विस्ट्रों और टोयोटा किर्लोस्कर मोटर्स के मज़दूर हड़ताल पर: बढ़ते शोषण के ख़िलाफ़ लड़ाकू प्रतिरोध

हिन्दोस्तानी और विदेशी बड़े पूंजीपतियों के लिए हर क़ीमत पर “व्यापार के अनुकूल” माहौल बनाने की मोदी सरकार की कोशिशों को कर्नाटक के मज़दूरों की ओर से जबरदस्त लड़ाकू चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

12 दिसंबर को बेंगलुरू के नजदीक नरसापुर में स्थित ताईवानी कंपनी विस्ट्रों में मज़दूरों का आक्रोश फूट पड़ा। यह कंपनी विशाल अमरीकी कंपनी एप्पल के लिए आई-फोन और अन्य उपकरण बनाती है। महीनों तक अपना वेतन न मिलने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के नाम पर बढ़ते शोषण को मज़दूरों ने और अधिक बर्दाश्त करने से इंकार कर दिया। उनका यह आक्रोश बेंगलुरू के नजदीक बिदादी में टोयोटा किर्लोस्कर मोटर्स के कारखाने के मज़दूरों की हड़ताल के तुरंत बाद उभर कर आया, जो इसी तरह के शोषण का शिकार हैं, और उनका संघर्ष कई सप्ताहों से आज भी जारी है।

विस्ट्रों में मज़दूरों के इस आक्रोशित प्रदर्शन के बाद पुलिस ने करीब 300 मज़दूरों को हिरासत में लेकर जेलों में डाल दिया है। एप्पल कंपनी और राज्य सरकार की खुद की जांच-रिपोर्ट में यह माना गया है कि विस्ट्रों कंपनी कई श्रम-कानूनों का उल्लंघन कर रही है और मज़दूरों को वेतन नहीं दिया है। लेकिन इसके बावजूद येड्यूरप्पा की सरकार ने बड़ी बेशर्मी के साथ केवल इस बात की चिंता जताई है कि मज़दूरों के आक्रोशित प्रदर्शन की वजह से कर्नाटक की “पूंजी निवेश के अनुकूल” एक राज्य बतौर छवि को धक्का लगेगा। कर्नाटक की सरकार ने विस्ट्रों कंपनी के मालिकों को फिर से उत्पादन शुरू करने और मज़दूरों को सज़ा देने में पूरे सहयोग का आश्वासन दिया है। इसी तरह से राज्य सरकार टोयोटा किर्लोस्कर के प्रबंधन को भी सहयोग का आश्वासन दे रही है, जिसने कंपनी में तालाबंदी लागू की हुई है, जिसे कर्नाटक उच्च न्यायालय ने भी गैर-कानूनी करार दिया है।

पिछले कुछ वर्षों से हिन्दोस्तानी राज्य देशी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों की ओर से, मज़दूरों के कड़े संघर्ष के बाद हासिल अधिकारों पर हमले करने की हर संभव कोशिश कर रहा है। इतना ही नहीं, केंद्र सरकार और तमाम राज्य सरकारें नयी श्रम संहिता के कानूनों को लागू करने के लिए बड़े ही आपराधिक तरीके से कोविड महामारी से पैदा हुई हालतों का इस्तेमाल कर रही हैं, जिसमें मज़दूरों के इकट्ठा होने और विरोध प्रदर्शन करने पर पाबंदियां लगायी गयी हैं। ये श्रम संहितायें बरसों के कड़े संघर्षों से हासिल किये गये अधिकारों से मज़दूरों को वंचित करती हैं। सरकारों ने खुलकर यह ऐलान किया है कि विदेशी पूंजी निवेश को चीन से हिन्दोस्तान की ओर खींचने के लिए वे पूंजीपतियों को श्रम और ज़मीन आसान शर्तों पर उपलब्ध कराएंगी। विस्ट्रों और टोयोटा किर्लोस्कर के मज़दूरों का संघर्ष यह दिखाता है कि मज़दूर वर्ग अपने अधिकारों और काम की बेहतर परिस्थितियों पर हो रहे हमलों के सामने झुकने को तैयार नहीं है। यह बेहद महत्वपूर्ण बात है कि ये हड़तालें उच्च-तकनीकी के इलेक्ट्रॉनिक और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में हो रही हैं, जिन्हें सरकार “आदर्श” और “उच्च वेतन” वाले उद्योग के रूप में प्रचारित कर रही है।

विस्ट्रों के मज़दूर इतने गुस्से में क्यों हैं?

विस्ट्रों के मज़दूर, शिक्षित महिला और पुरुष हैं और इनमें से कई मज़दूरों ने इंजीनियरिंग और आई.टी.आई. से डिप्लोमा की पढ़ाई की है। जिस समय ये मज़दूर विस्ट्रों में काम पर रखे गए थे, उस समय उन्हें 20,000 रुपये प्रतिमाह या उससे अधिक वेतन देने का वादा किया गया था। लेकिन असलियत में उन्हें 8,000 रुपये या उससे भी कम 5,000 रुपये का वेतन दिया जा रहा है। इसके लिए कंपनी ने तमाम बहानों से उनके वेतन में कटौती करती रही है या फिर अनुबंध की शर्तों को मानने से इंकार करती रही है।

इस कारखाने में 12,000 मज़दूर काम करते हैं। जिस समय विस्ट्रों के अधिकारियों ने मज़दूरों का इंटरव्यू लिया था, उस समय उन्हें यह विश्वास दिलाया था कि वे सीधे इस कंपनी के लिए काम करेंगे। लेकिन कुछ 1,300 मज़दूरों को छोड़कर अन्य सभी मज़दूरों को नियुक्ति पत्र 6 ठेकेदारों की ओर से जारी किये गये। जानबूझकर किये गए इस फ़र्ज़ीवाड़े के चलते, विस्ट्रों इन मज़दूरों के साथ ठेका मज़दूरों के जैसा बर्ताव कर सकती है और कंपनी उन्हें स्थायी मज़दूरों के अधिकारों से वंचित कर सकती है।

8 घंटा प्रतिदिन काम की सामान्य शिफ्ट की जगह पर उन्हें 12 घंटे तक काम करना पड़ता है और इसके लिए उन्हें ओवर टाइम नहीं दिया जाता है। इसका मतलब है कि आप-पास के इलाकों से आने वाले इन मज़दूरों को दिन की शिफ्ट के लिए सुबह 4 बजे उठकर काम पर जाना होता है और ये रात को 8 बजे तक ही घर वापस आ पाते हैं। इस तरह के कमर-तोड़ काम को कानूनी बनाने के लिए, सरकार महामारी की हालतों में जारी किये गए अध्यादेश का सहारा ले रही है, जिसके तहत अर्थव्यवस्था की गति को तेज़ करने के नाम पर मज़दूरों के काम के घंटे बढ़ाये गए हैं। मज़दूरों ने शिकायत की है कि दोपहर के खाने की छुट्टी और 15 मिनट के चाय के अवकाश के अलावा, वे बगैर इज़ाज़त के बाथरूम या पानी पीने के लिए भी नहीं जा सकते। बीमारी की वजहों या अन्य आपातकाल की स्थितियों में भी उन्हें छुट्टी नहीं दी जाती है।

यहां मज़दूरों की यूनियन भी नहीं है क्योंकि यह कारखाना जुलाई में ही चालू हुआ है। इसके बावजूद मज़दूरों ने अपनी शिकायतों को प्रबंधन के अलावा कोलर के डेपुटी कमिश्नर और राज्य के श्रम विभाग के पास पहुंचाने की बार-बार कोशिश की है। 12 दिसंबर को जो आक्रोश फूट पड़ा, वह अधिकारियों और सरकार द्वारा उनकी शिकायतों पर ध्यान न दिये जाने का नतीजा था। लेकिन कंपनी के अधिकारियों और मीडिया ने इस बात को नज़रंदाज़ कर दिया और मज़दूरों द्वारा “तोड़-फोड़” किये जाने पर ही पूरा ध्यान दिया। विस्ट्रों कंपनी ने शुरुआत में दावा किया था कि उनको 437 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है लेकिन बाद में उन्होंने चुपके से इसे 53 करोड़ तक कम कर दिया।

बताया जा रहा है कि 12 दिसंबर की घटना के बाद, मोदी ने कहा है कि वह विस्ट्रों में हुई “हिंसा” से बेहद विचलित है। लेकिन विदेशी पूंजीवादी कंपनियों और उनके प्रबंधन द्वारा अपने देशवासी मज़दूरों के खि़लाफ़ फ़र्ज़ीवाड़ा किये जाने, नाजायज़ श्रम कानून लागू होने की उन्हें कोई चिंता नहीं है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों का रवैया भी इसी तरह का मज़दूर-विरोधी और पूंजीपति-परस्त है। ऐसा रवैया यह सब जानते हुए है कि उनकी खुद की सरकार के कारखाने, बायलर, उद्योग, सुरक्षा और स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट में यह बताया गया है कि विस्ट्रों कंपनी ने कई कानूनों और नियमों का उल्लंघन किया है, जिसकी ख़बर डेक्कन हेराल्ड के 15 दिसंबर के अंक में प्रकाशित हुई है।

टोयोटा किर्लोस्कर मोटर्स (टी.के.एम.) के मज़दूरों की हड़ताल

बिदादी में टी.के.एम. के कारखाने के 600 मज़दूरों में से आधे से अधिक मज़दूर एक यूनियन में संगठित हैं। इस कारखाने में 9 नवंबर को टकराव उस समय उभरकर आया जब यूनियन के एक सदस्य ने मज़दूरों की शिकायतों को लेकर प्रबंधन से बातचीत करने की कोशिश की और प्रबंधन ने उसपर ही झूठा आरोप लगाते हुए उसे निलंबित कर दिया। प्रबंधन की इस कार्यवाही के विरोध में मज़दूरों ने काम रोक दिया और प्रबंधन ने तुरंत कारखाने में लॉक-आउट घोषित कर दिया।

टी.के.एम. के मज़दूरों को वैसी ही हालतों का सामना करना पड़ रहा है जैसी कि विस्ट्रों के मज़दूरों को करना पड़ता है, खास तौर से कार्यक्षमता बढ़ाने के नाम पर मज़दूरों का शोषण बढ़ाना। मज़दूरों की संख्या बढ़ाने या ओवर टाइम के लिए भगुतान करने की बजाय कंपनी ने मज़दूरों के स्वास्थ्य या खुशहाली की चिंता किये बगैर उत्पादन को और अधिक बढ़ाने के लिये जबरदस्ती की। ट्रेड यूनियन के अध्यक्ष ने बताया कि “कंपनी मिली-सेकेंड में काम तय कर रही है”। “यह असंभव है, यह अमानवीय है”। “टोयोटा उत्पादन प्रणाली” का तथाकथित लक्ष्य अधिकतम मुनाफ़ा कमाने के लिए खर्च कम करने को एक कला बनाना है। इसमें न केवल उत्पादन की गति को तेज़ करना शामिल है बल्कि स्थायी मज़दूरों को कुछ मुआवज़ा देकर नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर करना भी शामिल है, ताकि कंपनी उनकी जगह पर ठेका मज़दूरों से काम करा सके।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री येड्यूरप्पा ने किर्लोस्कर और अन्य पूंजीपतियों के साथ मीटिंग की है और उन्हें आश्वासन दिया है कि वे फैक्ट्री को चालू करने के लिए हर संभव मदद करेंगे। इस मीटिंग का बहुत प्रचार किया जा रहा है। लेकिन 6 सप्ताह के बाद भी अधिकांश मज़दूरों ने प्रबंधन की शर्तों को मानने से इंकार कर दिया है और कारखाने में हड़ताल और तालाबंदी अभी भी जारी है।

उत्पादन का भूमंडलीकरण मज़दूर वर्ग के हितों के ख़िलाफ़ है

यह कोई संयोग की बात नहीं है कि दो कारखाने जहां के मज़दूर हड़ताल पर हैं, जिन्हें सरकार के “मेक इन इंडिया” के कार्यक्रम का “ध्वज वाहक” माना जाता है। हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों के लिए अधिकतम मुनाफ़ा कमाने हेतु सबसे अच्छा माहौल बनाने के लक्ष्य से तमाम केंद्र और राज्य सरकारें काम करती आई हैं। विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें इन कंपनियों को रियायती दरों पर ज़मीन देने की पेशकश कर रही हैं और यूनियन बनाने के अधिकार, सामाजिक सुरक्षा के अधिकार, ओवरटाइम के अधिकार का उल्लंघन करने और नियमित कार्यों को ठेका मज़दूरों से कराने, इत्यादि जैसे नाजायज़ तरीक़ों का इस्तेमाल करने की खुली छूट दे रही हैं। हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपति मांग कर रह हैं कि केंद्र और राज्य सरकारें इस तरह के श्रम कानून बनायें जिससे मज़दूरों के अत्याधिक शोषण को कानूनी जामा पहनाया जा सके। पूंजीपतियों की सेवा में मोदी सरकार ने मज़दूर वर्ग के विरोध के बाजवूद महामारी का फ़ायदा उठाते हुए तीन मज़दूर-विरोधी कानूनों को पारित किया है।

सरकार और उसके समर्थक इस सड़ी-गली पूंजीपति-परस्त नीति का “देश” और उसके “विकास” के हित में होने का प्रचार कर रहे हैं। लेकिन आखिर “देश” क्या है? क्या मज़दूर और मेहनतकश लोग देश नहीं हैं? यह किस तरह का “विकास” है जो लोगों से उनके अधिकार, सम्मान और खुशहाली को छीनता है? विस्ट्रों और टोयोटा किर्लोस्कर के मज़दूरों ने अपने संघर्ष से दिखा दिया है कि वे हिन्दोस्तानी राज्य और पूंजीपतियों की मज़दूर-विरोधी नीतियों को ठुकराते हैं और साथ ही इस झूठे प्रचार को भी ठुकराते हैं कि ये नीतियां किसी तरह से देश के हित में हैं। हमारे देश के मज़दूर, पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकार द्वारा, अपने अधिकारों पर किये जा रहे हमलों के सामने झुकने से इंकार कर रहे हैं।

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