मज़दूर-किसान एकता ज़िंदाबाद!

मज़दूरों-किसानों को देश का असली मालिक बनाने के लिये संघर्ष को तेज़ करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान, 5 जनवरी, 2021

साथियों,

देशभर में मज़दूर और किसान पूंजीपतियों और उनके राज्य द्वारा अपने अधिकारों पर किये जा रहे वहशी हमलों के ख़िलाफ़ संघर्ष में उतर रहे हैं।

मज़दूर एकता कमेटी हमारे देश के मज़दूरों की यूनियनों और संगठनों से आह्वान करती है कि वे किसानों के संघर्ष के समर्थन में सड़कों पर उतरें और किसान-विरोधी कानूनों को रद्द करने के लिए देशभर में लोगों को प्रदर्शन और धरने आयोजित करने के लिए लामबंध करें।

मज़दूर एकता कमेटी हमारे देश के मज़दूरों की यूनियनों और संगठनों से आह्वान करती है कि वे सरकार द्वारा हाल ही में पारित श्रम कानूनों – वेतन संहिता, व्यावासिक सुरक्षा संहिता और स्वास्थ्य और काम के हालात पर संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता और सामाजिक सुरक्षा संहिता को रद्द करने की मांग को लेकर देशभर में अपना संघर्ष तेज़ करें और बड़े पैमाने पर लामबंधी करें।

साथियों,

पिछले एक महीने से अधिक समय से देशभर के लाखों किसान दिल्ली की सीमाओं पर धरना प्रदर्शन कर रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि सरकार तीन किसान-विरोधी कानूनों को रद्द करे। इन कानूनों का मक़सद है कृषि क्षेत्र पर मुट्ठीभर बड़े पूंजीवादी घरानों की इजारेदारी क़ायम करना। इन कानूनों से केवल हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार कंपनियों का फ़ायदा होगा, जबकि बहुसंख्य छोटे व्यापारियों को इस क्षेत्र से निकाल दिया जायेगा। इन कानूनों के चलते ये इजारेदार कंपनियां किसानों की फ़सलों का दाम तय कर पायेंगी, नाजायज़ कॉन्ट्रैक्ट के ज़रिये किसानों का खून चूसेंगी और कृषि उत्पादों की जमाखोरी करते हुए खुदरा बाज़ारों में उन्हें ऊंचे दामों पर बेच पायेंगी।

किसान यह अच्छी तरह से जानते हैं कि इन कानूनों से हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों के हाथों उनका शोषण व लूट और भी अधिक बढ़ जाएगी और वे बर्बाद हो जायेंगे। अब वे प्रधानमंत्री और सरकार के अन्य प्रवक्ताओं के झूठे बहकावे में आने से इंकार कर रहे हैं कि इन कानूनों से “किसानों की आय दोगुनी” हो जाएगी और वे समृद्ध हो जायेंगे। आंदोलन कर रहे किसानों ने ऐलान किया है कि इन कानूनों को रद्द किये जाने से कुछ भी कम उन्हें स्वीकार नहीं है और जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होती हैं वे पीछे नहीं हटेंगे।

हरियाणा और पंजाब के गांवों से सैकड़ों महिलाओं, पुरुषों और नौजवानों के जत्थे हर रोज़ प्रदर्शन स्थलों पर जुड़ते जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, और देश के अन्य राज्यों से सैकड़ों किसान इन प्रदर्शनों में रोज़ जुड़ते जा रहे हैं। मज़दूरों की यूनियनों, नौजवानों और महिलाओं के संगठन किसानों को अपना समर्थन प्रकट करते हुए सड़कों पर उतर रहे हैं। किसान संगठनों के संयुक्त मंच ने ऐलान किया है कि वे अपने संघर्ष को और तेज़ करते हुए गणतंत्र दिवस के अवसर पर राजधानी में “ट्रेक्टर परेड” निकालेंगे।

सरकारी प्रचार तंत्र और कई पूंजीवादी मीडिया चैनलों ने किसानों के आंदोलन को बदनाम करने के लिए तमाम झूठ फैलाये और किसानों को “राष्ट्र-विरोधी”, “खालिस्तानी”, इत्यादि करार दिया। साथ ही साथ हिन्दोस्तानी राज्य किसानों को दिल्ली की सर्दी में एक महीने से अधिक समय के लिये बैठाकर उनको थका देने और उनके एकजुट हौसले को तोड़ने के मक़सद से तमाम क्रूर चालें चल रहा है।

ये तीनों कानून न केवल किसानों के ख़िलाफ़ हैं बल्कि हमारे देश के तमाम मज़दूरों और मेहनतकश लोगों के भी खि़लाफ़ हैं। इन कानूनों से देश की खाद्य सुरक्षा और लोगों के रोज़गार पर विनाशकारी परिणाम होगा।

साथियों,

किसानों पर इन हमलों के साथ-साथ हमारे देश के मज़दूर वर्ग के अधिकारों पर भी वहशी हमले किये जा रहे हैं। मज़दूरों के कड़े विरोध के बावजूद केंद्र सरकार ने मौजूदा 44 श्रम कानूनों की जगह पर 4 श्रम संहिताएं बनाई हैं। ये संहिताएं पूंजीपतियों की कई वर्षों से लंबित मांग को पूरा करने के लिए बनाई गयी हैं – कि मज़दूरों को अपनी पसंद की यूनियन बनाने के अधिकार को ख़त्म किया जाये; कि हड़ताल और विरोध प्रकट करने के अन्य तरीकों को गैरकानूनी करार दिया जाये; कि ठेका मज़दूरी पर लगाये गए प्रतिबंधों को ख़त्म किया जाये; ताकि पूंजीपति मालिक मज़दूरों को किसी भी समय नौकरी से निकाल सकें; और लेबर इंस्पेक्टर को मज़दूरों के अधिकारों, और सुरक्षा नियमों के उल्लंघन की जांच करने से रोका जाये।

वेतन संहिता मज़दूरों की इस महत्वपूर्ण मांग को पूरी तरह से नकारती है कि न्यूनतम वेतन मज़दूरों के जीवन को बनाये रखने योग्य वेतन हो, जिससे एक मज़दूर और उसका परिवार इंसानों लायक ज़िन्दगी जी सके। सामाजिक सुरक्षा संहिता अधिकांश मज़दूरों को पेंशन, भविष्य निधि और स्वास्थ्य बीमा से वंचित करती है। व्यवसायिक सुरक्षा संहिता कंपनी मालिकों को सुरक्षित काम के हालात बनाये रखने के लिए ज़रूरी सुरक्षा के इंतजाम करने से छूट देती है। औद्योगिक संबंध संहिता मज़दूरों को गुलाम बनाने की कोशिश करती है।

देश की बहुमूल्य संपत्ति – रेलवे, कोयला खदानें, तेल कंपनियां, आयुध हथियार बनाने वाले कारखाने, एयरपोर्ट, बंदरगाह और गोदी, बी.एस.एन.एल., बीमा कंपनियां – सभी कुछ हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों को बेचा जा रहा है।

मेहनतकशों के सभी तबके अपने अधिकारों पर हो रहे हमलों के खि़लाफ़ बहादुरी से आवाज़ उठा रहे हैं। तमाम क्षेत्रों के मज़दूर – रेल मज़दूर, कोयला मज़दूर, रक्षा और आयुध कारखानों के मज़दूर, टेलिकाम क्षेत्र के मज़दूर, बैंकों और बीमा कंपनियों के मज़दूर और अन्य – सभी इन बहुमूल्य संपत्तियों और सार्वजनिक सेवाओं को सबसे बड़े इजारेदार पूंजीपतियों को बेचे जाने के ख़िलाफ़ सांझे मंच पर एकजुट हो रहे हैं। कई औद्योगिक क्षेत्रों में मज़दूर अपनी यूनियनों और पार्टियों की वफादारियों से ऊपर उठकर अपने रोज़गारों और अधिकारों पर हो रहे हमलों के खि़लाफ़ एक झंडे के तले एकजुट हो रहे हैं।

जैसे कि किसान-विरोधी कानूनों के मामले में सरकार द्वारा यह प्रचार किया जा रहा है कि यह “राष्ट्र हित” में है, उसी तरह इजारेदार पूंजीपतियों की यह सरकार झूठा प्रचार चलाती आ रही है कि निजीकरण का कार्यक्रम और नयी श्रम संहिता भी “राष्ट्र हित” में हैं, क्योंकि ऐसा करने से तथाकथित तौर पर “अर्थव्यवस्था को बढ़ावा” मिलेगा। यह सरासर झूठ है।

पिछले तीन दशकों से अब तक सत्ता में आई पूंजीपतियों की सभी सरकारें उदारीकरण और निजीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के पक्ष में तर्क़ देती आई हैं। इन सभी सरकारों ने तर्क़ दिया है कि यदि पूंजीपतियों को तेज़ी से अमीर होने दिया जाये तो उनकी कुछ अमीरी, उनकी कुछ दौलत, रिसकर मज़दूरों तक भी पहुंच जाएगी। इसलिए जो भी कानून पूंजीपतियों की दौलत को बढ़ाने के रास्ते में रुकावट बनते हैं, उनको ख़त्म कर दिया जाना चाहिए।

लेकिन हक़ीक़त में क्या हुआ है? हमारे देश के सबसे बड़े इजारेदार पूंजीपतियों ने इस दौरान बेशुमार दौलत इकट्ठा की है और आज उनकी गिनती दुनिया के सबसे बड़े अमीरों में की जाती है। दूसरी ओर, हमारे देश के मज़दूर मेहनतकश लोगों की हालत बद से बदतर होती गयी है। सार्वजनिक संपत्ति का निजीकरण और नए श्रम कानून – ये सभी हमारे देश और विदेश के सबसे बड़े इजारेदार पूंजीपतियों को और अधिक तेज़ी से दौलत इकट्ठा करने में मदद करेंगे, जबकि मज़दूर वर्ग को बढ़ते शोषण और बदहाली का सामना करना पड़ेगा।

कृषि कानून और श्रम संहिता, दोनों ही हमारे देश के मज़दूरों और किसानों एक बड़ा हमला है, जो देश के हर एक इलाके में आबादी का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं। संसद में लिए गए फैसलों का देश की अधिकांश आबादी विरोध कर रही है। लेकिन हिन्दोस्तान की सरकार उनकी आवाज़ों को अनसुना कर रही है। इससे यही नज़र आता है कि मौजूदा संसदीय व्यवस्था नाम मात्र का जनतंत्र है।

असलियत में यह पूंजीपतियों का राज है, जिसकी अगुवाई टाटा, बिरला और अन्य इजारेदार पूंजीपति करते हैं। हिन्दोस्तान की सरकार इन मुट्ठीभर अति-अमीर पूंजीपतियों के हितों में काम करती है। यह पूंजीपतियों की तानाशाही है।

साथियों,

इजारेदार पूंजीपतियों के निहायती अमानवीय और बर्बर राज का असली चेहरा तब खुलकर सामने आया जब मार्च 2020 में देशव्यापी तालाबंदी का ऐलान किया गया। रोज़गार की तलाश में शहरों में आये, हमारे करोड़ों भाइयों, बहनों, माताओं, पिताओं और बच्चों को वापस अपने गांवों पैदल चलकर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा था। उन्हें बड़ी बेरहमी के साथ नौकरी से निकाल दिया गया, सरकार ने उनके लिए खाने-पीने तक का कोई इंतजाम नहीं किया और न ही रोज़गार की सुरक्षा या सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की। किसान-विरोधी कानूनों से कृषि क्षेत्र को इजारेदार पूंजीपतियों के लिए खोल दिया गया है, जिससे लाखों-करोड़ों किसान बर्बाद हो जायेंगे और रोज़गार की तलाश में गांवों से शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हो जायेंगे।

अपने रोज़गारों और अधिकारों पर हो रहे हमलों के खि़लाफ़ चल रहा संघर्ष मज़दूरों और किसानों का सांझा संघर्ष है। किसान-विरोधी कानूनों और मज़दूर-विरोधी श्रम संहिताओं के खि़लाफ़ चलाया जा रहा हमारा संघर्ष असलियत में पूंजीपति वर्ग की मौजूदा हुक्मशाही के खि़लाफ़ संघर्ष है। देश की सारी दौलत पैदा करने वाला होने के नाते समाज में फैसले लेने, समाज की दिशा और उसका एजेंडा तय करने के अधिकार को बुलंद करने का हमारा संघर्ष है। यह संघर्ष पूंजीपति वर्ग के परजीवी राज के स्थान पर मज़दूरों और किसानों का राज स्थापित करने का संघर्ष है। हम जो देश की तमाम दौलत पैदा करते हैं, हमें इस देश का मालिक बनना होगा। मज़दूरों और किसानों का राज स्थापित करने के लक्ष्य के साथ हमें अपने रोज़गारों और अधिकारों पर हो रहे हमलों के खि़लाफ़ संघर्ष को तेज़ करना होगा।

हम हैं इसके मालिक, हम हैं हिन्दोस्तान, मज़दूर, किसान, औरत और जवान!

मज़दूर-किसान एकता ज़िंदाबाद!

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