बजट के ख़िलाफ़ बढ़ता विरोध

1 फरवरी को वित्त मंत्री द्वारा पेश किए गए केंद्रीय बजट के ख़िलाफ़ देश में लोगों के बीच व्यापक गुस्सा और नफ़रत है। लाखों नौकरियों के खत्म होने के बाद, शहरों और ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले परिवारों को उम्मीद थी कि बजट, बेरोज़गारी के ज्वलंत मुद्दे को संबोधित करेगा। पेट्रोल और रसोई गैस सहित विभिन्न वस्तुओं पर लगाई गयी कृषि-कर (सेस) भी, कामकाजी परिवारों के लिए एक बहुत भारी झटका है।

मज़़दूर वर्ग संघर्ष के रास्ते पर

बीमा और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकिंग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाली ट्रेड यूनियनें, बजटीय प्रस्तावों के ख़िलाफ़, इस महीने देशभर में विरोध प्रदर्शन आयोजित करने की योजना बना रही हैं। बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश (एफ.डी.आई.) की सीमा को 49 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 प्रतिशत तक करने और एक बीमा कंपनी और दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को बेचने, बजट में बीमा क्षेत्र के निजीकरण के प्रस्ताव का वे विरोध कर रहे हैं। युनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (महाराष्ट्र) ने 23 फरवरी को एक धरने का आह्वान किया है।

मज़दूरी, औद्योगिक संबंध, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति (ओ.एस.एच.) और सामाजिक सुरक्षा पर बनाये गए चार श्रम संहितायें – इस साल अप्रैल तक देशभर में लागू होने वाली हैं। 2019 में मज़दूरी पर संहित को 2019 में संसद द्वारा पारित किया गया था, जबकि अन्य तीन संहिताओं को सदन द्वारा श्रम पर बनाई गई स्थायी समिति के पास चर्चा के लिए भेजा गया था। इसके बाद ये तीनों संहितायें – सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक संबंध संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य शर्तों पर एक संहिता को पिछले साल सितंबर में केंद्र द्वारा पारित किया गया था।

मज़दूरों की यूनियनें और संगठन निश्चित अवधि के रोज़गार पर कोड में बनाये गए कई नए प्रावधानों का विरोध कर रहे हैं जैसे कि छोटी फर्मों को ठेका मज़दूरी के नियमों के दायरे से बाहर रखना और स्थाई और अस्थाई मज़दूरों के लिए काम के घंटों में अंतर हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि कड़े संघर्ष के बाद मज़दूरों द्वारा हासिल किये गए उनके अधिकारों जैसे कि, आठ घंटे का कार्य दिवस, स्थायी रोज़गार और अन्य श्रम अधिकारों को नई श्रम संहिताओं द्वारा उनसे छीन लिया जाएगा। 4 फरवरी को, सीटू के नेतृत्व में मज़दूरों ने देश की राजधानी में प्रदर्शन करके, दिल्ली सरकार से इस नयी श्रम संहिता को लागू नहीं करने के लिए दबाव डाला। श्रम और श्रम कानून, संविधान की समवर्ती सूची के अंतर्गत आते हैं, इसलिए केंद्र की संसद और राज्य विधानसभा दोनों श्रम से संबंधित कानून बना सकते हैं।

निजीकरण के ख़िलाफ़ विरोध पूरे देश में दिन पर दिन तीव्र हो रहा है। विजाग राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड (आर.आई.एन.एल.) के मज़दूरों ने 5 फरवरी को विशाखापट्टनम में ग्रेटर विशाखापट्टनम नगर निगम कार्यालय के सामने हजारों की संख्या में अपना विरोध प्रकट किया। स्टील प्लांट के हजारों मज़दूरों ने मिलकर एक विरोध रैली निकाली। इसके बाद आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा शहर में 8 फरवरी को एक महाधरना आयोजित किया गया जिसमें केंद्र सरकार की आर.आई.एन.एल. के निजीकरण की योजनाओं का कड़ा विरोध किया गया। सभी ट्रेड यूनियनें निजीकरण के ख़िलाफ़ अनेक राज्यों में विरोध प्रदर्शन आयोजित करने की योजना बना रही हैं, ट्रेड यूनियनें आंध्र प्रदेश सरकार पर दबाव डाल रही हैं कि वह सरकार विधानसभा में आर.आई.एन.एल. के निजीकरण के ख़िलाफ़ और केंद्र से इस योजना को निरस्त करने के लिए अनुरोध करने के एक प्रस्ताव को पारित करें।

पलक्कड़ में भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (बी.ई.एम.एल.) के मज़दूरों ने भी निजीकरण के कार्यक्रम के ख़िलाफ़ अपना विरोध तेज़ कर दिया है जो कि जनवरी में केंद्र सरकार के रणनीतिक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के निजीकरण के क़दम के ख़िलाफ़ शुरू हुआ था। मज़दूरों ने 10 फरवरी को कोझीकोड में बी.ई.एम.एल. संयंत्र और इंस्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड (आई.एल.) के सामने एक विरोध दीवार बनाई। बी.ई.एम.एल. के मज़दूरों के संघर्ष के समर्थन में और सभी मज़दूरों की एकजुटता का विस्तार करते हुए 17 फरवरी को अन्य लोगों के साथ पलक्कड़ में आईटी कर्मचारियों की एसोसिएशन ने भी इस संघर्ष में भाग लिया और मज़दूरों द्वारा बनाये गए एक मानव किले में वे भी शामिल हो गये।

इस बीच तमिलनाडु में राज्य सरकार के मज़दूरों और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार तीन दिनों तक, 2-4 फरवरी को विशाल प्रदर्शन किए गए। विभिन्न विभागों में 4.5 लाख से अधिक रिक्त पदों को भरने, लगभग 3.5 लाख मज़दूरों को नियमित करने, 7,800 कर्मचारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई को वापस लेने और पुरानी पेंशन योजना को बहाल करवाने के लिए लंबे समय से लंबित अपनी मांगों पर सरकार की उदासीनता के ख़िलाफ़ संघर्ष में वे सड़कों पर उतरे।

सरकार के ख़िलाफ़ मज़दूरों का गुस्सा बढ़ रहा है। ऐसी सरकार जिसने एक तरफ बेरोज़गारी के संकट को पूरी तरह से नज़रंदाज किया है और दूसरी तरफ, सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण की बहुत सी योजनायें बनायी हैं और मज़दूर-विरोधी श्रम संहिताओं को जबरदस्ती आगे बढ़ाने की जुर्रत की है। एक ओर, जहां लोगों की आय में भारी गिरावट आ रही है, वहीं दूसरी ओर अप्रत्यक्ष करों के बढ़ने के कारण आवश्यक वस्तुओं की क़ीमतें बढ़ रही हैं। आने वाले महीनों में सरकार के इन जन-विरोधी क़दमों के ख़िलाफ़, आम लोगों के व्यापक विरोध प्रदर्शन देखने को मिलेंगे।

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