इजारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने के लिए तेज़ी से बढ़ता निजीकरण

1 फरवरी को वित्त मंत्री द्वारा पेश किये गए बजट में निजीकरण को तेज़ करने का ऐलान किया गया। केंद्र सरकार सभी क्षेत्रों और विभागों का एक-एक करके निजीकरण कर रही थी, जैसा कि रेलवे के मामले में किया जा रहा था। अब सरकार ने अधिकांश सार्वजनिक उपक्रमों का तेज़ी से निजीकरण करने का ऐलान किया है।

सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की नीति में कहा गया है कि इसका उद्देश्य है “वित्तीय संस्थाओं सहित केंद्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों की संख्या को कम करना और निजी क्षेत्र द्वारा निवेश के लिए नए आयाम पैदा करना”।

इस समय देशभर में केंद्र सरकार के 1300 से अधिक सार्वजनिक उपक्रम हैं। सरकार का उद्देश्य इनकी संख्या को दो दर्जन से कम करना है। अपने इसी लक्ष्य की दिशा में वित्त मंत्री ने कई क़दमों के ऐलान किये हैं।

  1. दो सरकारी बैंकों की बिक्री
  2. एक सामान्य बीमा कंपनी की बिक्री
  3. बी.पी.सी.एल., एयर इंडिया, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, आई.डी.बी.आई. बैंक, बी.ई.एम.एल., पवन हंस, नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड एवं अन्य उपक्रमों की बिक्री, 2021-22 में पूरी की जाएगी।
  4. एल.आई.सी. के शेयरों की बिक्री का काम पूरा किया जाएगा।
  5. पूर्व और पश्चिम समर्पित फ्रेट कॉरिडोर (डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर) को निजी माल गाड़ियों की आवाजाही के लिए खोल दिया जायेगा।
  6. सड़कों, बिजली वितरण लाइन, तेल और गैस पाईपलाइन, हवाई अड्डों, इत्यादि के मुद्रीकरण यानी सीधे पैसे बनाने के लिए, एक नयी मुद्रीकरण पाईपलाइन तैयार की जाएगी। मुद्रीकरण का मतलब है, लोगों के पैसों से निर्माण किये गए सार्वजनिक संपत्तियों के हिस्सों को एक-एक करके बेचना।
  7. 7 बंदरगाहों को पी.पी.पी. (निजी-सार्वजनिक भागीदारी) के तहत चलाना।
  8. देशभर में हर जगह एक और निजी बिजली वितरण कंपनी को इजाजत देते हुए बिजली वितरण का निजीकरण करना।
  9. सार्वजनिक परिवहन सेवा को पी.पी.पी. के तहत चलाना।
  10. राज्यों की अपनी सार्वजनिक कंपनियों के विनिवेश के लिए उन्हें प्रोत्साहन राशि प्रदान करना

सार्वजनिक उपक्रमों की सीधे बिक्री या हिस्सों में बिक्री (विनिवेश) से सरकार ने 2021-22 दौरान 1,75,000 करोड़ रुपये बनाने का लक्ष्य रखा है। यह वर्ष 2020-21 में हासिल की गयी राशि से पांच गुना अधिक है।

इसके अलावा वित्त मंत्री ने ऐलान किया कि राज्य सरकारों को भी अपने सारे सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण करने के लिए प्रोत्साहित किया जायेगा। देशभर में ऐसे 1000 से अधिक उपक्रम हैं। इसके लिए केंद्र सरकार राज्य सरकारों को प्रोत्साहन राशि देगी।

4 फरवरी को केंद्र सरकार ने ऐलान किया कि केंद्रीय मंत्रीमंडल ने राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड के स्टील प्लांट के निजीकरण को मंजूरी दे दी है।

सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश उपक्रमों का निजीकरण करने के पीछे इजारेदार पूंजीपतियों की अपनी ज़रूरत है, जिससे उन्हें मुनाफ़े बनाने के नए आयाम हासिल होंगे। वर्तमान में मेहनतकश लोगों की क्रय शक्ति सीमित हो जाने की वजह से निजी पूंजी और मुनाफ़ों की बढ़ोतरी में रुकावट आ गयी है। महामारी की वजह से हालात और भी खराब हो गए हैं। रोज़गार के छिन जाने और स्वास्थ्य से संबंधित खर्चों के बढ़ जाने की वजह से मेहनतकशों की क्रय शक्ति नष्ट हो गयी है, जो कि पहले से ही बेहद कम थी। अपने मुनाफ़ों को बरकरार रखते हुए इस संकट से निकलने हेतु इजारेदार पूंजीपतियों के लिए, मुनाफ़ेदार सार्वजनिक उपक्रमों को सस्ते दाम पर खरीदना, सबसे पसंदीदा रास्ता है।

हमारे जीवन के अनुभव ने हमें यह सिखाया है कि निजीकरण का नतीजा यह होगा कि सैकड़ों मज़दूरों को नौकरी से निकाला जायेगा। निजीकरण से ठेका मज़दूरी और अधिक बढ़ जाती है, और ठेका मज़दूरों को नियमित मज़दूरों की तुलना में एक-तिहाई या एक-चैथाई वेतन पर काम करना पड़ता है। नियमित और ठेका मज़दूर दोनों को बगैर ओवर टाइम के हर रोज लंबे समय के लिए काम करना पड़ता है। काम और सुरक्षा के हालात और ज्यादा बदतर हो जाते हैं। मौजूदा यूनियनों को नष्ट कर दिया जाता है और नए मज़दूरों को अपनी यूनियन में संगठित होने से रोका जाता है। रोज़गार की सुरक्षा खत्म हो जाती है।

मज़दूर-विरोधी होने के अलवा निजीकरण समाज-विरोधी भी है। निजीकरण का मतलब है कि ये  उपक्रम सामाजिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काम नहीं करेंगे, बल्कि केवल निजी मुनाफ़ों के लिए काम करेंगे। जब रेल, बीमा, बैंक, बिजली, इत्यादि का निजीकरण किया जाता है, तब ये सेवाएं और अधिक महंगी हो जाती हैं और आम उपभोक्ता के बस से बाहर हो जाती है क्योंकि, ये केवल अधिकतम मुनाफ़े बनाने के लिए चलायी जाएंगी। कई लोग इन सेवाओं से वंचित कर दिए जाते हैं।

निजीकरण से केवल इजारेदार पूंजीपतियों के लालच की ही पूर्ति होती है। ये उपक्रम लोगों की संपत्ति हैं और इन्हें हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार कंपनियों को कौड़ियों के दाम पर बेच दिया जाता है। उदाहरण के लिए भारत पेट्रोलियम, जिसकी संपत्ति की कुल क़ीमत 5 लाख करोड़ से भी अधिक है, उसे केवल 50,000 करोड़ रुपये में बेचा जा रहा है। पूंजीपतियों को बेशक़ीमती ज़मीन, प्लांट एवं उपकरण के साथ-साथ बना-बनाया बाज़ार थाली में परोस पर दिया जाता है, ताकि पूंजीपति निजीकरण के बाद पहले ही दिन से मुनाफ़ा बनाने लगें। हमारा अनुभव यह भी दिखाता है कि यह पूंजीपति ज़मीन और रियल एस्टेट में सट्टेबाजी के रास्ते विशाल धन बनाते हैं। अधिकांश मामलों में उत्पादन और बिक्री को बनाये रखने के लिए उन्हें किसी भी प्रकार की नए पूंजी निवेश की ज़रूरत नहीं पड़ती है।

सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के निजीकरण की इस नयी नीति का देश के तमाम मेहनतकश लोगों को निंदा करनी चाहिए। सरकार को कोई अधिकार नहीं है कि वह लोगों के खून-पसीने और धन से निर्माण की गयी संपत्ति को इजारेदार पूंजीपतियों के लालच को पूरा करने के लिए उनको सौंप दें।

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