रेल मज़दूरों की कार्य की परिस्थिति : ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन के महासचिव के साथ साक्षात्कार

मज़दूर एकता लहर (म.ए.ल.) ने भारतीय रेल में लोको पायलट, गार्ड, स्टेशन मास्टर्स, ट्रेन कंट्रोलर, सिग्नल व टेलीकॉम मेंटेनेंस स्टाफ, ट्रैक मेंटेनर, टिकट चेकिंग स्टाफ आदि का प्रतिनिधित्व करने वाली श्रेणीबद्ध एसोसिएशनों के नेताओं के साथ साक्षात्कार कर उनके प्रकाशन की एक श्रृंखला शुरू कर रहा है। इस श्रृंखला के पहले भाग में यहां पर हम ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन (ए.आई.एल.आर.एस.ए.) के महासचिव कामरेड एम.एन. प्रसाद (एम.एन.पी.) के साथ किये गये साक्षात्कार को प्रस्तुत कर रहे हैं।

म.ए.ल.: रेल चालक को कौन-सी मुख्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है?

एम.एन.पी.: रेल चालक और सहायक रेल चालक को आए-दिन कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मैं उनके बारे में विस्तार से बताता हूं।

  1. रेलवे ने रेल चालक के लिए प्रतिदिन 8 घंटे की ड्यूटी लागू नहीं की है। इसलिए हमारे अधिकतर कर्मचारी 8 घंटे से अधिक और 5 प्रतिषत से 10 प्रतिषत कर्मचारी 14 घंटे से अधिक की ड्यूटी करते हैं। रेलवे का प्रशासन नियमानुसार समय-समय पर नियतकालीन विश्राम देने से इनकार कर रहा है; इसके अलावा, हमारे मुख्यालय द्वारा अनिवार्य विश्राम का हक़ भी छीना जा रहा है। पूरी दुनिया में काम करने वाले कम से कम साप्ताहिक अवकाश के हक़दार होते हैं और प्रभावी तौर पर इसका मतलब है कि एक महीने में 4 बार में 40 घंटे का अवकाश (24 घंटे साप्ताहिक अवकाश के और दो ड्यूटी के बीच में सामान्य विश्राम के 16 घंटे)। परन्तु, रेल चालकों को एक माह में केवल 30 घंटे का साप्ताहिक विश्राम चार बार या 22 घंटे 5 बार मिल रहा है। इस तरह के प्रतिबंधित विश्राम के फलस्वरूप वे बड़े पैमाने पर समाज से दूर अकेलेपनका जीवन जीने के लिए मजबूर हैं और रात्रि में मिलने वाले उचित विश्राम से भी वंचित हैं। उचित साप्ताहिक अवकाश या आराम के लिये समय की कमी और काम के घंटों की अनिश्चितता के कारण उनका पारीवारिक जीवन लगभग बिखर गया है इसके के साथ-साथ रेल चालकों के एक बड़े हिस्से के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ा है। इनमें से, एक बड़ा तबका सेवा निवृत्त होने की आयु तक पहुंचने से पहले ही चिकित्सकीय रूप से अयोग्य हो जाता है और रेल चालकों का उतना ही बड़ा तबका स्वेच्छा से सेवानिवृत्त होकर नौकरी छोड़ देता है क्योंकि वे प्रतिकूल कार्य स्थितियों के तनाव को सहन करने में असमर्थ हो जाते हैं। अक्सर, छोटे साप्ताहिक आरामों को भी नकार दिया जाता है। छुट्टी स्वीकार नहीं की जाती है और 25 प्रतिषत पद हमेशा रिक्त रखे जाते हैं। चालकदल को लगातार दो रात की ड्यूटी के विपरीत 4 या 5 रातों के लिए काम पर रखा जाता है।
  2. सहायक रेल चालकों को प्रारंभ में स्तर-2 (मूल 1900 रुपये) का बहुत कम शुरुआती वेतनमान दिया जाता है, हालांकि इस पद पर ज्यादातर इंजीनियरिंग स्नातक भर्ती होते हैं। इस पद के लिए केवल तीन ग्रेड हैं, 1900 रुपये, 2400 रुपये और 4200 रुपये; जबकि बढ़ रही ज़िम्मेदारी (मेल, एक्सप्रेस और राजधानी) के कार्य – स्तर 6 के पद के बराबर हैं। रेल चालक के लिए उच्चतम वेतन – स्तर 6 तक ही सीमित रखा गया है जबकि अन्य सभी रेलवे कर्मचारियों के लिए उच्चतम वेतन – स्तर 8 या उससे भी अधिक है। रनिंग भत्ता औसत वेतन पर निर्धारित करने की बजाय न्यूनतम मूल वेतन पर तय किया गया है जिसके कारणव पूरे रनिंग स्टाफ के लिए रनिंग भत्ता घट कर एक तिहाई रह गया है।
  3. चिकित्सकीय रूप से अवर्गीकृत कर्मचारियों (रेल चालक जो मुख्य रूप से भारी काम का तनाव और अपर्याप्त विश्राम के कारण स्वस्थ्य के आवश्यक उच्चतम स्तर को बनाए रखने में असमर्थ हैं) को समकक्ष पदों में समाहित नहीं किया गया है और न ही उनकी वरिष्ठता बहाल की जा रही है। कर्मचारियों को चिकित्सकीय रूप से अवर्गीकृत करने में वर्षों का विलंब किया जाता है और आई.आर.एम.एम. (भारतीय रेलवे मेडिकल मैनुअल) का उल्लंघन करके पूरी अवधि को बीमारी की छुट्टी के रूप में माना जाता है। रनिंग स्टाफ को विकलांगता अधिनियम और रेलवे पेंशन नियमों के प्रावधानों का उल्लंघन कर अतिरिक्त पेंशन लाभों से वंचित कर दिया जाता है। एन.पी.एस. (न्यू पेंशन स्कीम) के तहत आने वाले रनिंग स्टाफ को भी इस लाभ से वंचित रखा गया है।
  4. एकमात्र हमारी ही श्रेणी है जिसे कोविड के दौरान ट्रेनों के रद्द होने के कारण 30 प्रतिषत के वेतन कटौती का सामना करना पड़ा है। हम इतना रनिंग भत्ता नहीं कमाते कि इससे वेतन की कमी को पूरा कर सकें। हमें कोई मुआवज़ा भी नहीं दिया जाता है, हालांकि भत्ता नियम के तहत यह होना चाहिए।
  5. छठे केंद्रीय वेतन आयोग की वेतन विसंगतियों के खि़लाफ़ उठाए गए औद्योगिक विवादों को 2011 में राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण को न्यायिक निर्णय के लिए भेजा गया था परंतु रेल प्रशासन द्वारा अपनाई गयी समय व्यर्थ करने की आपराधिक रणनीति के फलस्वरूप यह अभी भी लटका हुआ है।
  6. रेल प्रशासन, विशेषतः जोनल और डिवीजनल प्रशासन, निर्धारित सुरक्षा नियमों के अनुसार ट्रेन सेवाओं का संचालन नहीं कर रहे हैं और वे कर्मचारियों पर सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने के लिए दबाव डालते हैं। हर शॉर्ट कट या असुरक्षित प्रैक्टिस का अंजाम यह होता है कि रेल चालक के उपर दबाव और तनाव में वृद्धि के कारण स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
  7. यह भी देखा जाता है कि दुर्घटना के मामले में जांच-पड़ताल निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार नहीं की जाती है, यानी तकनीकी जांच की मदद और साइकोमेट्रिक मूल्यांकन प्रक्रिया के साथ। दुर्घटना का सारा दोष कर्मचारियों पर थोप दिया जाता है, जबकि प्रशासन की गलती कभी स्वीकार नहीं की जाती। 34 वर्ष पूर्व, न्यायमूर्ति खन्ना समिति ने सिफारिश की थी कि जांच समितियों को अपना रवैया बदल कर यह जानना चाहिए कि “गलती किस कारण हुई” न कि “किसने गलती की”; जांच समितियों के संचालन के तरीके में आज भी कोई बदलाव नहीं हुआ है। अधिकतर रेल चालकों को ही ज़िम्मेदार ठहराया जाता है, चाहे वे दोषी हों या न हों।

म.ए.ल.: आपके काम करने की परिस्थिति और वातावरण कितने सुरक्षित हैं?

एम.एन.पी.: इस विषय पर कई इकाइयों ने साइकोमेट्रिक जांच की है जैसे कि करोलिंस्का विश्वविद्यालय (स्वीडन) द्वारा तनाव अनुसंधान रिपोर्ट, डॉ. राजेश रंजन की रिपोर्ट और आर.डी.एस.ओ. (रेलवे डिजाइन और मानक संगठन); सभी ने रेल चलकों की कार्यशील स्थिति पर रिपोर्ट में कहा है कि रेल चालकों का व्यावसायिक स्वास्थ्य खतरा सूचकांक रेलवे और सभी परिवहन क्षेत्रों के सभी मज़दूरों की तुलना में सबसे अधिक है। लंबे समय तक काम करने, लगातार रात की ड्यूटी, अनिर्धारित ड्यूटी, उच्च तनाव स्तर आदि का मनोदैहिक प्रतिकूल प्रभाव सतर्कता और प्रतिक्रिया समय पर पड़ता है। लेकिन रेलवे प्रशासन के पास न तो इस व्यावसायिक स्वास्थ्य ख़तरे के सूचकांक में कमी लाने की और न ही उचित मुआवजे के लिए ही कोई उपयुक्त योजना है। इसके विपरीत, काम की परिस्थितियों के कारण घटी हर दुर्घटना के लिए अमानवीय दंड दिया जाता है।

म.ए.ल.: क्या इस वर्ग में असुरक्षित काम की परिस्थिति के फलस्वरूप कोई दुर्घटना घटित हुई है जिसके लिए रेल चालाकों को अनुचित रूप से दोषी ठहराया गया है?

एम.एन.पी.: ट्रेन दुर्घटना के कारण हताहत होना रेल चालकों के लिए गंभीर मुद्दा नहीं है। लेकिन हर सुरक्षा उल्लंघन सुरक्षा के लिए एक संभावित ख़तरा है। हर दुर्घटना में, रेल चालक पर आरोप लगने की सर्वाधिक संभावना है क्योंकि उस समय कैब में, एक रेल चालक और सहायक अकेले होते हैं और उनके बचाव के लिए कोई चश्मदीद गवाह नहीं होता। हर शॉर्टकट प्रक्रिया उनके तनाव में कई गुना इजाफा कर देती है। अमानवीय कामकाजी परिस्थितियों का रेल चालकों के जीवन पर गंभीर व प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बड़ी संख्या में रेल चालकों को बिना किसी मुआवज़े के समय से पहले अपनी सेवा समाप्त करने के लिए मजबूर किया जाता है, क्योंकि वे एकाग्रता और फिटनेस के स्तर को बनाए रखने में विफल रहते हैं।

म.ए.ल.: भारतीय रेल में निजीकरण को किस तरह क़दम-दर-क़दम आगे बढ़ाया जा रहा है और इसका रेल चालकों पर किस तरह का प्रभाव है?

एम.एन.पी.: यह जानकारी मिली है कि कुछ निजी संस्थाएं रेल चालक के रूप में काम करने के लिए कर्मचारियों की भर्ती कर रही हैं और दूसरे विभाग के कुछ तकनीकी कर्मचारियों का भी उपयोग टॉवर वैगनों में चालक के रूप में रेक को हटाने और लगाने के लिए कुछ बड़ी साइडिंग पर किया जा रहा है। अनुबंधित रेल चालक कुछ निजी साइडिंग्स में कार्य कर रहे हैं, इससे पूर्व, शंटिंग ऑपरेशंस का कार्य रेलवे चालकों द्वारा किया जाता था।

एम.ई.एल.: वर्तमान में, भारतीय रेल में कार्यरत रेल चालकों और उनके सहायकों की कुल संख्या कितनी है और इनकी वास्तविक स्वीकृत संख्या क्या है? अनुबंध पर कितने कर्मचारी कार्यरत हैं?

एम.एन.पी.: टास्क फोर्स कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, लोको रनिंग स्टाफ (रेल चालकों और सहायक रेल चालकों) की कुल संख्या 83,098 है, जबकि उनकी कुल अधिकृत संख्या 1,04,446 है और अनुबंधित लगभग 200 हैं।

एम.ई.एल.: मज़दूर अधिकारों के लिए आपकी एसोसिएषन द्वारा किए जा रहे संघर्ष का क्या आप संक्षिप्त विवरण बता सकते हैं?

एम.एन.पी.: ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन (ए.आई.एल.आर.एस.ए.), लोको पायलट और सहायक लोको पायलट का प्रतिनिधित्व करने वाली श्रेणीबद्ध संस्था है, जो केंद्र सरकार और रेल अधिकारियों की निजीकरण नीति का निरंतर विरोध कर रही है। हमने फरवरी 2018 में देबरॉय समिति की रिपोर्ट के खि़लाफ़ एक अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजित करने की पहल की थी। जहाँ पर भी संभव हुआ, व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से हमने सरकार द्वारा रेलवे के निजीकरण की दिशा में उठाए गए हर क़दम के और रेलवे प्रशासन तथा केंद्र सरकार के हर उस फैसले का जो मज़दूरों या आम जनता हित में नहीं था, विरोध में कार्यक्रम आयोजित किए।

म.ए.ल.: क्या रेलवे अधिकारियों द्वारा पदों को आत्मसमर्पण कर आपके कैटेगरी में स्वीकृत पदों की संख्या में कमी करने का प्रयास किया गया है?

एम.एन.पी.: यह सत्य है। एक ही ड्यूटी में तय की गई दूरी को बढ़ाने के एकमात्र मकसद से मेल और पैसेंजर क्रू लिंक्स को संशोधित करना तथा हेड क्वार्टर और आउटस्टेशन आदि पर विश्राम का समय भी कम किया जा रहा है। ट्रेन समय के हर संशोधन के साथ इस उद्देश्य को प्राप्त करने का प्रयत्न किया जा रहा है। स्वीकृत संख्या को कम करने के लिए माल गाड़ी चालकों की संख्या तय करने का फॉर्मूला बदल दिया गया था, और अतिरिक्त आरक्षित प्रशिक्षणार्थी की भर्ती की भी मंजूरी नहीं दी गयी जबकि पूरे स्टाफ को डीजल और एसी ट्रैक्शंस दोनों में प्रशिक्षित किया जाता है और उन्हें अतिरिक्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए भेजा जाता है और लोकोमोटिव, वैगनों और कोचों के नए संस्करणों के प्रवेश के कारण कई प्रशिक्षण निर्धारित किए जाते हैं। लगभग 25 प्रतिषत पदों को हमेशा रिक्त रखा जाता है, पारंपरिक यात्री रेक के बजाय ईएमयू और डेमू का समावेश, उच्च-गति और उच्च-क्षमता वाले लोको और वैगनों आदि का उपयोग कर्मचारियों की संख्या को कम करने के लिए किया जा रहा है।

म.ए.ल.: आपकी श्रेणी की समस्याओं के समाधान हेतु रेलवे अधिकारियों की प्रतिक्रिया कैसी रही है?

एम.एन.पी.: लोको रनिंग स्टाफ को सभी संभावित लाभों से वंचित करने के लिए रेलवे प्रशासन हर क़दम उठाने के लिए बहुत सतर्क है। रेलवे प्रशासन भारतीय रेल में लोको रनिंग स्टाफ के खि़लाफ़ भेदभाव से भरपूर अन्यायपूर्ण कृत्य करने के हर अवसर का प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहा है। हम संयुक्त संघर्ष के माध्यम से, निजीकरण की मज़दूर-विरोधी नीति के खि़लाफ़ आंदोलन के लिए सभी रेल कर्मचारियों को इकट्ठा करने की कोशिश कर रहे हैं। हमारे देश के लिए रेलवे को बचाना अत्यावश्यक रूप से महत्वपूर्ण है।

म.ए.ल.: इस बहुत ही ज्ञानवर्धक साक्षात्कार के लिए हम आपको धन्यवाद देते हैं और, इसके साथ ही हम भारतीय रेल के चालकों और सहायक चालकों की न्यायोचित मांगों का समर्थन करते हैं। सभी रेल मज़दूरों के साथ-साथ पूरे मज़दूर वर्ग के लिए इन सभी मांगों का समर्थन अत्यंत आवश्यक है।

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