किसान-विरोधी कानूनों को रद्द कराने के लिए किसानों ने पूरे देश में आंदोलन तेज़ किया

सिंघू, टिकरी, गाजीपुर, चिल्ला, धूना, औचंदी, पियू मनारी और सबोली सहित दिल्ली की सीमाओं के विभिन्न विरोध स्थलों पर जारी किसानों के विरोध प्रदर्शन ने 30 दिसंबर को 35वें दिन में प्रवेश किया। शाहजहांपुर और राजस्थान के पास राजस्थान-हरियाणा सीमा पर और पलवल के पास उत्तर प्रदेश-हरियाणा सीमा पर भी विरोध प्रदर्शन जारी है।

भाजपा की अगुवाई में केंद्र की राजग सरकार ने और हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात जैसे राज्यों की भाजपा सरकारों ने उस बहादुर किसान आन्दोलन को बदनाम करने के लिए, एक दुष्प्रचार अभियान चलाया हुआ है, जिसने हमारे देश के सभी राज्यों को झझकोर दिया है। उन्होंने यह झूठा प्रचार करने की कोशिश की है कि किसानों को पता नहीं है कि वे किस लिए लड़ रहे हैं और कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों द्वारा उन्हें गुमराह किया जा रहा है। उन्होंने इस झूठ का प्रचार करके देश के किसानों को बदनाम करने की कोशिश की है कि केवल पंजाब और हरियाणा के किसान ही लड़ रहे हैं, जबकि अन्य राज्यों के किसान इन कानूनों का “स्वागत” कर रहे हैं। उन्होंने सतलुज-यमुना लिंक नहर के मुद्दे को उठाकर पंजाब और हरियाणा के किसानों के बीच फूट डालने की भी नाकाम कोशिश की है। सत्तारूढ़ भाजपा ने किसानों की एकता को तोड़ने के लिए अपने पूरे प्रचार तंत्र को लगाया हुआ है। लेकिन वह इस गंदे उद्देश्य को हासिल करने में पूरी  तरह से विफल रहा है।

कड़ाके की ठंड और इतने कठोर मौसम की परिस्थितियों में किसानों की एकता को तोड़ने और उनके संघर्ष को बदनाम करने की सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद किसान अपने संघर्ष में लगातार डटे हुए हैं।

पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और अन्य राज्यों के सैकड़ों किसान संगठन एक सांझे बैनर तले एक साथ आकर लड़ रहे हैं। वे यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि शासक वर्ग की कोई भी पार्टी, चाहे सत्ताधारी पार्टी हो या विपक्षी पार्टी, कोई भी अपने निहित स्वार्थ के लिए उनके संघर्ष का इस्तेमाल न कर सके। वे मांग कर रहे हैं कि केंद्र सरकार सितंबर में संसद द्वारा पारित तीनों किसान-विरोधी कानूनों को रद्द करे। वे मांग कर रहे हैं कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि कोई भी किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) से कम पर अपनी उपज बेचने के लिए मजबूर न हो। सरकार को एम.एस.पी. पर सभी कृषि उपजों की खरीद की गारंटी देनी चाहिए और इसकी भी कि यह खरीदी उत्पादन लागत से 50 प्रतिशत अधिक दाम पर हो।

एक संयुक्त बैनर तले एकजुट होकर संघर्षरत किसानों ने सरकार के “संशोधनों” को अस्वीकार कर दिया है और आगे की बातचीत के लिए अपनी शर्तें रखी हैं। इनमें शामिल हैं तीनों कानूनों को रद्द करना, सभी फ़सलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारण (एम.एस.पी.) सुनिश्चित करने के लिये कानून बनाना, पराली को जलाने पर कोई जुर्माना नहीं लगाया जाना और किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए विद्युत संशोधन विधेयक-2020 में संशोधन करना। 30 दिसंबर को किसान नेताओं और सरकार के बीच छठे दौर की वार्ता हुई। इन वार्ताओं में सरकार विद्युत संशोधन विधेयक-2020 को वापस लेने पर सहमत हो गई है। पराली जलाने पर किसानों को सज़ा न मिले यह सुनिश्चित करने के लिए कानून में बदलाव करने पर भी सरकार सहमत हो गई है। हालांकि, सरकार ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वह तीनों किसान-विरोधी कानूनों को वापस लेगी। इन स्थितियों में किसान संगठन अपने संघर्ष को तेज़ करने की योजना बना रहे हैं। अगले दौर की वार्ता 4 जनवरी को रखी गई है।

28 दिसंबर को दिल्ली और हरियाणा के बीच टिकरी बॉर्डर के पास पकोड़ा चौक पर हजारों किसानों ने विरोध सभा का आयोजन किया। दिल्ली के आसपास के विरोध स्थलों पर इसी तरह की विरोध सभाएं, विरोध प्रदर्शन और भूख हड़तालें लगभग रोज़ाना की जा रही हैं।

हर दिन पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और देश के कई हिस्सों से हजारों किसान संघर्ष को आगे ले जाने के लिए अपने साथी किसानों के साथ शामिल होने के लिए आ रहे हैं। इसके साथ-साथ देश के कई अन्य हिस्सों में किसानों के विरोध प्रदर्शन आयोजित किए जा रहे हैं।

22 दिसंबर को ठाणे के पालघर और नासिक सहित महाराष्ट्र के लगभग 23 जिलों से हजारों किसान, चल रहे विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए नासिक से दिल्ली के लिए रवाना हुए। दिल्ली रवाना होने से पहले उन्होंने प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के अन्य शीर्ष पदाधिकारियों के पुतलों को जलाकर अपना गुस्सा जाहिर किया। किसान प्रदर्शनकारियों ने बताया कि मध्यप्रदेश और राजस्थान सहित कई राज्यों में लगभग 1,300 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए, लगभग 250 वाहनों से यह यात्रा की गई है। वे 24 दिसंबर को मुंबई-आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग से होते हुए राजधानी पहुंचे।

महाराष्ट्र के किसान लगातार संघर्ष करते रहे हैं, उदाहरण के लिए इस समय वे जानबूझकर बढ़ाये गए उनके बिजली बिलों पर छूट देने और एम.एस. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग कर रहे हैं। बेमौसम बरसात के कारण जिनकी फ़सल ख़राब हुई थी उनके लिए वे 50,000 रुपये प्रति एकड़ की वित्तीय सहायता की मांग कर रहे हैं। उन्होंने तीनों किसान-विरोधी कानूनों का विरोध किया है और देशव्यापी आंदोलन में शामिल होकर ये मांग की है कि सरकार इन कानूनों को रद्द करे।

2 किलोमीटर से अधिक लंबी राजस्थान-हरियाणा सीमा पर शाहजहांपुर में स्थित विरोध स्थल, दिल्ली की सीमाओं पर अन्य विरोध स्थलों के साथ मिलकर चल रहे आंदोलन का एक और प्रमुख केंद्र बन गया है। महाराष्ट्र के 1,200 से अधिक महिला और पुरुष, जो नासिक से 50 से अधिक वाहनों में यात्रा करके वहां पहुंचे हैं, शाहजहांपुर में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

दिल्ली के निकट दिल्ली-जयपुर महामार्ग पर एक कार्यक्रम स्थल पर राजस्थान, गुजरात और हरियाणा के हजारों किसान 13 दिसंबर से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

जल्द ही विरोध प्रदर्शन में गुजरात से कम से कम 200 किसानों के शामिल होने की उम्मीद है। जैसा कि किसान आंदोलन के नेताओं में से एक ने कहा कि “हम केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए महाराष्ट्र से सफर करके आए हैं। हम उन मंत्रियों के झूठ का पर्दाफाश करना चाहते हैं जो दावा करते हैं कि केवल हरियाणा और पंजाब के किसान विरोध कर रहे हैं। वास्तव में देशभर के सभी किसान चाहते हैं कि ये कानून रद्द किये जाएं।”

17 दिसंबर को तमिलनाडु के त्रिची में किसान-विरोधी कानूनों का विरोध करने वाले किसानों के संगठनों ने दिल्ली में हो रहे किसानों के विरोध प्रदर्शनों के समर्थन में “आत्महत्या विरोध” करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया। उन्होंने वहां विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए किसानों की टुकड़ियों को दिल्ली भेजने की अपनी योजना की भी घोषणा की।

तंजावुर में 29 दिसंबर को किसान-विरोधी कानूनों का विरोध करने और दिल्ली की सीमाओं पर महीने भर से चल रहे किसान आंदोलन के समर्थन में हजारों किसानों ने एक विशाल विरोध सभा में भाग लिया। हजारों लोगों को पुलिस ने तंजावुर पहुंचने से रोका। आंदोलनकारी किसान तमिलनाडु के सभी जिलों से आए और वे कई अलग-अलग किसान संगठनों से जुड़े थे।

पटना में 29 दिसंबर को एक लड़ाकू विरोध जुलूस आयोजित किया गया। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के बैनर तले हजारों किसानों ने पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में सुबह-सुबह सभा की और राजभवन तक अपना जुलूस शुरू किया। पुलिस ने किसानों पर लाठीचार्ज किया और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया, लेकिन राज्य के दमन को किसानों ने साहसपूर्ण तरीके से विफल कर दिया और अपनी कार्रवाई को अंजाम दिया।

30 दिसंबर को मणिपुर और हैदराबाद में भी चल रहे आंदोलन के समर्थन में किसान रैलियां आयोजित की गईं।

हिन्दोस्तान के किसान बड़ी बहादुरी से सरकार के खि़लाफ़ खड़े हैं और देश के इतिहास के एक और महत्वपूर्ण संघर्ष में भाग ले रहे हैं। किसानों द्वारा उठाए गए मुद्दे, न केवल किसानों के लिए चिंता का विषय हैं, बल्कि इसका ताल्लुक पूरे समाज के हितों से जुड़ा है। किसानों ने अर्थव्यवस्था के वर्तमान उद्देश्यों के खि़लाफ़ अपना विरोध जाहिर किया है जो मानव समाज की आवश्यकताओं को पूरा करने की बजाय, इजारेदार पूंजीवादी लालच की संतुष्टि करते हैं। किसानों का संघर्ष, मज़दूर वर्ग और हमारे देश के अन्य सभी मेहनतकश लोगों के समर्थन का हक़दार है।

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