द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 75वीं वर्षगांठ पर

भाग 2 : 20वीं सदी में दो विश्व युद्धों के लिए कौन और क्या ज़िम्मेदार था?

20वीं सदी में दो महायुद्धों के लिए दुनिया के पुनर्विभाजन के ज़रिये अपने प्रभाव क्षेत्रों का विस्तार करने की कोशिशों में लगी साम्राज्यवादी ताक़तें ज़िम्मेदार थीं।

20वीं शताब्दी की शुरुआत तक पूंजीवाद अपने आखिरी और अंतिम चरण के साम्राज्यवाद पर पहुंच चुका था। दुनिया की सबसे बड़ी पूंजीवादी शक्तियों ने विश्व के सभी महाद्वीपों को अपने उपनिवेशों या अपने प्रभाव क्षेत्रों में बाँट लिया था। इसके आगे विस्तार केवल तभी संभव था जब वे एक दूसरे के इलाकों को युद्ध के ज़रिये हड़प लें। पूंजीवादी राज्यों के असमान आर्थिक और राजनीतिक विकास के नियम ने यह सुनिश्चित किया कि पूंजीवादी राज्यों के बीच दुनिया के पुनर्विभाजन के लिए युद्ध अनिवार्य रूप से होगा। पूंजीवाद अपने सर्वव्यापी संकट की अवधि में प्रवेश कर चुका था।

1914 से 1919 के दौरान, प्रथम विश्व युद्ध एक अंतर-साम्राज्यवादी युद्ध था। यह बाज़ारों, इलाकों, संसाधनों और प्रभाव क्षेत्रों के लिए साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच संघर्ष से उत्पन्न हुआ था। ब्रिटेन और फ्रांस जैसी पुरानी साम्राज्यवादी शक्तियों ने जर्मनी जैसी उभरती साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा अपने उपनिवेशों के विस्तार करने और नए उपनिवेशों पर कब्ज़ा जमाने की कोशिशों का प्रतिरोध किया।

युद्ध की तैयारी के लिए कई वर्षों तक प्रतिद्वंद्वी साम्राज्यवादी शक्तियों ने खुद को लगातार हथियारबंद किया और आपस में गठबंधन बनाये। इसका नतीजा यह हुआ कि जब यूरोप में युद्ध छिड़ गया तो विभिन्न राज्यों और बड़ी संख्या में विभिन्न महाद्वीपों पर उनके उपनिवेशों को भी युद्ध में खींच लिया गया। एक तरफ थे ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, इटली, जापान और अमरीका (जो केवल 1917 में शामिल हुआ था), तो दूसरी तरफ जर्मनी, ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य और ओटोमन (तुर्की) साम्राज्य थे।

प्रथम विश्व युद्ध के परिणाम

युद्ध में जर्मनी और उसके मित्र देश पराजित हुए। युद्ध में अभूतपूर्व तबाही हुई। इसमें लगभग 4 करोड़ सैनिक और नागरिक मारे गए और घायल हुए।

विजयी शक्तियों ने जर्मनी पर वर्साय की संधि के द्वारा दंडात्मक समझौता थोपा। इस समझौते के तहत जर्मनी को न केवल मुआवजे़ के रूप में भारी रकम चुकानी पड़ी, बल्कि उसको अपने कुछ क्षेत्रों और सभी उपनिवेशों से भी वंचित कर दिया गया।

वर्साय में ऐलान किये गए राष्ट्रों के आत्मनिर्धारण के नारे के तहत, ऑस्ट्रो-हंगेरियन और ओटोमन साम्राज्यों को तोड़ कर, छोटे-छोटे राज्यों का गठन किया गया। लेकिन आत्मनिर्धारण के इस सिद्धांत को एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका में पश्चिमी साम्राज्यवादी शक्तियों के उपनिवेशों पर लागू नहीं किया गया, जो दरअसल दुनिया के बहुतांश देश थे। हालांकि ब्रिटेन ने विश्व युद्ध में, हिन्दोस्तानी सैनिकों और हिन्दोस्तानी संसाधनों का भारी मात्रा में उपयोग किया था। इसके बावजूद ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के बाद हिन्दोस्तानी लोगों की स्व-शासन की मांग को मानने से इंकार कर दिया।

युद्ध में अपनी जीत के बावजूद ब्रिटेन और फ्रांस जैसी पुरानी साम्राज्यवादी शक्तियां कमजोर हो गयी थीं। अमरीकी साम्राज्यवाद, जिसे अन्य की तुलना में इस युद्ध से बहुत कम नुकसान हुआ था अधिक मजबूत ताक़त बन कर उभरा।

1917 में महान अक्तूबर समाजवादी क्रांति की जीत

प्रथम विश्व युद्ध के बीच विश्व में ऐतिहासिक महत्व की एक घटना घटी। 7 नवंबर, 1917 को रूस के मज़दूर वर्ग ने वी.आई. लेनिन की अगुवाई वाली बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में किसानों और अन्य मेहनतकश लोगों के साथ गठबंधन बनाकर शोषक वर्गों के राज को उखाड़ फेंका और दुनिया के पहले समाजवादी राज्य की स्थापना की। जबकि ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और अन्य प्रमुख पूंजीवादी देशों की सामाजिक-जनवादी और मज़दूर वर्ग की पार्टियों ने युद्ध के दौरान, अपने-अपने देश के पूंजीपति वर्ग का साथ दिया, वहीं बोल्शेविक पार्टी ने रूस के पूंजीपति वर्ग के खि़लाफ़ एक क्रांतिकारी गृहयुद्ध में, रूसी मज़दूर वर्ग का नेतृत्व किया। रूसी मज़दूर वर्ग ने शोषकों के प्रतिक्रियावादी मोर्चे को तोड़ने और इतिहास में सबसे पहली श्रमजीवी क्रांति को सफल बनाने के लिए उस संकट का इस्तेमाल किया।

सभी प्रकार के शोषण और उत्पीड़न से मुक्ति के लिए मानव जाति के संघर्ष ने एक नए दौर में प्रवेश किया।

श्रमजीवी वर्ग की हुक्मशाही वाले इस नए राज्य ने रूस को उस विश्व युद्ध से बाहर निकाला, जहां पूर्व ज़ारवादी हुक्मरानों ने देश को धकेल दिया था। इस नए राज्य ने सार्वजनिक रूप से अनेक गुप्त सौदों का पर्दाफाश किया जो ब्रिटेन, फ्रांस, अमरीका और अन्य शक्तियों ने दूसरे देशों के क्षेत्रों को युद्ध के अंत में आपस में बांटने के लिए बनाए थे। इस श्रमजीवी क्रांति ने ज़ारवादी साम्राज्य के भीतर सभी उत्पीड़ित राष्ट्रों और राष्ट्रीयताओं के बीच क्रांति का विस्तार किया और इस तरह से इन सभी राष्ट्रों और राष्ट्रीयताओं ने मिलकर सोवियत संघ का गठन किया। इस श्रमजीवी क्रांति ने दुनिया के सभी कम्युनिस्ट और मज़दूर पार्टियों के एक नए क्रांतिकारी संघ की स्थापना में सहयोग दिया, जिसे तीसरे इंटरनेशनल या कॉमिन्टर्न के नाम से जाना जाता है। इन सभी घटनाओं के चलते विश्व युद्ध जल्दी से समाप्त हो गया।

दो विश्व युद्धों के बीच पूंजीवाद के सार्वभौमिक संकट में तेज़ी से बढ़ोतरी और इटली में फासीवाद, जर्मनी में नाज़ीवाद और जापान में सैन्यवाद का उदय

प्रथम विश्व युद्ध व सोवियत संघ और कॉमिन्टर्न के उदय ने पूंजीवाद के सर्वव्यापी संकट को और भी गहरा कर दिया।

1929 के पूंजीवादी आर्थिक संकट और उसके परिणामस्वरूप हुई महामंदी ने पूंजीवादी देशों और उपनिवेशों में बसने वाले मज़दूर वर्ग और लोगों के कष्ट और असंतोष को बहुत बढ़ा दिया। दुनिया के सभी देशों में मज़दूर वर्ग और दबे-कुचले लोगों के संघर्षों में महान वृद्धि हुई।

साथ ही विभिन्न साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच अंतर्विरोध और भी तेज़ हो गये। साम्राज्यवादी एक बार फिर से एक और युद्ध की तैयारी में सैन्यीकरण करने और अन्य साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ गठबंधन बनाने और सौदेबाजी करने में जुट गए।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद जो समझौते हुए थे उनकी वजह से कुछ राज्यों में व्यापक असंतोष पैदा हो गया था।

प्रथम विश्व युद्ध में हारने की वजह से जर्मनी को सबसे कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था। जर्मनी के अपमान का बदला लेने और अपनी खोई हुई महानता को फिर से हासिल करने के नारे के तहत, सत्ता में आने के लिए एडोल्फ हिटलर की नेतृत्व वाली नाज़ी पार्टी ने जर्मनी के लोगों के दुखों और अपमान पर आक्रोश का इस्तेमाल किया। नाज़ी पार्टी ने तीव्र नस्लवादी, सैन्यवादी और कम्युनिस्ट विरोधी विचारधारा का बड़े पैमाने पर प्रचार किया। ब्रिटेन और अमरीका सहित कई देशों के बड़े पूंजीपतियों द्वारा दी गयी सहायता और समर्थन के बलबूते पर नाज़ियों ने जर्मनी में एक मजबूत सैन्य-औद्योगिक तंत्र का निर्माण किया।

इटली में भी, मुसोलिनी के नेतृत्व में इसी प्रकार की एक फासीवादी और शोंवीवादी ताक़त पहले ही सत्ता में आ चुकी थी। उसने इटली के लोगों में इन जज्बातों को फैलाया कि प्रथम विश्व युद्ध में जीत जाने के बावजूद, इटली को जो सम्मान और दर्ज़ा मिलना चाहिए था, वह उसे नहीं मिला। इसी तरह जापान, जो प्रथम विश्व युद्ध में विजयी शक्तियों का एक मित्र देश था, वहां भी लोगों के बीच सैन्य बलों के लिए समर्थन था क्योंकि लोगों को इस बात पर नाराज़गी थी कि प्रस्थापित पश्चिमी शक्तियां जापान को नए इलाके और उसके संसाधनों को हासिल करके मजबूत होने से रोक रही हैं।

इन घटनाओं ने तेज़ी से प्रथम विश्व युद्ध के बाद किये गए समझौतों की और विश्व युद्ध के बाद की बनायी “शांति” की धज्जियां उड़ा दीं। 1931 में जापानी सेना ने पूर्वी एशिया की मुख्य भूमि पर बसे मंचूरिया पर कब्ज़ा कर लिया और उत्तरी चीन में प्रवेश किया। 1935 में इटली ने उत्तरी अफ्रीका में एबिसिनिया पर हमला किया। 1936 में इटली और जर्मनी ने मिलकर स्पेन में चल रहे गृहयुद्ध में हस्तक्षेप किया, जिससे गणतांत्रिक (रिपब्लिकन) ताक़तों की हार हुई और फ्रेंको के फासीवादी शासन की स्थापना की गयी। उसी वर्ष इटली, जर्मनी और जापान ने एक गठबंधन बनाया जिसे एक्सिस (धुरी) के नाम से जाना जाता है। 1938 में जर्मनी ने यूरोप में विस्तार करने के लिए अपना पहला क़दम उठाया और पड़ोसी देश ऑस्ट्रिया पर कब्ज़ा कर लिया। इतना ही नहीं, जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया और पोलैंड में विस्तार करने के अपने इरादे साफ कर दिए। अप्रैल 1939 में इटली ने अल्बानिया पर आक्रमण किया और कुछ महीनों बाद इटली ने लीबिया पर आक्रमण करके कब्ज़ा कर लिया और उसको उत्तरी अफ्रीका में अपने द्वारा जीते गए इलाकों में जोड़ लिया। जर्मनी ने 1 सितंबर, 1939 को पोलैंड पर हमला किया। ब्रिटेन और फ्रांस ने, जिनका पोलैंड के साथ आपसी रक्षा समझौता पहले से ही था। उन्होंने जर्मनी के खि़लाफ़ युद्ध की घोषणा कर दी।

लेख के 6 भागों में से अगला भाग–तीन  पढ़ें : द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले प्रमुख साम्राज्यवादी शक्तियों तथा सोवियत संघ की रणनीति

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