द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 75वीं वर्षगांठ पर

दुनिया में युद्ध और टकराव का स्रोत साम्राज्यवाद था और आज भी है

75 वर्ष पहले, 2 सितंबर, 1945 को द्वितीय विश्व युद्ध तब समाप्त हुआ, जब जापान ने मित्र राष्ट्रों (अलाइड फोर्सेस) की सेनाओं के सामने आत्मसमर्पण की संधि पर हस्ताक्षर किये। यूरोप, एशिया, उत्तरी अमरीका और अन्य महाद्वीपों के देशों के करोड़ों लोगों ने फासीवाद और सैन्यवाद को हराने के लिए इस महान संघर्ष में अपने प्राणों की आहुति दी। नाज़ी जर्मनी, फासीवादी इटली और सैन्यवादी जापान को पराजित करने के इस संघर्ष में सोवियत संघ ने एक निर्णायक भूमिका निभाई।

द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के तुरंत बाद, आंग्ल-अमरीकी साम्राज्यवादियों ने जानबूझकर उन कारणों को तोड़-मरोड़कर पेश करना शुरू कर दिया, जिनकी वजह से द्वितीय विश्व युद्ध हुआ था। उन्होंने सोवियत संघ के खि़लाफ़ नाज़ी जर्मनी को प्रोत्साहित करने और उसे उकसाने में, अमरीका और ब्रिटेन की भूमिका को छिपाने की कोशिशें शुरू कर दीं। जर्मनी, इटली और जापान की सेनाओं के जूते तले कुचले जा रहे लोगों और देशों को आज़ाद कराने में सोवियत संघ और उसके लोगों की वीरतापूर्ण भूमिका को लोगों के दिलों से मिटाने की कोशिश में उन्होंने इतिहास को झुठलाना शुरू कर दिया।

इस तरह से इतिहास को झुठलाने और सोवियत संघ के खि़लाफ़ झूठा प्रचार आज तक लगातार जारी है। आंग्ल-अमरीकी साम्राज्यवादी सोवियत संघ पर नाज़ी जर्मनी के साथ सांठगांठ करने और दूसरे विश्व युद्ध के लिए ज़िम्मेदार होने का झूठा आरोप लगाते रहते हैं।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी अपने पाठकों को द्वितीय विश्व युद्ध के कारणों के बारे में और लोगों को इससे क्या सबक लेना चाहिए इसके बारे में शिक्षित करने के लिए 6-भाग की एक श्रृंखला प्रकाशित कर रही है।

भाग 1 – इतिहास से सबक

हमें इतिहास से सही सबक लेना चाहिए, ताकि मानव जाति युद्ध के अभिशाप को और लोगों के उत्पीड़न को हमेशा के लिए ख़त्म कर सके।

इस वर्ष द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 75वीं वर्षगांठ है। 2 सितंबर, 1945 को जापान ने मित्र राष्ट्र शक्तियों की सेनाओं के साथ औपचारिक आत्मसमर्पण की संधि पर हस्ताक्षर किये। इससे पहले 9 मई, 1945 को नाज़ी जर्मनी ने मित्र राष्ट्र शक्तियों की सेनाओं के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था।

द्वितीय विश्व युद्ध 1939 से 1945 के बीच यूरोप और उत्तरी अफ्रीका में चला। हालांकि एशिया में युद्ध इससे दो साल पहले ही, 1937 में शुरू हो चुका था, जब जापान ने चीन पर आक्रमण किया था। द्वितीय विश्व युद्ध मानव इतिहास में उस समय की सबसे तबाहकारी घटना थी। इसमें 12 करोड़ से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई, जिनमें केवल सोवियत संघ और चीन में ही लगभग 6 करोड़ लोग मारे गए थे। युद्ध में लगभग 8,70,000 हिन्दोस्तानी सिपाही मारे गए थे।

द्वितीय विश्व युद्ध को हमलावर राज्यों द्वारा निर्दोष लोगों पर किए गए बर्बर अत्याचारों के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। इन अत्याचारों में नाज़ी जर्मनी द्वारा यहूदियों व विभिन्न जातीयों या राष्ट्रीयताओं के समूहों को नस्ल के आधार पर निशाना बनाया जाना और उनके साथ ही कम्युनिस्टों, मज़दूर वर्ग के कार्यकर्ताओं और अन्य प्रगतिशील लोगों का यातना शिविरों में कत्लेआम शामिल हैं। मानवता के खि़लाफ़ इतने बड़े पैमाने पर आयोजित इन जघन्य अपराधों में जापानी सेना शामिल है। जापानी सेना ने मध्य चीन के शहर, नानजिंग पर कब्ज़ा करके लोगों के कत्लेआम और बलात्कार किये, जिसे “रेप ऑफ नानजिंग” के नाम से जाना जाता है। सोवियत रूस के शहर लेनिनग्राद पर 872 दिनों की घेराबंदी और बमबारी, जापान के शहर हिरोशिमा और नागासाकी पर अमरीका द्वारा परमाणु बम गिराया जाना और इसी तरह के कई अन्य अकथनीय अपराध शामिल हैं।

युद्ध के अंत में, नाज़ी जर्मनी, फासीवादी इटली और सैन्यवादी जापान की हार हुई। युद्धों को रोकने और भविष्य में लोगों की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के प्रयासों के साधन के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन हुआ। मानव अधिकारों का सर्वव्यापक घोषणापत्र (यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स) जारी किया गया। इससे समाजवाद और सोवियत संघ की प्रतिष्ठा में भारी बढ़ोतरी हुई, जिसने नाज़ी ताक़तों के हमलों को पराजित करने में एक अग्रणी भूमिका निभाई थी। जिसने दुनियाभर में साम्राज्यवाद-विरोधी, लोकतांत्रिक और समाजवादी ताक़तों को मजबूत किया। जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चीन में क्रांति की जीत, हिन्दोस्तान में उपनिवेशवादी शासन का अंत और बड़ी संख्या में यूरोप और एशिया के कई देशों में लोगों के लोकतंत्र की स्थापना का साधन भी बनी।

दूसरी तरफ युद्ध के अंत में सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी महाशक्ति के रूप में अमरीकी साम्राज्यवाद की स्थापना भी हुई। इन हालातों में समाजवादी सोवियत संघ के खि़लाफ़ अमरीका के नेतृत्व में एक नए युद्ध, शीत युद्ध की शुरुआत हुई। शीत युद्ध के दौरान राज्यों के सैन्यीकृत गुट उभर कर सामने आये। साथ-साथ तमाम तरह के हथियारों के विकास और भंडारण में भारी वृद्धि हुई। इन हथियारों में द्वितीय विश्व युद्ध में इस्तेमाल किए गए सभी हथियारों की तुलना में, कई गुणा लोगों को मारने की क्षमता थी। युद्ध के तुरंत बाद, अमरीकी साम्राज्यवाद ने कम्युनिज्म के ”लाल ख़तरे“ का मुक़ाबला करने के नाम पर विभिन्न देशों में अनेक प्रकार के दमनकारी और प्रतिक्रियावादी शासकों को पैदा करने और उनको सत्ता में लाने के प्रयासों में और तेज़ किया। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने खुद अमरीका के भीतर, मज़दूर वर्ग और प्रगतिशील लोगों के खि़लाफ़ जबरदस्त दमन चलाया।

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के 75 साल बाद भी आज का कड़वा सच तो यही है कि दुनिया के लोग अभी भी युद्ध के कहर और राष्ट्रीय और सामाजिक उत्पीड़न से मुक्त नहीं हैं। पिछले कुछ दशकों में अनेक देशों को बेरहमी से पूरे के पूरे बर्बाद कर दिया गया है। लाखों लोगों को बेघर किया गया है। करोड़ों लोग उनकी राष्ट्रीयता, जाति या धर्म के नाम पर किये गए हमले और सुनियोजित कत्लेआम के शिकार हुए हैं। अनगिनत लोगों को उनके मूलभूत मानवाधिकारों से भी वंचित किया गया है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भी सभी लोगों के लिए एक शांतिपूर्ण और सुरक्षित भविष्य की उम्मीदें इसलिए पूरी नहीं हुई हैं क्योंकि हमारे युग में भी विनाशकारी युद्ध और दमन का मूल कारण – साम्राज्यवाद और राज्यों की साम्राज्यवादी व्यवस्था – अभी तक क़ायम है।

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 75वीं वर्षगांठ पर मुख्य साम्राज्यवादी शक्तियां और उनके द्वारा संचालित मीडिया, इस अवसर को युद्ध के चरित्र और परिणाम के बारे में लोगों के बीच भ्रम का कोहरा फैलाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। साम्राज्यवादी शक्तियां युद्ध में अपनी खुद की भूमिका पर लीपापोती करने और सोवियत संघ को बदनाम करने की कोशिश कर रही हैं, जबकि सोवियत संघ ने फासीवादी ताक़तों को हराने में एक बहादुर और अग्रणी भूमिका निभाई थी। युद्ध को बीते हुए अतीत की कहानी के रूप में पेश करते हुए साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच इस समय दुनिया के पुनर्विभाजन के लिए चल रहे तीव्र अंतर्विरोधों से उत्पन्न एक नए विश्व युद्ध के ख़तरों के बारे में वे लोगों की आंखों के धूल झोंकना चाहते हैं।

इसलिए हमारे लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण है कि हम पहले से कहीं अधिक गहराई से उन कारणों पर ध्यान दें, जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध को जन्म और साथ ही उसके बाद के परिणामों को अंजाम दिया था। हमें अपने बीते इतिहास से सही सबक लेना चाहिए, ताकि हम सब मिलकर युद्ध के इस अभिशाप और लोगों के दमन को हमेशा के लिए मिटा सकें।

लेख के 6 भागों में से अगला भाग–दो  पढ़ें : 20वीं सदी में दो विश्व युद्धों के लिए कौन और क्या ज़िम्मेदार था?

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