द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 75 वीं वर्षगांठ पर

भाग 3 : द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले प्रमुख साम्राज्यवादी शक्तियों तथा सोवियत संघ की रणनीति

दुनियाभर के बाज़ारों और प्रभाव क्षेत्रों के पुनः बंटवारे के लिए नए साम्राज्यवादी युद्ध की शुरुआत 1930 में हो गयी थी। ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी को सोवियत संघ के ख़िलाफ़, जापान को चीन और सोवियत संघ के ख़िलाफ़ भड़काने की सोची-समझी नीति चलायी, ताकि ये सभी देश आपसी टकराव के चलते कमजोर हो जाएं। ऐसा करते हुए ब्रिटेन और फ्रांस जंग में कुछ देर बाद शामिल होने और विजेता बनकर उभरने की योजना बना रहे थे। अमरीका की रणनीति हालातों पर निगाह रखने और बाद में जंग में उतरने की थी ताकि अन्य साम्राज्यवादी ताक़तों के थक जाने के बाद वह स्पष्ट रूप से सबसे शक्तिशाली देश की तरह उभर कर आये।

दोनों विश्व युद्धों के दरम्यान दुनिया की साम्राज्यवादी शक्तियों को मुख्य ख़तरा समाजवादी सोवियत संघ के मजबूत होने और आगे बढ़ने से था। वे अपने देश और उपनिवेशों में क्रांति और कम्युनिज़्ाम के ख़ौफ से बेहद परेशान थे।

इसलिए वे जापान, इटली और जर्मनी की आक्रामक कार्यवाहियों को देखते रहे, लेकिन किया कुछ भी नहीं, ख़ास तौर से जब तक उनके देश और उपनिवेशों को उनसे सीधा ख़तरा नहीं था। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाये रखने के लिए स्थापित किया गया लीग ऑफ नेशंस इन कार्यवाहियों को रोकने के लिए कोई क़दम न उठाये।

यहां तक कि जब नाज़ी जर्मनी ने ऑस्ट्रिया पर हमला किया और पूरे यूरोप में अपना विस्तार करने की मंशा साफतौर पर ज़ाहिर की, तब भी इन साम्राज्यवादी शक्तियों ने जर्मनी के प्रति तुष्टीकरण की नीति  अपनाई। 1938 में उन्होंने जर्मनी के साथ म्युनिख समझौता किया और जर्मनी को चेकोस्लोवाकिया के सुडेटनलैंड पर कब्ज़ा करने की इज़ाज़त दी, जहां पर हथियारों का उद्योग बहुत विकसित था। उनकी कोशिश थी कि जर्मनी पूर्व दिशा में, यानी सोवियत संघ की तरफ बढ़े।

जे.वी. स्टालिन की अगुवाई में सोवियत संघ ने जर्मनी और अन्य साम्राज्यवादी शक्तियों के इरादों को अच्छी तरह समझा। 1939 में आयोजित सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) के 18वें महाधिवेशन को स्टालिन ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि दुनिया के बाज़ारों और प्रभाव क्षेत्रों के पुनः बंटवारे के लिए नयी साम्राज्यवादी जंग शुरू हो चुकी है। उन्होंने बताया कि किस तरह से ब्रिटेन और फ्रांस जर्मनी को सोवियत संघ के ख़िलाफ़, जापान को चीन और सोवियत संघ, इत्यादि के ख़िलाफ़ भड़काने की नीति अपना रहे हैं, ताकि ये सभी देश आपसी टकराव में एक दूसरे को कमज़ोर कर दें। इस तरह से ब्रिटेन और फ्रांस जंग में कुछ देर बाद शामिल होंगे और विजेता बनकर उभरेंगे।

दस्तावेज़ दिखाते हैं कि किस तरह से सोवियत संघ ने ब्रिटेन, फ्रांस और पोलैंड को एक आपसी सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए कई बार अनुरोध किये, ताकि यदि जर्मनी किसी एक देश पर हमला करता है तो अन्य देश उसकी सुरक्षा के लिए आगे आ सकें। एक तरफ सोवियत संघ और दूसरी ओर ब्रिटेन और फ्रांस के बीच इस विषय पर 15 अगस्त, 1939 तक चर्चा चलती रही। यहां तक कि सोवियत संघ ने जर्मनी द्वारा पोलैंड पर संभावित आक्रमण से उसकी हिफ़ाज़त करने के लिए 10 लाख सैनिकों को भेजने का प्रस्ताव रखा। ब्रिटेन और फ्रांस ने सोवियत संघ के आपसी सुरक्षा समझौते के प्रस्ताव को भी स्वीकार नहीं किया। इसी तरह से पोलैंड ने भी सोवियत संघ के साथ आपसी सुरक्षा समझौते के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और सोवियत सेना को पोलैंड में प्रवेश करने की इजाज़त नहीं दी।

ब्रिटेन, फ्रांस और पोलैंड ने जब आपसी सुरक्षा समझौते को ठुकरा दिया तो सोवियत संघ के पास जर्मनी के साथ गैर-आक्रमणकारी समझौता करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा था। उसे जंग की तैयारी करने के लिए, ज़रूरी क़दम उठाने के लिए कुछ समय की ज़रूरत थी, क्योंकि वह जानता था कि जंग होना लाज़मी है। आज तक इस गैर-आक्रमणकारी समझौते को लेकर पश्चिमी ताक़तें और उनके प्रवक्ता सोवियत संघ के ख़िलाफ़ लगातार झूठा प्रचार चलाते आ रहे हैं। नाज़ी जर्मनी का तुष्टीकरण करने और आपसी सुरक्षा समझौते के सोवियत संघ के प्रस्ताव को ठुकराने की अपनी कार्यवाही पर पर्दा डालते हैं। वे झूठ फैलाते हैं कि जर्मनी और सोवियत संघ के बीच गैर-आक्रमणकारी समझौता द्वितीय विश्व युद्ध का प्रत्यक्ष कारण था।

जब जर्मनी ने पोलैंड पर हमला कर दिया तो पोलैंड के मित्र देश बतौर ब्रिटेन और फ्रांस, जर्मनी के ख़िलाफ़ जंग की घोषणा करने के लिए मजबूर हो गए। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने पोलैंड की सहायता करने के लिए असलियत में एक ऊंगली तक नहीं उठाई। जब हिटलर की फौज पोलैंड राज्य को तहस-नहस कर रही थी, पोलैंड के लोगों का बर्बरता से कत्लेआम कर रही थी, उस समय भी ब्रिटेन और फ्रांस ने हजारों-लाखों की अपनी विशाल सेना से एक भी सैनिक पोलैंड नहीं भेजा। इसलिए इस दौर को “दिखावटी जंग” के नाम से जाना जाता है।

इस बीच जब दो वर्ष तक यूरोप और पूर्वी एशिया में घमासान जंग चल रही थी तो अमरीका आराम से बैठकर इन गतिविधियों को देख रहा था। उसकी रणनीति थी – तमाम शक्तियां आपस में लड़कर थक जाएं, ताकि वह एक निर्विवादित विजेता के रूप में उभरकर आगे आये।

लेख के 6 भागों में से अगला भाग–चार पढ़ें : द्वितीय विश्व युद्ध की प्रमुख लड़ाइयां

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