हर प्रकार की बीमारी से मुनाफ़ा कमाना ही दवा उद्योग का मुख्य उद्देश्य और प्रेरणा है

लोगों को विभिन्न बीमारियों से बचाने के लिए टीकों की और बीमार होने पर उन्हें ठीक करने के लिए दवाओं की आवश्यकता होती है। हालांकि, हमारे देश और सभी पूंजीवादी देशों में लोगों को यह सेवा प्रदान करना दवा उद्योग का मक़सद नहीं है। लोगों की बीमारी से मुनाफ़ा कमाना और जल्दी ठीक होने की उनकी इच्छा का लाभ उठाना ही दवाइयां और टीके बनाने वाली कंपनियों के व्यापार का आधार है। सभी देशों के लोगों के लिए यह सच गंभीर चिंता का कारण है।

पूंजीवाद विकसित होकर, जब से इजारेदार पूंजीवाद में परिवर्तित हुआ है, कई छोटे उत्पादकों के बीच प्रतिस्पर्धा की जगह पर अब सभी उत्पादक वस्तुओं के बाज़ार में कुछ गिनी-चुनी बड़ी इजारेदार कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा और मिली-भगत से बाज़ारों पर अपना दबदबा क़ायम करने की होड़ होती है। दवाओं के बाज़ार में कुछ इजारेदार कंपनियों का वर्चस्व बहुत अधिक है। हिन्दोस्तान और दुनिया के अधिकांश बाज़ारों में मुट्ठीभर दवा कंपनियां दवा उद्योग पर हावी हैं।

वर्तमान कोविड संकट के दौरान लोग चाहते थे कि हिन्दोस्तान और दुनिया में दवा और टीके के उद्योग से जुड़ी कंपनियां सस्ती दवाओं और टीकों को दुनियाभर के लोगों को उपलब्ध करायें और कोविड-पीड़ित करोड़ों लोगों की मदद के लिए आगे आएं। इसके विपरीत, सच तो यह है कि शुरू से ही हिन्दोस्तानी और वैश्विक दवा उद्योग से जुड़ी कंपनियों ने कोविड के इस संकट को अपने उत्पादों की बिक्री और अपने मुनाफ़े में बढ़ोतरी के लिए एक अच्छे मौक़े के रूप में देखा।

दवा उद्योग की अधिकतम लाभकारिता, एक तरफ दवा कंपनियों के पास मूल्य निर्धारण की इजारेदारी की ताक़त होना है तो दूसरी तरफ रोगियों की बेबसी पर आधारित है। दवाओं की क़ीमतों का उनके उत्पादन की लागत से कोई संबंध नहीं है। अधिकतम मुनाफ़ा बनाने के लिए कंपनियों को जो क़ीमतें चाहिएं, वे वही क़ीमतें निर्धारित करती हैं। मूल्य निर्धारण की इस पद्धति ने दवा उद्योग को हिन्दोस्तान व दुनियाभर में विनिर्माण के सबसे अधिक लाभदायक क्षेत्रों में से एक बना दिया है।

मेहनतकश लोगों ने बैंकों के अपने बचत खातों से केवल 3-4 प्रतिशत का ब्याज ही कमाया है जबकि, देश की सबसे बड़ी विनिर्माण कंपनियों और कार उत्पादकों में से एक, मारुति-सुजुकी का पिछले पांच वर्षों में औसत मुनाफ़ा प्रति वर्ष 9.2 प्रतिशत था। देश की सबसे मूल्यवान कंपनी (बाज़ार पूंजीकरण के संदर्भ में), रिलायंस उद्योग ने पिछले पांच वर्षों में औसत मुनाफा 11 प्रतिशत प्रति वर्ष कमाया है। दवा उद्योग मुनाफ़े की दर में इन कंपनियों को भी पीछे छोड़ देता है। पिछले एक दशक (2007-2016) में देश की 12 सबसे बड़ी दवा कंपनियों के कमाये गये मुनाफ़े के विश्लेषण से पता चला कि औसत शुद्ध लाभ (बिक्री के अनुपात में शुद्ध मुनाफ़ा) 17.5 प्रतिशत से अधिक था और विभिन्न कंपनियों का मुनाफ़ा 10.4 प्रतिशत से 31.1 प्रतिशत के बीच में था!

दवाओं की बिक्री के मुनाफ़े से बनी संपत्ति ने हिन्दोस्तान के 15 पूंजीपतियों को विश्व के डॉलर-अरबपतियों (7,500 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति रखने वाले पूंजीपतियों) की सूची में पहुंचा दिया है। वे देश के 100 सबसे अमीर पूंजीपतियों में गिने जाते हैं। देश की सबसे बड़ी दवा कंपनी सन फार्मा के मालिक दिलीप शांघवी, देश के दस सबसे अमीर पूंजीपतियों में से एक हैं।

देश की दस सबसे बड़ी दवा कंपनियों के पूंजीपति मालिकों ने, कोविड संकट के शुरू के छह महीनों के दौरान अपनी संपत्ति में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हासिल की। जिनमें से कुछ की दौलत में 75 प्रतिशत से भी अधिक वृद्धि हुई।

अधिकतम मुनाफ़ा कमाने के लिए पेटेंट कराना दवा कंपनियों का पसंदीदा तरीका बन गया है। उदाहरण के लिए एड्स के लिए पेटेंट दवाओं का मूल्य दवा कंपनियों द्वारा इतना अधिक रखा गया है कि एक मरीज को अपना इलाज करने के लिए प्रति वर्ष 7.4 लाख रुपये का खर्चा करना पड़ता है। इस तरह से ये दवाएं अधिकांश रोगियों की पहुंच से बाहर हो गयी हैं। उन देशों में जहां पर ऐसे पेटेंट कराने की अनुमति नहीं है, वहां की कंपनियों ने इन्हीं दवाओं का उत्पादन जब वैकल्पिक तरीकों से किया, तो उपचार की लागत प्रति वर्ष 15,000 रुपये से भी कम हो गई। इसके बावजूद इन दवाओं के उत्पादकों ने अच्छा-खासा मुनाफ़ा कमाया है।

अतीत में, अपने देश में दवा बाज़ार पर विदेशी कंपनियों की इजारेदारी के खि़लाफ़ हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों ने लड़ाई लड़ी, उनका विरोध किया और सरकार ने आवश्यक दवाओं पर मूल्य-नियंत्रण का कानून लागू किया ताकि दवाओं को आम लोगों के लिए सस्ता बनाया जा सके। आज 21वीं सदी में, हिन्दोस्तानी दवा कंपनियां, जो दुनिया के स्तर पर बड़ी कंपनियों की सूची में गिनी जाती हैं, उन्होंने भी विदेशी इजारेदार कंपनियों की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया है, जिस व्यवहार का उन्होंने उस समय विरोध किया था जब वे इतनी बड़ी नहीं थीं । जबकि एक समय पर उन्होंने देश में, उत्पाद पेटेंट के विरोध में और उसके स्थान पर प्रक्रिया पेटेंट लागू करने के लिए लड़ाई लड़ी थी, अब ये कंपनियां स्वयं विश्व स्तर पर प्रतिद्वंद्वी और इजारेदार कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए उत्पाद पेटेंट का उपयोग करती हैं। (देखें बॉक्स)

जैसे-जैसे हिन्दोस्तानी दवा कंपनियों का आर्थिक विकास हुआ, वैसे-वैसे उनका राजनीतिक दबदबा बढ़ता गया। परिणामस्वरूप, सरकार की दवा मूल्य नीति, जिसका उद्देश्य पहले सभी लोगों के लिए आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना था, अब उसी सरकार की दवा मूल्य नीति, दवा कंपनियों के लिए इजारेदार मुनाफ़े की गारंटी देने की दिशा में तेज़ी से उन्मुख हो गई है। आवश्यक दवाओं के मूल्य निर्धारण के लिए नीति में एक बड़ा संशोधन, 1995 में किया गया था जिसके कारण दवाओं की क़ीमतों में एक बड़ा उछाल आया। 1998 में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि 1995 की क़ीमतों की तुलना में कई दवाओं की क़ीमतें दोगुनी से भी अधिक हो गई हैं। (देखें तालिका-1)।

आवश्यक दवाओं के मूल्य निर्धारण के लिए नीति में अगला बड़ा बदलाव 2013 में लाया गया। जिसके तहत वास्तव में दवा की क़ीमतों पर नियंत्रण को पूरी तरह से हटा दिया गया है। इसके अनुसार, बाज़ार में जिस दाम पर दवाएं बेची जा रहीं थीं उस दाम में सभी उत्पादकों द्वारा दवाइयों की औसत कीमत में 16 प्रतिशत खुदरा दुकानदार का लाभ और जोड़कर अधिकतम खुदरा मूल्य निर्धारित करने की छूट दी गयी और इस मूल्य का उत्पादन की लागत से कोई संबंध नहीं है।

उदाहरण के लिए यदि एक गोली बनाने की लागत 10 रुपये है और विभिन्न ब्रांड उसी गोली को 20 से 40 रुपये में बेचते हैं, तो फिर उस गोली का अधिकतम मूल्य इस तरह निर्धारित होगा – औसत मूल्य 30 रुपये और खुदरा दुकानदार का 16 प्रतिशत लाभ जोड़कर 34.80 रुपये हुआ, इस तरह से इस गोली का बाज़ार में अधिकतम दाम 34.80 रुपये होगा। इसके अलावा, क़ीमत को हर साल 10 प्रतिशत तक बढ़ाने की अनुमति भी उत्पादकों को दी गयी है।

एक अध्ययन ने इस बात की पुष्टि की है कि नवीनतम मूल्य निर्धारण नीति दवा उद्योग के लिए अत्यधिक फ़ायदेमंद है। इसका नतीजा यह हुआ है कि आवश्यक दवाओं के दाम गैर-आवश्यक दवाओं की तुलना में अब बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं।

1,751 दवाओं और 49,893 ब्रांडों की क़ीमतों के विश्लेषण किए गए। आंकड़ों से पता चला है कि औसतन, मूल्य निर्धारण नीति के तहत आने वाली दवाओं की क़ीमतें, सक्रिय संघटक के प्रति मिलीग्राम 71 रुपये की दर से बढ़ी हैं, जबकि उन दवाओं के लिए जो मूल्य निर्धारण नीति के दायरे से बाहर थी, उनकी क़ीमतों में केवल 13 रुपये प्रति मिलीग्राम सक्रिय संघटक की दर से वृद्धि हुई है।

मेहनतकश लोगों द्वारा अपने स्वास्थ्य की देखभाल के लिए किए गए खर्च का एक बहुत बड़ा हिस्सा दवाइयों पर किया जाने वाला खर्च है। वे चाहते हैं कि उन्हें आवश्यक दवाइयां, सस्ते पर उपलब्ध करायी जाएं। उनका एक जायज़ प्रश्न यह है कि अगर सरकार यह दावा करती है कि हिन्दोस्तान “दुनिया की फार्मेसी” है, तो फिर इसका लाभ लोगों को क्यों नहीं मिलता। जब दवाइयों के दाम उन स्तरों पर निर्धारित किये जाते हैं, जिन दामों पर हिंदोस्तान के ज्यादातर लोग खरीद ही नहीं सकते। और यदि किसी बड़ी बीमारी के इलाज में उनको ये दवाइयां जबरदस्ती खरीदनी पड़ती हैं तो वे जीवन भर के लिए कर्ज़ में डूब जाते हैं। गौर करने की बात यह है कि हिन्दोस्तानी राज्य, इजारेदार पूंजीपतियों के हितों की सेवा करने में व्यस्त है, ताकि दवा कम्पनियां दवाइयों की क़ीमत, अपना अधिकतम मुनाफा बनाने के लिए निर्धारित कर सकें।

अगर राज्य यह सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी नहीं लेता है कि हर मरीज को सस्ती क़ीमत पर दवाएं उपलब्ध होंगी तो जीवन के अधिकार का कोई मतलब नहीं है। पेटेंटिंग और एकाधिकार उत्पादन की अनुमति देना और दवाओं को मनमानी क़ीमतों पर बेचना, एक समाज-विरोधी अपराध है। राज्य को पूंजीवादी लालच और इजारेदार “अधिकार” के लिए इस खुली छूट को बंद करना चाहिए। उसे अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी को निभाना चाहिए और आम लोगों के जीवन के अधिकार की रक्षा करनी चाहिए।

पेटेंट और इजारेदारी मूल्य निर्धारण

किसी देश के पेटेंट कानूनों का दवा की क़ीमतों पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। मोटे तौर पर दो तरह के पेटेंट कानून हैं। एक कानून को “उत्पाद पेटेंट” कहा जाता है जो उत्पाद का आविष्कार करने वाले को एकाधिकार देता है। इस कानून के तहत, किसी वैकल्पिक विधि द्वारा भी पेटेंट एंव उत्पाद, किसी और के द्वारा उत्पादित नहीं किया जा सकता है।

दूसरे कानून को “प्रोसेस पेटेंट” कहा जाता है और यह केवल उत्पाद बनाने की पेटेंट पद्धति के लिए एकाधिकार देता है। वैकल्पिक तरीकों के माध्यम से उत्पाद दूसरों द्वारा भी निर्मित किया जा सकता है।

“उत्पाद पेटेंट” “प्रक्रिया पेटेंट” की तुलना में एक अधिक मजबूत एकाधिकार का  अधिकार प्रदान करता है। दवाइयों को बनाने वाली इजारेदार कंपनियों का तर्क है कि ’उत्पाद पेटेंट’ के माध्यम से दिया गया, एकाधिकार उत्पाद अधिकार, नई दवाओं की खोज को प्रोत्साहन देने के लिए आवश्यक हैं।

उत्पाद के एकाधिकार, जिसे ’उत्पाद पेटेंट’ द्वारा अनुमति दी जाती है, इसका उपयोग इजारेदार दवा कंपनियों द्वारा पेटेंट की गई दवाओं के लिए मनमानी मूल्य वसूलने के लिए किया जाता है। हिन्दोस्तान में 1911 का पेटेंट कानून, उत्पाद पेटेंट की अनुमति ब्रिटिश शासकों द्वारा ब्रिटिश उत्पादकों को हिन्दोस्तानी बाज़ार पर एकाधिकार स्थापित करने में मदद करने के लिए लाया गया था। यह कानून 1970 तक जारी रहा जिसके कारण बहुराष्ट्रीय दवाइयों का एकाधिकार हिन्दोस्तानी बाज़ार पर हावी हो गया।

हिन्दोस्तानी दवा उत्पादकों ने 1970 में तत्कालीन सरकार के ज़रिये एक नया पेटेंट कानून लाने में सफलता प्राप्त की। जिसके तहत, उत्पाद पेटेंट को रद्द कर दिया गया और केवल प्रक्रिया पेटेंट की अनुमति दी गयी। इसके द्वारा भारतीय दवा उत्पादकों को वैकल्पिक मार्गों से दवाओं का उत्पादन करने और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एकाधिकार को समाप्त करने की आज़ादी मिली। डब्ल्यू.टी.ओ. के नियमों के तहत, 2005 में उत्पाद पेटेंट को और उसको अधिक लंबी अवधि के लिए लागू करने के लिए, हिन्दोस्तानी पेटेंट कानून में फिर से संशोधन किया गया।

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