता है।

महिलाओं की मुक्ति सिर्फ ऐसी राजनीतिक व्यवस्था में मुमकिन होगी जिसमें मेहनतकश लोग खुद अपने फ़ैसले लेंगे, न कि उन पर राज करने वाले परजीवी और शोषक। ऐसी व्यवस्था तभी बनाई जा सकती है जब महिलाएं, जो समाज का आधा हिस्सा हैं, इसके लिए महिला बतौर और मज़दूर बतौर संघर्ष करती हैं।

महिलाओं को अपने संगठन बनाने और मजबूत करने होंगे और साथ ही साथ, मज़दूरों, किसानों और सभी उत्पीड़ित लोगों के संगठनों व संयुक्त मोर्चों को बनाने और मजबूत करने में अगुवा भूमिका निभानी होगी।

महिलाओं को अपने मोहल्लों, बस्तियों, विश्वविद्यालयों में – जहां भी वे रहती हैं, पढ़ती हैं या काम करती हैं – हर प्रकार के अन्याय के ख़िलाफ़ और लोगों के अधिकारों की हिफ़ाज़त में संघर्ष समितियां बनानी होंगी।

महिलाओं को सभी शोषित और उत्पीड़ित पुरुषों के साथ एकता बनाकर, अपने हाथों में राज्य सत्ता लेने के लिए संगठित होना होगा। हमें एक नए राज्य और संविधान की नींव डालनी होगी, जिसमें संप्रभुता लोगों के हाथों में होगी और यह सुनिश्चित किया जायेगा कि सभी मानव अधिकारों तथा मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों के अधिकारों का कोई हनन नहीं होगा। अर्थव्यवस्था को सभी की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में चलाया जायेगा, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने की दिशा में। किसी को भी दूसरों का शोषण करके निजी धन संचय करने की इजाज़त नहीं दी जायेगी।

आइये, हम हिन्दोस्तानी समाज के नव-निर्माण के संघर्ष को आगे बढ़ायें। मुट्ठीभर शोषकों की वर्तमान हुकूमत की जगह पर मेहनतकश बहुसंख्या की हुकूमत स्थापित करने के संघर्ष को आगे बढ़ायें। यही महिलाओं की मुक्ति की अनिवार्य शर्त है।

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