रेलवे मज़दूरों की कार्य की परिस्थिति : ऑल इंडिया गार्ड्स कौंसिल के महासचिव के साथ साक्षात्कार

मज़दूर एकता लहर (म.ए.ल.) भारतीय रेल में लोको पायलट, गार्ड, स्टेशन मास्टर्स, रेलगाड़ी कंट्रोलर, सिग्नल व टेलीकॉम मेंटेनेंस स्टाफ, ट्रैक मेंटेनर, टिकट चेकिंग स्टाफ, आदि का प्रतिनिधित्व करने वाली श्रेणीबद्ध एसोसिएशनों के नेताओं के साथ साक्षात्कार करके, उनका प्रकाशन कर रहा है। इस श्रृंखला के दूसरे भाग में, यहां पर हम ऑल इंडिया गार्ड्स कौंसिल (ए.आई.जी.सी.) के महासचिव, कॉमरेड एस.पी. सिंह (एस.पी.एस.) के साथ किये गए साक्षात्कार को प्रस्तुत कर रहे हैं।

म.ए.ल. : भारतीय रेल में गार्डों को किन मुख्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है?

एस.पी.एस. : 14 से 20 घंटे की रेलगाड़ी पर लंबे समय की ड्यूटी, छुट्टी तथा समय-समय पर (साप्ताहिक) अवकाश न मिलना गार्डों के स्वास्थ्य को बहुत जोखिम में डालता है। जबकि कई जगह मज़दूरों को एक हफ्ते में न्यूनतम 40 घंटे की अवधि का विश्राम मिलता है, गार्डों को महीने में चार बार केवल 30 घंटे साप्ताहिक विश्राम के रूप में दिए जाते हैं या 22 घंटे महीने में 5 बार!

गार्डों को गैरकानूनी निर्देशों का पालन करने के लिए तानाशाही पूर्ण आदेश दिये जाते हैं। उदाहरण के लिए गार्डों को रूट की जानकारी और ब्रेक पावर सर्टिफिकेट के बिना काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। जब भी किसी गार्ड को कोई नया मार्ग दिया जाता है, तो उसको उस मार्ग पर कम से कम तीन बार यात्रा करना लाजिमी है ताकि वह स्टेशनों और मार्ग के संकेतों से परिचित हो सके। इसे ”लर्निंग रोड“ कहा जाता है। सी. एंड डब्ल्यू. (कैरिज एंड वैगन) विभाग ”ब्रेक पॉवर सर्टिफिकेट“ जारी करके रेलगाड़ी को यात्रा के लिए प्रमाणित करता है। परन्तु, मालगाड़ियों के लिए इसे अनावश्यक मानकर रेल चालकों और गार्डों को ही इसे प्रमाणित करने के लिए रेलगाड़ी की परीक्षा करने के लिये बाध्य किया जाता है!

मालगाड़ी के गार्डों को जीर्ण-शीर्ण ब्रेक वैन के उपयोग के लिए मजबूर किया जाता है, जिनमें 21वीं सदी में भी पानी, पंखे, प्रकाश, बैठने तथा सफाई व्यवस्था क का इंतजाम नहीं होता है!

रेलवे अधिकारियों का कहना है कि उनके पास महिला रेल चालकों, सहायक महिला रेल चालकों और महिला गार्डों के लिए विशेष महिला शौचालय उपलब्ध कराने के लिए धन नहीं है, हालांकि ये पिछले डेढ़ दशकों से कार्यरत हैं। सभी नई भर्तियों को पुरानी पेंशन योजना के तहत लाने के लिए भी रेलवे धन न होने का दावा करता है परन्तु, पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने की योजनाओं पर बर्बाद करने के लिए इनके पास धन होता है जिसका विवरण मैं आगे दूंगा।

म.ए.ल. : आपके काम करने के हालात कितने सुरक्षित हैं? उदाहरण के लिए, हर साल सैकड़ों ट्रैक मेंटेनर हादसों का शिकार होकर अपनी जान खो बैठते हैं। असुरक्षित कार्य परिस्थिति के कारण क्या गार्डों के बीच भी कोई हताहत हुआ है?

एस.पी.एस. : हालांकि, ट्रैक मेंटेनर की श्रेणी की तुलना में जानलेवा दुर्घटनाएं कम होती हैं, लेकिन गंभीर हादसे नियमित रूप से होते हैं। समय पर उचित चिकित्सा न उपलब्ध कराने के कारण कोविड-19 से कुछ गार्डों की मौत हो गई। 12 जुलाई, 2020 को पश्चिम रेलवे के वडोदरा डिवीजन के साबरमती स्टेशन पर नियमों के गम्भीर उल्लंघन के फलस्वरूप एक मालगाड़ी के गार्ड की मृत्यु हो गई। गार्डों की मौत की संख्या कम है, लेकिन हमें ट्रैक मेंटेनर्स की कार्य परिस्थितियों पर गंभीर चिंता है।

म.ए.ल. : गार्डों की कार्य परिस्थितियां रेल यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा को किस तरह प्रभावित करती हैं?

एस.पी.एस. : प्रशासन धमकी और बल का प्रयोग करके समय की पाबंदी के नाम पर असुरक्षित परिस्थितियों में रेलगाड़ियों को चलाने के लिए हमें मजबूर करता है। प्रणाली ऐसी है जिसमें न केवल वह रेलगाड़ी जिसमें वह गार्ड ड्यूटी पर है, बल्कि माल या एक्सप्रेस रेलगाड़ी जो बगल की लाइन पर हो उसका भी सुरक्षित स्थिति में होना ज़रूरी है ताकि यात्रा करने वाली जनता की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। खुले वैगनों में भरा गया कोयला तिरपाल से ढका नहीं जा रहा है (हालांकि रेलवे के नियम स्पष्ट हैं कि इसे ढका जाना चाहिए)। इसकी धूल यात्रियों की आंखों और भोजन के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों को भी प्रदूषित करती है। दमा के मरीजों को सांस लेने में तकलीफ होती है और इससे शिशु सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। कोयले से लदी इन रेलगाड़ियों के गार्ड सबसे अधिक प्रभावित होते हैं क्योंकि वे सिर से पैर तक कोयले की धूल से ढंक जाते हैं और यह उनकी आंखों और मुंह में भी चला जाता है।

कुछ मामलों में, ख़राब दरवाज़े अपने-आप खुल जाते हैं जिससे ओ.एच.ई. (ओवरहेड इलेक्ट्रिफिकेशन) खम्भों को नुकसान हो सकता है और ये खम्भे पटरियों पर गिर सकते हैं या कभी-कभी डिब्बों में बैठे यात्रियों को गंभीर चोटें भी पहुंचा सकते हैं।

म.ए.ल. : भारतीय रेल में कदम-दर-कदम लाया जा रहा निजीकरण किस प्रकार गार्डों को प्रभावित कर रहा है?

एस.पी.एस. : निजीकरण ने गार्डों को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है और उन्हें कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। सर्वप्रथम, सहायक गार्डों के पद की समाप्ति के परिणामस्वरूप 5,000 से अधिक सहायक गार्डों के पद समाप्त हो गए हैं।

फ्रंट लगेज वैन और गार्ड लॉबियों के पट्टे निजी ठेकेदारों को दिए जा रहे हैं। इसके फलस्वरूप निजी ठेकेदारों द्वारा अन्धाधुन्ध वजन लादने से गार्ड लॉबियां और केबिन क्षतिग्रस्त हो रहे हैं। गार्डों की सीटें, डॉगबॉक्स, लिखने की मेज, आदि नियमित रूप से टूटते जा रहे हैं।

समर्पित-माल-गलियारों (डी.एफ.सी.) को, जिन्हें रेलवे के धन से विकसित किया जा रहा है, उन्हें निजी कंपनियों को सौंपा जा रहा है। बल्कि केंद्र सरकार ने इन निजी कंपनियों को सुरक्षा नियमों को तय करने और प्रतिदिन काम के घंटों का नियम (एच.ओ.ई.आर.) और कर्मकार क्षतिपूर्ति अधिनियम जैसे अन्य श्रम कानूनों को तय करने की अनुमति भी इन निजी कंपनियों को दे दी है। उनके नियमों के इरादे बहुत स्पष्ट हैं कि रेलगाड़ियों में गार्ड नहीं होंगे। गार्डों के बजाय, उन्होंने एंड ऑन रेलगाड़ी टेलीमेट्री (ई.ओ.टी.टी.) मशीनों के प्रावधान की मांग की है। सरकार और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (डी.एफ.सी.सी.आइ.एल.) के बीच एक समझौता हुआ है जिसके रहते रेलवे के गार्डों के स्थान पर रेलवे ई.ओ.टी.टी. मशीनें प्रदान करेगा। प्रत्येक मशीन पर 12 लाख रुपये खर्च होंगे। सरकार ने पहले ही 100 करोड़ रुपये की वैश्विक निविदाएं आमंत्रित की हैं। यह सार्वजनिक धन की सरासर फिजूलखर्ची है। इस एक तरफा फैसले के कारण हजारों युवाओं ने नौकरी के अवसर खो दिये गये हैं और ग्रुप डी के कर्मचारियों ने पदोन्नति के अवसर खो दिए हैं।

तकनीकी विकास के नाम पर सरकार मुख्य लाइनों पर भी गार्डों की जगह ई.ओ.टी.टी. मशीनों का इस्तेमाल करने के लिये दृढ़ संकल्प है। इस क़दम से हजारों युवाओं के सपने चकनाचूर हो जाएंगे। गार्ड एक सभ्य जीवन स्तर खो देंगे। मौजूदा गार्डों को निचले ग्रेड में काम करने के लिए मजबूर किया जाएगा और बहुत सारे अपनी नौकरी खो बैठेगें। इससे यात्रियों की सुरक्षा ख़तरे में आ जायेगी।

रनिंग रूमों का निजीकरण कर दिया गया है। परिणामस्वरूप उचित स्वच्छता, भोजन की गुणवत्ता आदि का स्तर घट गया है। जब यह रेलवे विभागीय रखरखाव के अधीन था, तब चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित रसोइये और कर्मचारी अच्छा भोजन तैयार करते थे।

लॉबियों का भी निजीकरण हो रहा है। अकुशल कर्मचारियों को एच.ओ.ई.आर., श्रम कानूनों और ड्यूटी चलाने की प्रणाली के बारे में जानकारी नहीं होती है। ऐसे कर्मचारी चालक दल आधारित बुकिंग प्रणाली पर निर्भर रह जाते हैं और इसकी वजह से गार्डों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कई बार जब इंटरनेट की समस्याएं होती हैं, तब गार्डों की कड़ी मेहनत से अर्जित वैध किलोमीटर भी ठीक से दर्ज नहीं हो पाते हैं।

बॉक्स-पोर्टर्स को हटाकर निजी बॉक्स-पोर्टर्स प्रदान किए गए हैं जो ज़िम्मेदारी से काम नहीं करते। इस वजह से रेलगाड़ियों को रुकना पड़ता है और देरी होती है। इस प्रायोजन का उपयोग करते हुए प्रशासन ने हमें लगभग 12 से 15 किलोग्राम वजन के लाइन बॉक्स उपकरण ट्रॉली बैग में ले जाने का आदेश दिया है। यह एक अतिरिक्त बोझ है और रेलवे यार्ड की कठिन परिस्थिति में गार्डों के लिए सूटकेस व लाइन बॉक्स को सुरक्षा पूर्वक घसीटना बेहद कठिन है।

मैं इस बात पर ज़ोर देना चाहूंगा कि रेलवे पिछड़े क्षेत्रों को बुनियादी जुड़ाव प्रदान नहीं करना चाहता है क्योंकि वे दावा करते हैं कि इन क्षेत्रों में नई लाइनें बिछाना आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं है। हालांकि निजी कंपनियों को लाभान्वित करने के लिए वे अपने क़ीमती राजस्व को उच्च गति गलियारे पर खर्च करने को तैयार हैं। सरकार के पास नई संसद भवन, बुलेट रेलगाड़ी गलियारे आदि बनाने के लिए धन है, लेकिन उसके पास अपने कर्मचारियों को महंगाई भत्ता या महंगाई राहत देने तथा रेल यात्रियों और रेल कर्मचारियों के हितों की देखभाल करने के लिए लिए पर्याप्त धन नहीं है।

महामारी के बहाने रेलवे नियमित रेलगाड़ी सेवाओं के बजाए स्पेशल रेलगाडियां चलाकर जनता से करोड़ों का धन लूट रही है। ग़रीब आदमी की पैसेंजर रेलगाड़ियों को फिर से शुरू करने पर सरकार चुप है। ऐसा लगता है कि जब तक सेवाओं के निजीकरण का अपना लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता, तब तक सरकार इन सामान्य सेवाओं को बहाल नहीं करेगी। ए.आई.जी.सी. सभी मेल, एक्सप्रेस और पैसेंजर रेलगाड़ियों की लॉकडाउन से पहले की उनकी स्थिति को बहाल करने की मांग करता है।

रेलवे एक-एक करके अपनी सेवाओं का निजीकरण कर रहा है। रेलवे के स्कूल और जूनियर कॉलेज बंद हो गए हैं। प्लेटफार्मों से प्रतीक्षालय हटा कर निजी प्रतीक्षालयों का विकास अत्यधिक लागत के साथ किया गया है। वे केवल संपन्न यात्रियों के उपयोग के लिए ही हैं। रेलवे के अस्पतालों में पर्याप्त संख्या में योग्य डॉक्टरों की कमी है – निजी कंपनियों को सौंपने से पूर्व, स्टेशन भवन और उसके आसपास की जगह को क़ीमती सार्वजनिक धन से  सजाया-संवारा जा रहा है।

रेल उपयोगकर्ताओं और करदाताओं से अनुरोध है कि वे रेल प्रशासन के बहकावे में न आएं जो रेल सेवाओं के निजीकरण की एक लुभावनी तस्वीर पेश करने की कोशिश कर रहा है। हम गार्ड, रेलवे संचालन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होने के नाते, अधिकारियों द्वारा मीडिया को चालाकी से अपनी बात कहलाने की तकनीक से अच्छी तरह से परिचित हैं। न्यायपालिका की भूमिका भी शंकास्पद रही है। देश के पूर्व माननीय मुख्य न्यायाधीश का राज्यसभा के लिए मनोनित होना हमारे संदेह को मजबूत करता है।

म.ए.ल. : वर्तमान में भारतीय रेल में कितने गार्ड कार्यरत हैं और उनकी वास्तविक संख्या क्या होनी चाहिए?

एस.पी.एस. : इस समय रोल पर 26,496 गार्ड हैं हालांकि गार्ड श्रेणी की संस्वीकृत कार्मिक संख्या 34,818 है!

म.ए.ल. : क्या रेलवे अधिकारियों द्वारा गार्डों के स्वीकृत पदों को रद्द करके उन्हें कम करने के लिए कोई क़दम उठाए गये हैं?

एस.पी.एस. : स्वीकृत पदों पर नियुक्ति न करके इन पदों को अंधाधुंध समाप्त कर देना आम बात हो गयी है और हम सब के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है। प्रशासन हमारी श्रेणी को अन्य गैर-परिचालन-कर्मी वर्ग के साथ विलय करने के लिए दृढ़ है ताकि गार्डों को परिचालन-कर्मी वर्ग में मिलने वाली सहुलियतों से वंचित किया जा सके।

जब लॉकडाउन की घोषणा हुई और राष्ट्र महामारी के डर की चपेट में था तब 8 मई, 2020 को सरकार ने विभिन्न श्रेणियों को युक्तिसंगत बनाने के लिए एक समिति के गठन का ऐलान किया। ए.आई.जी.सी. ने 20,000 ईमेल भेजकर इस क़दम का कड़ा विरोध किया और 25,000 गार्डों ने ट्विटर पर अभियान में भी भाग लिया जिसकी ट्रेंडिंग उस वक्त चैथे स्थान पर चल रही थी।

माल ढुलाई का लदान पिछले सभी रिकॉर्डों से आगे निकल गया है और माल ढुलाई सेवाओं में वृद्धि हुई है, लेकिन गार्डों की भर्ती अनुपातिक रूप से नहीं हुई है। उन्हें यथोचित आराम के बिना काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। सेक्शनों में रेलवे पटरियों पर हो रही भीड़-भाड़ उसमें अधिक यातायात का बयान करती है।

2020 के नवंबर माहीने में डी.आर.एम. (दिल्ली) ने अपनी ज्ञापन संख्या 269/2020 द्वारा 350 स्वीकृत गार्डों के पदों को वापस सौंप दिया। दिल्ली डिवीजन में 1315 मालगाड़ी गार्डों की मौजूदा संख्या को कलम के एक ही झटके में 965 कर दिया गया। हमारे साथ कोई सलाह-मशविरा भी नहीं किया गया। इन स्थितियों में गार्डों के काम के बोझ में इजाफा हो गया है और पर्याप्त आराम मिलना मुश्किल हो गया है।

म.ए.ल. : कितने गार्ड अनुबंधित कर्मचारी रूप में कार्यरत हैं?

एस.पी.एस. : गार्डों को अनुबंधित कर्मी के रूप में नियोजित नहीं किया जाता है। हालांकि कुछ गार्डों को डी.एफ.सी.सी.आई.एल. में न्यूनतम संख्या में निजी कर्मी बतौर भर्ती किया है। इन कर्मियों को सी.पी.सी. वेतनमान तथा डी.ए. आदि से वंचित रखा गया है। कोलकाता मेट्रो रेलवे को छोड़कर, सभी मेट्रो रेलवे निजी एजेंसियों द्वारा चलाई जाती हैं और इन सभी में गार्डों की नियुक्ति नहीं होती।

म.ए.ल. : क्या आप गार्डों के अपने अधिकारों के संघर्ष का संक्षेप में वर्णन कर सकते हैं?

एस.पी.एस. : हमने अपनी सभी शिकायतों को प्रधान मंत्री कार्यालय, श्रम मंत्रालय और कई अन्य अधिकारियों तक पहुंचाया है पर वे सब कान में तेल डाल कर बैठे हैं। उनका रवैया तीन बंदरों के समान है। वे न तो हमारी दिक्कतों से वाकिफ होना चाहते हैं, न ही ज़मीनी वास्तविकताओं को जानना चाहते है और न ही न्यायोचित बात करना चाहते हैं।

म.ए.ल. : आपकी समस्याओं के प्रति रेलवे अधिकारियों की प्रतिक्रिया  है इसके बारे में बतायें?

एस.पी.एस. : रेलवे अधिकारियों का रवैया बेहद निरंकुश है और हमारी समस्याओं की गुहार से उनके कानों पर जूं भी नहीं रेंगती।

म.ए.ल. : इस बहुत ही ज्ञानपूर्ण साक्षात्कार के लिए हम कामरेड एस.पी. सिंह का शुक्रिया अदा करते हैं और भारतीय रेल के गार्डों की उचित मांगों का पूरा समर्थन भी करते हैं। सभी रेल मज़दूरों के साथ-साथ पूरे मज़दूर वर्ग के लिए यह आवश्यक है कि वे इन सभी मांगों का समर्थन करें।

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