केंद्रीय मंत्री का दावा झूठा कि चीनी पर निर्यात सब्सिडी से गन्ना किसानों को होगा फ़ायदा

16 दिसंबर को सरकार का फ़ैसला सुनाते हुए, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बताया कि आर्थिक मामलों पर मंत्रीमंडल की समिति (सी.सी.ई.ए.) ने वर्ष 2020-21 के लिये गन्ने की फ़सल के लिए सरकार ने गन्ना किसानों के लिए 3,500 करोड़ रुपये की सब्सिडी को मंजूरी दे दी है, जिससे 60 लाख टन चीनी का निर्यात होगा। उन्होंने आगे बताया कि केंद्रीय मंत्रीमंडल के इस फ़ैसले से 5 करोड़ गन्ना किसानों को फ़ायदा होगा और यह सब्सिडी सीधे गन्ना किसानों के बैंक खातों में जमा की जाएगी। केंद्रीय मंत्री यह बता रहे हैं कि यह सब्सिडी गन्ना किसानों को मिलेगी, जबकि असलियत तो यह है कि चीनी का निर्यात चीनी मिल के पूंजीपति मालिक करते हैं और यह निर्यात सब्सिडी उन्हें ही मिलेगी।

जब भी चीनी के अत्याधिक उत्पादन का चक्र शुरू होता है, तो गन्ना किसानों को बेवकूफ़ बनाया जाता है। चीनी मिल के पूंजीपति मालिक अपने नुकसान को कम करने के लिए गन्ना किसानों से ख़रीदी गयी फ़सल की रकम किसानों को नहीं देते हैं। वर्ष 2018-19 के अंत तक चीनी मिलों के पास किसानों की कुल बकाया रकम 12,000 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2019-20 के अंत तक यह बढ़कर 13,000 करोड़ हो गयी। चीनी मिलों के पूंजीपति मालिकों के संगठन इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (आई.एस.एम.ए.) ने यह बात स्वीकार की है कि उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों के पास किसानों की 5,553 करोड़ रुपये की कुल रकम बकाया है। इसके बाद कर्नाटक (2,714 करोड़ रुपये) और महाराष्ट्र (2,636 करोड़ रुपये) का नंबर आता है।

हर साल उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र के गन्ना किसानों को चीनी मिलों को बेची गयी अपनी फ़सल की बकाया रकम को पाने के लिए आंदोलन करना पड़ता है।

असलियत तो यह है कि गन्ना किसानों को समय पर फ़सल की रकम का भुगतान किया जाये, इसके लिए केंद्र या राज्य सरकारों ने कोई भी कार्यवाही नहीं की है। व्यापारिक अनुबंध को लागू करने में राज्य की यह एक बेहद बेशर्म नाकामी है।

जब कोई बाज़ार से किसी को वस्तु खरीदता है, तो उसे उसका मूल्य चुकाना पड़ता है। लेकिन चीनी मिल के मालिकों को इस सामान्य नियम से छूट क्यों दी गई है? इससे यही नज़र आता है कि जहां गन्ना किसानों का सवाल आता है, वहां कोई भी नियम या कानून लागू नहीं होते हैं। “इज़ ऑफ डूइंग बिजनस” को बेहतर बनाना केवल पूंजीवादी कंपनियों के लिए ही लागू होता है। किसानों के लिए कोई इज़ ऑफ डूइंग बिजनस नहीं है, जिन्हें अपनी बेची हुई फ़सल के दाम तक नहीं दिए जाते हैं।

अपनी बकाया रकम के लिए जब किसानों ने आंदोलन किया, तो सितम्बर 2020 में संसद में सरकार ने यह जवाब दिया कि – “चीनी मिलों द्वारा किसानों से ख़रीदी गई फ़सल का भुगतान करना एक निरंतर प्रक्रिया है। लेकिन पिछले मौसम में चीनी के अधिक उत्पादन से बाज़ार में चीनी के भाव गिर गए, जिससे चीनी मिलों के पास नगदी का संकट आ गया और वे किसानों को उनकी बकाया रकम का भुगतान नहीं कर पाए।“ सरकार का यह तर्क़ साफ तौर से पूंजीपतियों के हित में है, जिसकी क़ीमत किसानों की रोज़ी-रोटी की सुरक्षा की बलि देकर चुकाई जा रही है।

केंद्र सरकार दावा करती है कि उसने “गन्ने की पिछली तीन फ़सलों के दौरान कई क़दम उठाये हैं, जैसे कि चीनी के निर्यात को आसान बनाने के लिए चीनी मिलों को सहायता दी है; बफर स्टॉक बनाये रखने के लिए सहायता दी है; गन्ना ख़रीदी की बकाया रकम का भुगतान करने के लिए बैंकों से कम ब्याज दरों पर कर्ज़ा देने का इंतजाम किया है; और चीनी की बिक्री के लिए एक न्यूनतम मूल्य निर्धारित किया है”!

ये सारे उपाय चीनी मिलों के मालिकों के हित में किये गए हैं। यह तर्क दिया जाता है कि जब चीनी मिलों के मालिकों के खातों में पैसा जमा हो जायेगा, तो वे किसानों का भुगतान कर देंगे। यह बे-सिर-पैर का संदेहास्पद तर्क है, जिसके आधार पर मंत्री यह दावा कर रहे हैं कि सरकार द्वारा दी गयी सब्सिडी सीधे किसानों के खातों में जाएगी। यह तर्क इसलिए संदेहास्पद है क्योंकि इसकी कोई गारंटी नहीं है कि पूंजीपति इस सब्सिडी का इस्तेमाल किसानों की बकाया रकम का भुगतान करने के लिए करेंगे।

गन्ना किसान पिछले कई वर्षों से अपने अधिकारों की मांग करते आ रहे हैं। सबसे हाल का संघर्ष तमिलनाडु में तेनकासी के गन्ना किसानों ने दिसंबर 2020 में शुरू किया था। ये गन्ना किसान अपने 24 करोड़ रुपयों की बकाया रकम के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इससे पहले सितम्बर में तमिलनाडु शुगरकेन फार्मर्स एसोसिएशन से संबद्ध किसानों ने मदुरई कलेक्टरेट के बाहर धरना प्रदर्शन आयोजित किया और केंद्र व राज्य सरकार से मांग की कि गन्ने की फ़सल के लिए उचित एवं लाभकारी दाम (एफ.आर.पी.) को बढ़ाकर 5,000 रुपये प्रति टन किया जाये और यह सुनिश्चित किया जाये कि चीनी मिलें किसानों की बकाया रकम का भुगतान करें।

नवंबर 2019 में कर्नाटक के गन्ना किसानों को अपनी 1.9 करोड़ रुपये की बकाया रकम के लिए संघर्ष करना पड़ा था। जनवरी 2019 में उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों को चीनी मिलों से अपनी बकाया रकम को हासिल करने के लिए संघर्ष करना पड़ा। उत्तर प्रदेश में केवल एक चीनी मिल के पास 2018-19 में किसानों का 80 करोड़ रुपये और 2019-20 में 120 करोड़ रुपये का बकाया था। किसान जिला और राज्य प्रशासन के खि़लाफ़ बेहद गुस्से में हैं, क्योंकि प्रशासन ने भुगतान न करने वाले गुनहगार मिल मालिकों के खि़लाफ़ कोई भी कार्यवाही नहीं की है।

2018 में भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने मेरठ में 15 दिनों का धरना प्रदर्शन आयोजित किया था और मांग की थी कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि उनकी बकाया रकम का तुरंत भुगतान किया जाये।

इन सभी सबूतों से यह साफ़ हो जाता है कि सरकार का यह दावा कितना खोखला है कि लाखों-करोड़ों किसानों को इस सब्सिडी से फ़ायदा होगा। यह एक और सफेद झूठ है, जिसका इस्तेमाल सरकार ज़मीनी हक़ीक़त को छुपाने के लिए कर रही है। केंद्र और राज्य सरकारें पूंजीपतियों के हितों में काम करती हैं न कि किसानों के हितों में। यही सच्चाई है।

चूँकि अब करोड़ों किसान इस असलियत को समझ गये हैं, किसान आन्दोलन ने हुक्मरान पूंजीपति वर्ग के सुख-चैन को झंकझोर कर रख दिया है। इसलिए देशभर के लाखों-करोड़ों किसान अपनी रोज़ी-रोटी की सुरक्षा के अधिकार की मांग कर रहे हैं, और ऐसे कानूनों का विरोध कर रहे हंै जिनसे उन्हें इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों का गुलाम बन जाने का ख़तरा है।

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