केंद्रीय बजट 2021-22 : इजारेदार पूंजीपतियों के हित में समाज-विरोधी हमले जारी हैं

केंद्रीय बजट इजारेदार पूंजीपतियों के खुदगर्ज हितों की सेवा में है, इसका मेहनतकश लोगों की असुरक्षा और दुखों से कोई वास्ता नहीं है।

1 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वर्ष 2021-22 का केंद्रीय बजट संसद में पेश किया। बजट की विषय वस्तु और उसके लक्ष्य को पूरी तरह से समझने के लिए यह सवाल पूछना अच्छा होगा कि केंद्रीय बजट क्या होता है?

केंद्रीय बजट क्या होता है?

केंद्रीय बजट आने वाले वित्त वर्ष (1 अप्रैल, 2021 से 31 मार्च, 2022) के दौरान सरकार के खर्चों का अनुमान पेश करता है। यह अनुमान पेश करता है कि कितना कर और अन्य राजस्व इकट्ठा किया जायेगा तथा कर्ज़ से और केंद्रीय सार्वजनिक संपत्तियों को बेचकर कितना धन जमा किया जायेगा।

एक बार इस बजट को संसद की मंजूरी मिल जाने के बाद केंद्र सरकार वित्त वर्ष के दौरान मंजूर की गयी रकम को खर्च कर सकती है और निर्धारित सीमा तक अतिरिक्त कर्ज़ ले सकती है। बजट के साथ-साथ वित्त विधेयक भी पेश किया जाता है, जिसमें आने वाले वित्त वर्ष में लागू होने वाले करों की दर, करों में छूट और उसके नियम निर्धारित किये जाते हैं। यह वित्त अधिनियम सरकार को निर्धारित दरों पर करों की वसूली करने का अधिकार देता है।

खर्चा करने से धन बाहर जाता है, जबकि राजस्व, कर्ज़ और संपत्तियों की बिक्री से सरकारी खजाने में धन जमा होता है। बजट में इन दोनों का हिसाब संसद की मंजूरी के लिए पेश किया जाता है। इसे नीचे दिए गए समीकरण के द्वारा समझा जा सकता है:

खर्च = राजस्व+शुद्ध कर्ज+संपत्ति की बिक्री (निजीकरण और विनिवेश से हुई आमदनी)।

केंद्र सरकार के खर्चे

नौकरशाही, अर्ध-सैनिक बल, सशस्त्र बल, लिये गये कुल कर्ज़ पर ब्याज की रकम, इसके अलावा केंद्र सरकार विभिन्न प्रकार की उत्पादक गतिविधियों पर खर्च करती है। सरकार शिक्षा, प्रशिक्षण, स्वास्थ्य तथा जन-कल्याण और उत्पादन के साधनों तथा वस्तुओं की आवाजाही पर निवेश के रूप में खर्च करती है। ये सभी खर्च सरकारी हिसाब-किताब में आर्थिक एवं सामाजिक सेवाओं की श्रेणी के तहत आते हैं। इसमें कृषि, सिंचाई, ऊर्जा, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल आपूर्ति और अन्य तमाम कल्याणकारी कार्यक्रमों पर आवर्ती एवं पूंजीगत खर्च शामिल है।

शिक्षा, स्वास्थ्य और कुछ अन्य क्षेत्रों में सेवाएं प्रदान करने की प्रमुख ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है, जो अपने राज्यों में ये सेवाएं मुहैया कराती हैं। ऐसे मामलों में केंद्रीय बजट से खर्च किया गया धन केंद्र द्वारा प्रायोजित कार्यक्रमों के लिए होता है, जो राज्य सरकारों के खर्च का सम्पूरक होता है।

जैसा कि दुनिया के सभी पूंजीवादी देशों में किया जाता है, हमारे देश में भी केंद्र सरकार साल दर साल अपने राजस्व की आय से काफी अधिक मात्र में खर्चा करती है। इस अंतर को पूरा करने के लिए, जिसे राजकोषीय घाटा कहा जाता है, सरकार हर साल नया कर्ज़ लेती है। इस तरह से हर साल सार्वजनिक कर्ज़ बढ़ता रहता है और साथ ही उस पर लगने वाले वार्षिक ब्याज की रकम भी बढ़ती जाती है।

हिन्दोस्तान की सरकार के वित्त में एक रुझान बेहद स्पष्ट है, वह है ब्याज का भुगतान जो कि अनुत्पादक खर्च है, यह उत्पादक खर्च की तुलना में लगातार बढ़ता ही जा रहा है। सरकार हर वर्ष पुराने कर्ज़ और उस पर लगने वाले ब्याज की बकाया रकम को लौटाने के लिए नया कर्ज़ लेती है। यह बढ़ती परजीविता का संकेत है।

सरकार द्वारा लिया गया अधिकतर कर्ज़ पूंजीपति वर्ग की निष्क्रिय पूंजी से आता है, जिसे वे बैंकों और वित्तीय संस्थानों में जमा करके रखते हैं और इसका इस्तेमाल सरकार को कर्ज़ देने के लिये करते हैं। राजस्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा सरकार के कर्ज़ पर ब्याज का भुगतान करने में जाता है, जो कि लगातार बढ़ता जा रहा है। इस सबके बाद सरकारी खजाने में जो कुछ धन बचा रहता है, वह बेहद कम होता है और सरकार को और अधिक कर्ज़ लेने की ज़रूरत पड़ती है। यह एक ऐसा कुचक्र है जहां ब्याज की रकम लगातार बढ़ती रहती है और पूंजीपति वर्ग के लिए अपनी मुद्रा पूंजी पर सुनिश्चित मुनाफे का स्रोत होती है।

करों से राजस्व

देश में वसूले गए करों का अधिकांश हिस्सा केंद्र सरकार अपने पास जमा करती है जबकि राज्य सरकारें बहुत छोटा हिस्सा जमा करती हैं। केंद्र सरकार द्वारा इकट्ठा किये गए करों को वित्त आयोग द्वारा पूर्व-निर्धारित फार्मूले के अनुसार राज्य सरकारों के साथ बांटा जाता है।

करों के दो मुख्य प्रकार हैं: प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर।

प्रत्यक्ष कर वे होते हैं, जिन पर सरकार व्यक्तियों और कंपनियों की आय के आधार पर दावा करती है। इसमें कॉर्पोरेट कर और आयकर शामिल हैं। कंपनी कर पूंजीपतियों की कंपनियों द्वारा कमाए गए मुनाफ़े पर लगाया जाता है। आयकर मुख्य तौर पर नियमित वेतनभोगी मज़दूर और कुछ स्व-रोज़गार करने वाले लोग भरते हैं, जिनकी वार्षिक आय 2,50,000 रुपये से ज्यादा है।

अप्रत्यक्ष करों में कई प्रकार के कर शामिल हैं जो वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री के आधार पर वसूल किये जाते हैं। अप्रत्यक्ष कर सभी वस्तुओं के खुदरा मूल्य में जोड़े जाते हैं। इसलिए ऊंचे अप्रत्यक्ष करों से मेहनतकश लोगों के लिए जीवन यापन का खर्चा बढ़ जाता है।

केंद्र सरकार द्वारा इकट्ठा किये जा रहे अप्रत्यक्ष करों में सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी), केंद्रीय उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) और केंद्रीय वस्तु एवं सेवाकर (जी.एस.टी.) शामिल हैं। इन करों का भुगतान समाज के सभी वर्गों के लोगों द्वारा किया जाता है। कोई व्यक्ति जब किसी भी वस्तु या सेवा को खरीदता है, उससे अप्रत्यक्ष करों की वसूली की जाती है। गरीब तबके के लोग अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा उपभोग की वस्तुओं पर खर्च करते हैं। इसलिए अमीर लोगों की तुलना में, उनकी आमदनी के अनुसार ग़रीबों पर अप्रत्यक्ष करों का बोझ ज्यादा होता है।

केंद्र सरकार राजस्व के लिए सभी वर्गों के लोगों द्वारा दिए जा रहे अप्रत्यक्ष करों और वेतनभोगी लोगों द्वारा दिए जा रहे आयकर पर ज्यादा निर्भर करती है और कंपनी करों पर कम। यह केंद्रीय कर नीति में सरकार की पूंजीपति-परस्त दिशा की झलक है।

संपत्ति का पुनः बंटवारा

सरकार जो कर लगाती है, वह उस वस्तु या सेवा में मानव श्रम द्वारा जोड़े गये मूल्य पर सरकार का दावा है। इस तरह से एक वर्ष में जितना मूल्य जोड़ा जाता है, उसे सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) कहते हैं और यह विभिन्न आर्थिक वर्गों के बीच पूंजी आय, श्रम आय और स्वयं रोज़गार से जुड़े मज़दूर की मिश्रित आमदनी के रूप में बंट जाता है।

पूंजी आय में मुनाफ़े, ब्याज और किराये की आय शामिल होते हैं। श्रम आय में काम पर रखे गए मज़दूर को उसके श्रम की एवज में दिए जाने वाले नियमित मासिक वेतन, देहाड़ी और अन्य तरह के भुगतान शामिल होते हैं। मिश्रित आय में किसानों, कारीगरों और व्यक्तिगत पेशा करने वाले लोगों की कुल आय शामिल होती है, जो वस्तुओं के उत्पादन और बिक्री के लिए खुद अपने उत्पादन के साधनों और पारिवारिक श्रम का उपयोग करते हैं।

पूंजी के मालिक जोड़े गए मूल्य पर बढ़ते पैमाने पर हिस्सेदारी के लिये लगातार दावा करते हैं। जो मेहनतकश इस मूल्य को पैदा करते हैं, उन्हें न्यूनतम ज़रूरत के अनुसार ही भुगतान किया जाता है, ताकि वे श्रम करते रहें। मौजूदा कर व्यवस्था के चलते यह न्यूनतम मानक भी गिरता जाता है, जिसे मेहनतकशों को लूटने और अति-अमीर कुलीन लोगों के करों को कम करने के लिए बनाया गया है। शोषण पर आधारित उत्पादन संबंधों की वजह से – जो लोग मेहनत करते हैं और जो लोग पूंजी से आय की फ़सल काटते हैं – उनके बीच आय का बंटवारा बेहद असमान होता है। करों और सार्वजनिक खर्चों से आय का पुनः वितरण होता है, जिसके चलते आय को बहुसंख्य मेहनतकश लोगों के हाथों से छीनकर मुट्ठीभर पूंजीपतियों की तिजोरियों में पहुंचाया जाता है।

मुट्ठीभर अमीर पूंजीपतियों के गुनाहों की क़ीमत पूरी जनता से वसूलने का सबसे बेशर्म रूप है, बैंकों का तथाकथित पुनः पूंजीकरण। पूंजीपति कर्ज़दारों के कर्ज़ की माफ़ी के लिए केंद्र सरकार हर वर्ष सरकारी खजाने से बैंकों को धन देती है। इस तरह से पूंजीपतियों द्वारा बैंक की लूट का बोझ लोगों के सर पर लाद दिया जाता है। पिछले पांच वर्षों में केंद्र सरकार ने केंद्रीय बजट निधि से पूंजीवादी बकायदार कंपनियों की कर्ज़ माफ़ी करने के लिए 3,00,000 करोड़ रुपये खर्च किये है।

संक्षेप में कहा जाये तो पूंजीवादी सरकारें अमीरों के फ़ायदे के लिए आमतौर पर ग़रीबों को ही लूटती हैं। इस तरह से वार्षिक बजट सरकार की एक ऐसी योजना है जिसके द्वारा वह दूसरों के श्रम पर पलने वाले परजीवियों के मुनाफ़ों को बढ़ाने के लिए, मेहनतकशों से वसूली करती है।

बजट का संदर्भ

2021-22 का बजट बेहद असामान्य परिस्थितियों में पेश किया जा रहा है। हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था जो कि पिछले कुछ वर्षों से मंदी में डूबती चली जा रही थी, वर्ष 2020-21 के दौरान इसमें दो अंकों की गिरावट आई। बेरोज़गारी, जो कि 2019 में भी एक बड़ी समस्या बन कर उभरी थी, तालाबंदी के बाद तो यह बेहद ऊंचे स्तर पर पंहुच गयी है। सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था अपनी चरम सीमा तक खिंच गयी। स्कूल और कॉलेज की शिक्षा पर बहुत बुरा असर हुआ है। वेतन कटौती, छंटनी और शुद्ध आय में भरी गिरावट के चलते करोड़ों मेहनतकश लोग बर्बाद हो गए हैं।

मेहनतकश लोगों को भारी तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है जबकि इस संकट के बावजूद सबसे-बड़े अमीर अरबपतियों की दौलत में भारी बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2020 में पूंजीवादी कंपनियों के मुनाफ़े पिछले वर्ष की तुलना में 22 प्रतिशत अधिक थे, जबकि इन कंपनियों में मज़दूरों के औसतन वेतन में केवल 4 प्रतिशत से भी कम की बढ़ोतरी हुई।

कर राजस्व में भारी गिरावट आई है और सरकारी कर्ज़ 2020-21 के मूल बजट के लक्ष्य को बहुत पहले ही पार कर चुका है। केंद्र और राज्य स्तर पर कई आवश्यक सेवाओं और सामाजिक कार्यक्रमों पर होने वाले खर्च में भारी कटौती की गयी है और वह मूल बजट के अनुमान से बहुत कम हो गया है।

बजट से कुछ सप्ताह पहले ऐसा अंदेशा था कि आने वाले वर्ष में अतिरिक्त राजस्व इकट्ठा करने के लिए सरकार कोविड कर या सरचार्ज जैसे असाधारण कर लगाने की कोशिश करेगी। कुछ अर्थशास्त्री यह तर्क दे रहे थे कि एक असाधारण बजट की ज़रूरत है, जिसके तहत इन मुश्किल परिस्थितियों में ग़रीबों की मदद करने के लिए सबसे अमीर लोगों पर अतिरिक्त कर लगाये जाने चाहिएं।

पूंजीपति ऐसे किसी भी नए कर के खि़लाफ़ थे जिससे उनके मुनाफ़ों को नुकसान होगा। वे अपने बिक्री और मुनाफ़े में उच्चतम दर वाली विकास दर को वापस हासिल करना चाहते हैं। लेकिन मेहनतकश लोगों की क्रय शक्ति की कमी के चलते उनकी मौजूदा उत्पादन क्षमता में भी गिरावट आई है। पूंजीपति अपनी उत्पादकता को बढ़ाने के लिए निवेश करने को तैयार नहीं हैं, जब तक कि उनके कारखानों में बनाई गई वस्तुओं के लिए बाज़ार में मांग नहीं बढ़ती। वे चाहते हैं कि स्टील, सीमेंट और अन्य औद्योगिक वस्तुओं की मांग को बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ढांचागत परियोजनाओं पर अपने खर्चे को बढ़ाये।

2021-22 के दौरान राजस्व का अनुमान

1 फरवरी को पेश किये गए बजट का पूंजीपति वर्ग ने खुशी के साथ स्वागत किया क्योंकि कंपनी करों में कोई बढ़ोतरी नहीं की गयी और ऊंची आमदनी पाने वाले लोगों पर कोविड या किस अन्य प्रकार के कर का बोझ नहीं डाला गया।

यह बजट इस विश्वास पर आधारित है कि तेज़ गति से पूंजीवादी आर्थिक विकास से कर आय में बढ़ोतरी होगी और वह तालाबंदी से पहले के स्तर से थोड़ा ऊपर पहुंच जाएगी। 2019-20 की तुलना में आने वाले वित्त वर्ष में अप्रत्यक्ष कर और व्यक्तिगत आयकर क्रमशः 15 प्रतिशत और 14 प्रतिशत अधिक होने की उम्मीद है। दूसरी ओर कंपनियों के मुनाफ़ों और शेयरों के लेनदेन पर लगाये जा रहे कर से दो वर्ष पहले जितना ही कर इकट्ठा किया गया था, उससे 2 प्रतिशत कम कर इकट्ठा किया जायेगा (देखें चार्ट-क)।

दूसरे शब्दों में कहा जाये तो इन भयंकर हालतों में भी मेहनतकश लोगों पर करों का बोझ पहले से भी अधिक डाला जा रहा है जबकि पूंजीवादी कंपनियां पहले से कम करों का भुगतान करेंगी। केंद्रीय कर नीति की पूंजीवाद परस्त दिशा में रत्तीभर भी बदलाव नहीं आया है और यहां तक कि लोगों को किसी भी तरह की अस्थायी राहत भी नहीं दी गयी है। इस मुश्किल समय में भी ग़रीबों को और अधिक तीव्रता से लूटा जायेगा।

व्यय लक्ष्य

केंद्र सरकार के व्यय के लक्ष्य को बढ़ाकर 33 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है जो कि तालाबंदी से पहले वर्ष 2019-20 में 26 लाख करोड़ रुपये था।

केंद्रीय बजट की प्रमुख श्रेणियां जिनपर अधिक व्यय किया जायेगा वे इस प्रकार है: कर्ज़ पर ब्याज का भुगतान, रक्षा में पूंजीगत व्यय यानी हथियारों की खरीदी, यातायात और संचार में पूंजी निवेश और पेयजल आपूर्ति। 2019-20 की तुलना में कृषि और संबंधित गतिविधियों के लिए खर्चे में बेहद छोटी बढ़ोतरी की गयी है। महामारी और तालाबंदी की वजह से देशभर में करोड़ों बच्चे डिजिटल शिक्षा से वंचित रहे। उनका पूरा साल बर्बाद हो गया, इसके बावजूद शिक्षा के लिए केंद्र के योगदान में कुछ भी बदलाव नहीं किया गया है, जो कि पहले से ही बेहद कम है (चार्ट-ख)। कोविड संकट ने देश के अधिकतम हिस्सों में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की खस्ता हालत, धन और मानव संसाधनों की भयंकर कमी का पर्दाफाश कर दिया। लेकिन इसके बावजूद राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए आवंटन को नहीं बढ़ाया गया है।

केंद्र सरकार के कुल राजस्व के अनुपात में कर्ज़ों पर ब्याज के भुगतान का प्रमाण 2019-20 में 36 प्रतिशत से बढ़कर 2021-22 में 45 प्रतिशत हो गया है। 2021-22 में लिए जाने वाले कर्ज़ पर अतिरिक्त ब्याज से यह प्रमाण और अधिक बढ़ जायेगा। सार्वजनिक संसाधनों पर परजीवी साहूकारों के दावों में ख़तरनाक बढ़ोतरी हुई है।

कर्ज़ और निजीकरण के लक्ष्य

Chart-C2019-20 में इकट्ठा किये गए कुल राजस्व की तुलना में इस वर्ष हुई बहुत कम वृद्धि के चलते, कुल व्यय में की गयी भारी बढ़ोतरी के लिए धन जुटाने हेतु केंद्र सरकार अपने कर्ज़ को 1.5 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाने की योजना बना रही है, जबकि 2020-21 में पहले ही 2 लाख करोड़ का कर्ज़ लिया जा चुका है। इसके अलावा सरकार ने निजीकरण और विनिवेश के कार्यक्रम को तेज़ी से लागू करने का लक्ष्य रखा है (चार्ट-ग)।

यदि व्यय के स्तर में असामान्य बढ़ोतरी शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य ज़रूरी सेवाओं के लिए होती, जहां पहले से ही कम निवेश किया जाता रहा है और जहां इसकी बेहद ज़रूरत है, तो इस बढ़ोतरी को न्यायसंगत बताया जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया है। पूंजी निवेश मुख्य तौर पर केवल उन क्षेत्रों में किया जा रहा है जहां पूंजीपति वर्ग को ज़रूरत है। इसके अलावा व्यय में बढ़ोतरी मुख्य तौर से कर्ज़ों पर ब्याज के भुगतान और हथियारों की ख़रीदी के लिए की जा रही है।

मज़दूर वर्ग और मेहनतकश लोगों को वर्षों से बताया जा रहा है कि उनकी ज़रूरतों को पूरा करना संभव नहीं है, क्योंकि राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण रखने की ज़रूरत है और सरकार का कर्ज़ा इस हद तक बढ़ाया नहीं जा सकता कि उसे टिकाया न जा सके। अब एकदम अलग एक नया राग अलापा जा रहा है। “जब तक हम सकल घरेलू उत्पाद की गति को बढ़ाने में सफल रहते हैं, तब तक हमें ऊंचे राजकोषीय घाटे और कर्ज़ों के बारे में चिंता करने की ज़रूरत नहीं है” – सरकार अब इस मंत्र को बढ़ावा दे रही है। सरकार के दावे से इस बात का पर्दाफाश हो जाता है कि पूंजीपति वर्ग के कोई असूल नहीं हैं। पूंजीपति वर्ग की सेवा के लिए वचनबद्ध सरकार, पूंजीपतियों के हितों के अनुसार अपना राग बदलती रहती है, और वही राग अलापती रहती है जो उस समय ज़रूरी है।

सरकारी कर्ज का ऊँचे स्तर तक बढ़ाये जाने में बैंकों और वित्तीय संस्थानों को ही फ़ायदा है। जब निजी कंपनियों को कर्ज़ा देने में भारी अनिश्चितता और जोखिम है, ऐसे समय में बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अपने खातों में ऊंचे स्तर पर बगैर-जोखिम वाले सरकारी कर्ज़ की गारंटी मिल गयी है।

इस बजट में निजीकरण पर ज़ोर देना यह दिखाता है कि मौजूदा हालत में इजारेदार पूंजीपति अपने लिए इसे एक पसंदीदा आयाम मानते हैं, जहां उनकी अतिरिक्त पूँजी का निवेश किया जा सकता है। सस्ते दामों पर सार्वजनिक संपत्तियों को हड़पने में उनको भारी मुनाफ़ें नज़र आ रहे हैं, जहां बने-बनाये बाज़ारों, वितरण व्यवस्था और महंगी ज़मीन पर उनका कब्ज़ा होगा।

कुछ खास उद्योगों में बिक्री और मुनाफ़ों को बढ़ाने के लिए बजट में कई नीतिगत घोषणाएं की गयी हैं। उदाहरण के लिए पुरानी कार और व्यवसायिक वाहनों को रद्दी करने के लिए देश-व्यापी नीति का मक़सद ऑटो कंपनियों की बिक्री को बढ़ाना है। कोरोना वायरस से लड़ने के लिए टीके की आपूर्ति को सार्वजनिक खर्चे से चलाये जा रहे कार्यक्रम के तहत लाकर सरकार ने दवा कंपनियों को अधिकतम मुनाफ़ों की गारंटी दी है।

राजधर्म के नाम पर पूंजीवादी शासन

नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा-नीत सरकार राजधर्म के सिद्धांत का पालन करने का दिखावा कर रही है। बजट पेश किये जाने से दो दिन पहले वित्त मंत्रालय ने आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया। इस सर्वेक्षण में संस्कृत में लिखे कालिदास के एक श्लोक को शामिल किया गया था, जिसका अर्थ है:

“प्रजा कल्याण के लिए राज्य उसी प्रकार करों की वसूली करता है, जिस प्रकार सूर्य पानी को भाप में बदल कर, फिर उसे कई गुना बढ़ाकर वर्षा के रूप में बरसाता है।”

“वह (दिलीप) प्रजा वर्ग से कर तो लेता था, परंतु उसकी ही उन्नति के लिए। सूर्य भी रस खींचता है, पर उसे हजार गुना करके बरसा देने के लिए!” (अध्याय 1, श्लोक 18) – महाकवी कालिदास रचित रघुवंशम

1 फरवरी को जो बजट पेश किया गया था वह इस सिद्धांत का बेशर्मी से उल्लंघन करता है। यह बजट इस विचार पर आधारित है कि पूंजीवादी संकट का बोझ लोगों के कंधों पर लादा जाये। लोगों से करों की वसूली बिल्कुल भी सूर्य द्वारा सभी जलाशयों के पानी को भाप बनाने जैसा नहीं है। बजट में अमीर शोषकों की तुलना में, मेहनतकश लोगों से अधिक वसूली की जा रही है।

करों के रूप में जो कुछ लोगों से छीना जा रहा है, वह भाप से बने पानी की वर्षा के रूप में वापस धरती पर वापस आएगा, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। शोषण के शिकार लोगों से जो संसाधन छीन लिए जाते हैं, उन्हें इजारेदार पूंजीपतियों ने हितों के अनुसार खर्च किया जाता है।

निष्कर्ष

सारांश में 2021-22 के केंद्रीय बजट का एकमात्र लक्ष्य इस भारी संकट के बोझ को इसके शिकार हुए मेहनतकश लोगों के कंधों पर डालना है और पूंजीपतियों के लिए अधिकतम मुनाफ़ों की गारंटी देना है।

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