यह धर्म-युद्ध है मज़दूरों और किसानों का, अधर्मी राज्य के ख़िलाफ़!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 10 जनवरी, 2021

आज हमारे देश और पूरी दुनिया को हमारी सरकार और देश की बहुसंख्यक आबादी, किसानों और मजदूरों, के बीच में एक ऐसा विवाद नज़र आ रहा है, जिसका कोई हल नहीं दिखता है। 26 नवम्बर से दिल्ली की सीमाओं पर ऐसा विशाल जन-विरोध चल रहा है, जिसका इससे पहले किसी को अनुमान न था। जन-विरोध की फौरी मांगों में मुख्य मांग यह है कि उन तीनों कानूनों को रद्द किया जाये, जिन्हें संसद में पारित किया गया था और जिनके लागू होने पर इजारेदार पूंजीवादी कॉर्पोरेट घराने कृषि क्षेत्र पर पूरी तरह हावी हो जायेंगे। हर रोज़, देश के कोने-कोने से जत्थे – किसानों, मज़दूरों, महिलाओं और नौजवानों के जत्थे आकर आन्दोलन में जुड़ रहे हैं। आन्दोलनकारी किसान इस बात पर डटे हुए हैं कि जब तक सरकार उनकी मांगों को नहीं मानेगी, तब तक वे वापस नहीं जायेंगे। आज़ादी के बाद के बीते 73 वर्षों में ऐसी स्थिति कभी नहीं देखी गयी है।

हरियाणा और उत्तर प्रदेश के साथ दिल्ली की सीमाओं – सिंघू, टिकरी, गाज़ीपुर, चिल्ला, ढांसा, औचंदी, पियाउ मन्यारी, सबोली और मंगेश – पर और राजस्थान-हरियाणा सीमा के शाहजहांपुर पर लोगों ने अस्थाई तौर पर छोटी-छोटी नगरियां बसायी हैं। वहां दसों-हजारों लोग दिन-रात ठहरते हैं। इसके अलावा, बढ़ौत, डासना, पलवल, बावल, आदि अनेक जगहों पर किसान महामार्गों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। संघर्ष को अगुवाई दे रही किसान यूनियनों ने सभी भागीदारों के लिए खाने और रहने का इंतजाम कर रखा है।

लोग अपने ही साधनों पर निर्भर होकर, लंगर सेवा आयोजित कर रहे हैं, जिनमें अनेक महिलाएं और पुरुष मिलजुलकर सबके लिए भोजन तैयार कर रहे हैं। किसी से उसके धर्म, जाति या भाषा के बारे में नहीं पूछा जाता है। आस-पास के गांवों के लोग हर रोज़ अपने खेतों से फल-सब्जी, अनाज और भोजन की सामग्रियां ले आते हैं। देशभर से आये डॉक्टर और नर्स मेडिकल कैंप लगाकर निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा प्रदान कर रहे हैं। छात्रों ने लाइब्रेरी बना रखी हैं और किताबें बांट रहे हैं। स्कूली बच्चों के लिए क्लासें भी लगाई जा रही हैं।

कई आन्दोलनकारी अपनी ट्रालियों में ही रातें गुजार रहे हैं। जिनकी अपनी ट्रालियां नहीं हैं, उनके लिए भी आयोजकों ने बारिश और ठंड से बचकर रहने की जगह बना रखी है। कंबल आदि बांटे जाते हैं। अस्थायी शौचालयों और गर्म पानी का भी इंतज़ाम किया गया है। वहां साफ-सफाई बनाये रखने के लिए लोग दिन-रात मेहनत कर रहे हैं।

किसान अन्दोलन के आयोजकों ने विरोध स्थलों पर बहुत ही उच्च स्तर का अनुशासन और सामाजिक ज़िम्मेदारी का माहौल बना रखा है। यह सुनिश्चित किया जाता है कि वहां कोई भी शांति भंग न कर सके। जो लोग समर्थन देने आते हैं, उन सभी का हार्दिक स्वागत किया जाता है। चारों तरफ आज़ादी और दोस्ती का माहौल है। सब खुलकर अपनी बात रख सकते हैं। किसी पर कोई दबाव नहीं है, किसी में कोई डर नहीं है। हजारों-हजारों लोगों के सामने अपनी बात रखने का मौका सबको बारी-बारी से दिया जाता है।

महिलाएं और लड़कियां विरोध स्थलों पर पूरी तरह सुरक्षित महसूस करती हैं। बाकी देश में जहां महिलाएं क़दम-क़दम पर असुरक्षित महसूस करती हैं, यहां उससे बिलकुल ही उल्टा माहौल हैं।

आन्दोलन के आयोजकों ने सोशल मीडिया के ज़रिये, अपना संचार माध्यम, सोशल मीडिया चैनल बना रखा है। आन्दोलनकारियों ने कार्पोरेट मीडिया को ख़ारिज़ कर दिया है, क्योंकि कार्पोरेट मीडिया संघर्ष के बारे में झूठा प्रचार करती है और सरकारी प्रचार को ही दोहराती है।

अपने अधिकारों के लिए और पूंजीवाद-परस्त कानूनों के खि़लाफ़ मज़दूरों और किसानों का संघर्ष मिलकर, एक बहुत बड़ी ताक़त बन गयी है। दिल्ली की सीमाओं से शुरू होकर, अब संघर्ष देश के सभी जिलों और गांवों में फैल रहा है। “मज़दूर-किसान एकता ज़िंदाबाद!” – यह नारा देश के कोने-कोने में गूंज रहा है। अमरीका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देशों में रहने वाले हिन्दोस्तानी लोग अपने किसान भाई-बहनों के संघर्ष के समर्थन में कई विरोध कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं और अपने-अपने तरीक़ों से इस संघर्ष की मदद कर रहे हैं।

किसान आन्दोलन यह मांग कर रहा है कि इन सभी पूंजीवाद-परस्त कानूनों को रद्द किया जाये। एक नया कानून लागू किया जाये जो यह गारंटी दे कि सभी फ़सलों की लागत के कम से कम डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीदी होगी। पर केंद्र सरकार इन मांगों को मानने से इंकार कर रही है, जिसकी वजह से लोगों में बहुत गुस्सा है। हजारों-हजारों लोग हर रोज़, अपने घर-बार छोड़कर, दिल्ली की सीमाओं पर विरोध स्थलों में आकर जुड़ रहे हैं।

आठ बार वार्ता करने के बाद, भाजपा सरकार अभी भी बड़ी हेकड़बाजी के साथ ऐलान कर रही है कि इन तीनों कानूनों को रद्द नहीं किया जायेगा। सरकार हम मज़दूरों और किसानों का हौसला तोड़ने की कोशिश कर रही है। सरकार यह उम्मीद कर रही है कि कड़ाके की ठंड और मूसलाधार बारिश से हम अपना संघर्ष छोड़ने को मजबूर हो जायेंगे। राज्य की एजेंसियां किसान आन्दोलन की एकता को तोड़ने के अपने पुराने, परखे हुए तरीक़ों का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही हैं। पर इन सब को चुनौती देते हुए, किसान संगठनों ने डट कर अपनी एकता को बनाये रखा है और संघर्ष को जारी रखा है। इस संघर्ष के दौरान 70 से ज्यादा किसानों की शहादत की वजह से आन्दोलनकारियों की दृढ़ता और मजबूत हो गयी है। उन्होंने ऐलान कर दिया है कि “जब तक ये कानून रद्द नहीं होते, तब तक हमारा संघर्ष जारी रहेगा!”

हम मेहनतकश लोग समाज की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए मेहनत करके, समाज के प्रति अपना फर्ज़ निभाते हैं। परन्तु वर्तमान राज्य मेहनतकशों को रोज़गार की सुरक्षा दिलाने का अपना फर्ज़ पूरा नहीं कर रहा है। बल्कि, यह राज्य हमारी रोज़ी-रोटी को तबाह करके, इजारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने पर वचनबद्ध है। मुट्ठीभर अरबपति घरानों और उनके विदेशी सहयोगियों की लालच को पूरा करने के लिए कानून बनाये जाते हैं। हम इस अधर्मी राज्य को ख़त्म करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हम एक ऐसे राज्य की स्थापना करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जो सबकी सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करने के अपने धर्म का पालन करेगा।

शहीद भगत सिंह ने कहा था कि “हमारा संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक मुट्ठीभर लोग, चाहे विदेशी हों या देशी या दोनों मिलकर, हमारे लोगों के श्रम और संसाधनों का शोषण करते रहेंगे। इस रास्ते से कोई हमें हटा नहीं सकता।”

आज़ादी के संघर्ष के दौरान, हमारे देशभक्तों और क्रान्तिकारी शहीदों ने अंग्रेज सरमायदारों की उपनिवेशवादी हुकूमत की जगह पर मज़दूर-किसान की हुकूमत स्थापित करने के लिए संघर्ष किया था। उन्होंने अंग्रेजों के बनाये हुए राजनीतिक संस्थानों और कानूनों को अपनाने के रास्ते को ख़ारिज कर दिया था। हमारे क्रान्तिकारी शहीदों का यह मानना था कि पूरी व्यवस्था को उखाड़ फेंकना है और एक नयी व्यवस्था की नींव डालनी है। इस सोच के आधार पर, उन्होंने अंग्रेजों के उपनिवेशवादी राज्य के अन्दर कुछ गिने-चुने हिन्दोस्तानियों के लिए कुछ पदों की भीख मांगने के रास्ते को ठुकरा दिया था, जबकि सरमायदारों के प्रतिनिधि उस रास्ते की हिमायत कर रहे थे।

दूसरे विश्व युद्ध के अंत में, अंग्रेज हुक्मरानों के सामने हिन्दोस्तान में इंक़लाब की संभावना थी। उसे रोकने के लिए, उन्होंने हिन्दोस्तान के गद्दार सरमायदार वर्ग के साथ समझौता किया और 1947 में उनके हाथों में राज्य सत्ता सौंप दी। इस तरह, शोषण से मुक्त समाज बनाने के मज़दूरों और किसानों के लक्ष्य और सपने के साथ विश्वासघात किया गया।

बीते 73 सालों में यह गद्दार सरमायदार वर्ग ही, विदेशी पूंजीपतियों के साथ मिलकर और स्पर्धा करते हुए, देश का एजेंडा तय करता रहा है। हम मज़दूर और किसान देश की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा हैं, पर हमारे समाज का विकास किस दिशा में होना चाहिए, इस पर फ़ैसला करने में हमारी कोई भूमिका नहीं होती है।

अर्थव्यवस्था को हमारी ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में नहीं चलाया जाता है। इसके बजाय, अर्थव्यवस्था को सरमायदार वर्ग की अगुवाई करने वाले कुछ 150 इजारेदार पूंजीवादी घरानों की कभी-न-पूरी-होने-वाली लालच को पूरा करने की दिशा में चलाया जाता है। इजारेदार पूंजीपति न सिर्फ अपनी निजी संपत्ति के मालिक हैं, बल्कि राज्य के कारोबारों पर भी उन्हीं इजारेदार पूंजीपतियों का नियंत्रण है। जब इजारेदार पूंजीपतियों को अपने निजी साम्राज्यों का विस्तार करना था तब उन्होंने जनता के पैसों से सार्वजनिक क्षेत्र का निर्माण किया था; और अब वे इन्हीं सार्वजनिक संसाधनों के निजीकरण का रास्ता अपना रहे हैं ताकि खुद ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़े बना सकें।

हमारे देश के सरमायदारों ने अंग्रेजों की छोड़ी हुयी राजनीतिक व्यवस्था को बरकरार रखा है और उसे ज्यादा से ज्यादा कुशल बना दिया है। यह संसदीय लोकतंत्र के वेस्टमिन्स्टर नमूने की नकल है। इसमें अधिकतम आबादी राज्य सत्ता से वंचित है। लोगों की भूमिका सिर्फ पांच सालों में एक बार वोट देने तक सीमित है। चुनावों में ज्यादातर उम्मीदवार सरमायदारों की पार्टियों के चुने गए उम्मीदवार होते हैं और उन्हीं उम्मीदवारों में से किसी एक को चुनना पड़ता है। चुने जाने के बाद ये “जन प्रतिनिधि” मतदाताओं के प्रति जवाबदेह नहीं होते हैं। फ़ैसले लेने की ताक़त संसद में संकेंद्रित है, और संसद के अन्दर यह ताक़त प्रधानमंत्री की अगुवाई वाले मंत्री मंडल के हाथों में संकेंद्रित है।

सत्ता में बैठा सरमायदार वर्ग इस समय भाजपा पर भरोसा कर रहा है कि वह उदारीकरण और निजीकरण के जन-विरोधी एजेंडा को लागू करेगी। जब भाजपा बदनाम हो जायेगी, तब वे किसी दूसरी पार्टी को लाकर उसी एजेंडा को लागू करेंगे। वर्तमान व्यवस्था के चलते, चुनावों से सरमायदारों की हुक्मशाही को वैधता मिलती है। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, वह उसी एजेंडा को लागू करती है जिसे इजारेदार पूंजीवादी घरानों ने पहले से ही तय कर रखा है। इसलिए, हमारे संघर्ष का मक़सद है न सिर्फ भाजपा को सत्ता से हटाना बल्कि सरमायदार वर्ग को ही सत्ता से हटाना।

पूंजीवाद के विकास के चलते, करोड़ों-करोड़ों लोग पहले से ही वेतन भोगी मज़दूर बन चुके हैं। उनके पास उत्पादन के कोई साधन नहीं हैं। अब हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीवादी घरानों की गिद्ध जैसी लालची नज़रें हमारे किसानों की उपज और ज़मीन पर हैं। वे कृषि उपज के उत्पादन, व्यापार और भंडारण को अपने कब्ज़े में कर लेना चाहते हैं, ताकि इस विशाल बाज़ार से ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़े बना सकें।

हमें सत्ता पर बैठे इन लुटेरों से हिसाब चुकाना होगा। हम मज़दूरों और किसानों को संगठित होकर यह सुनिश्चित करना होगा कि इजारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में, सत्ता पर बैठे सरमायदार वर्ग को हमारी ज़मीन और श्रम को लूटने और हमारा शोषण करने की ताक़त से वंचित किये जाये। हमें एक नए समाज की नींव डालनी है। हमें समाज का नव-निर्माण करना है।

उस नए समाज की झलक दिल्ली की सीमाओं पर दिख रही है। पूंजीपति वर्ग और उसके नेता जिस तरह समाज को चलाते हैं, उसकी तुलना में, विरोध स्थलों पर लोग यह दिखा रहे हैं कि वे कितने बेहतरीन तरीक़े से खुद अपना शासन कर सकते हैं।

सरमायदारों के अर्थशास्त्री और साम्राज्यवाद के विचारक यह धारणा फैलाते हैं कि पूंजीवादी बाज़ार में लोगों को अपने ही हाल पर छोड़ देना चाहिए। वे ज्यादा से ज्यादा निजी मुनाफ़े बनाना, एक-दूसरे को काट कर आगे निकलना और खुदगर्ज स्वभाव को “मानव चरित्र” बताते हैं। पर आज हमारे मज़दूर-किसान इससे कहीं ज्यादा उच्च चरित्र दर्शा रहे हैं। वे खुद की परवाह किये बिना, सब के साथ सहयोग करके, सबकी ज़रूरतों को पूरा करनी की भावना को दर्शा रहे हैं।

मज़दूर और किसान यह दर्शा रहे हैं कि वे देश की बागडोर संभालने के क़ाबिल हैं। जबकि दिन-ब-दिन, यह साफ होता जा रहा है कि सरमायदार वर्ग राज करने के क़ाबिल नहीं है। अगर हिन्दोस्तानी समाज को आगे बढ़ना है तो अब इस सरमायदार वर्ग को सत्ता से हटाना होगा और देश में मज़दूर-किसान का राज स्थापित करना होगा।

हम मज़दूरों और किसानों को उत्पादन और विनिमय के मुख्य साधनों को सरमायदारों के हाथों से अपने हाथों में ले लेने के लिए संगठित होना होगा। हमें उसे समाज की, यानी हमारी सांझी मालिकी और नियंत्रण में लाना होगा।

हमें सरमायदारों के शासन की वर्तमान व्यवस्था की जगह पर, मज़दूरों और किसानों की हुकूमत के नए राज्य की स्थापना करनी होगी। हमें वर्तमान लोकतंत्र की व्यवस्था की जगह पर एक आधुनिक व्यवस्था स्थापित करनी होगी जिसमें मेहनतकश बहुसंख्या की राज्य सत्ता होगी। तब हम ऐसे कानून बना सकेंगे, जिनसे कोई भी देशी-विदेशी लुटेरा हमारे संसाधनों की लूट और शोषण नहीं कर सकेगा। तब ही हम सबके लिए खुशहाली और सुरक्षा की गारंटी दे सकेंगे।

मज़दूरों और किसानों के संगठनों ने अपना यह फ़ैसला घोषित किया है कि आने वाले हफ्तों में देशभर में अपने संघर्ष को तेज़ करेंगे। उन्होंने ऐलान किया है कि गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी को दिल्ली की सड़कों पर ट्रेक्टर रैली करेंगे। कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी देशभर के लोगों से आह्वान करती है कि इस संघर्ष को सफल बनाने के लिए इसमें बढ़-चढ़कर भाग लें!

हम मेहनतकश बहुसंख्या आज एक धर्म-युद्ध लड़ रहे हैं। यह संघर्ष है इस वर्तमान अधर्मी गणराज्य के खि़लाफ, जिसमें सिर्फ कुछ मुट्ठीभर लोगों की खुशहाली ही सुनिश्चित की जाती है। यह एक ऐसे गणराज्य की स्थापना करने के लिए संघर्ष है, जिसमें समाज के सभी सदस्यों की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करने के धर्म का पालन किया जायेगा।

तीनों किसान-विरोधी कानूनों को रद्द करो!

मज़दूर-किसान एकता ज़िंदाबाद!

मज़दूर-किसान की हुकूमत स्थापित करने के संघर्ष को आगे बढ़ायें!

इंक़लाब ज़िंदाबाद!


इस बयान का पी.डी.एफ. डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें :
यह धर्म-युद्ध है मज़दूरों और किसानों का, अधर्मी राज्य के ख़िलाफ़!

close

Share and Enjoy !

0Shares
0

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *