खदान मज़दूरों की ऐतिहासिक भूमिका

हमारे देश के कोयला खदान मज़दूर निजीकरण के ख़िलाफ़ जबरदस्त संघर्ष चला रहे हैं। उन्होंने 18 अगस्त को देश-व्यापी हड़ताल का ऐलान किया है। इस संदर्भ में सभी देशों में खदान मज़दूरों द्वारा आधुनिक उद्योग के विकास और अंतराष्ट्रीय मज़दूर वर्ग आंदोलन के विकास में अदा की गयी भूमिका को याद करना बेहद जरूरी है।

19वीं और 20वीं शताब्दी में पूंजीवादी उद्योग का विकास कोयले पर आधारित था, जो उर्जा का प्रमुख स्रोत था। कोयले का खनन सबसे खतरनाक पेशे में से एक है। खदान मज़दूरों के बीच बीमारी और मौत बहुत आम है। जो लोग इससे बच जाते है वो बाकी की जिन्दगी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते रहते हैं। आम मज़दूरों की तुलना में इनकी जिन्दगी भी छोटी होती है।

भूमिगत खदानों में दम घुटने, जहरीली गैस, खदान की छत टूटने, पत्थरों के फटने और गैस के धमाके से मज़दूरों का मौत आम बात है। खुली खदानों की दीवार का गिरना और वाहनों का टकराना अक्सर होता रहता है। 20वीं सदी के दौरान, अमरीका में 1,00000 से अधिक खदान मज़दूरों ने अपनी जान गंवाई। हालांकि समय के साथ-साथ तकनीकी में विकास के चलते मज़दूरों की मौत की दर कम हुई है। आज भी अमरीका में हर साल खदान हादसों में करीब 30 मज़दूरों की मौत होती है। हिन्दोस्तान में हाल के वर्षों में खदान दुर्घटनाओं में 100 से 150 मज़दूरों की मौत होती है।

खदान मज़दूर औद्योगिक मज़दूरों के हिस्से से हैं, जो अपने काम और जीने की हालातों को बेहतर करने के सांझा संघर्ष में सबसे पहले एकजुट और संगठित हुए थे। 19वीं सदी के मध्य से खदान मज़दूर संगठित मज़दूर वर्ग आंदोलन के सबसे सक्रिय हिस्सा रहे हैं। खदान मज़दूरों ने, हमारे देश सहित, ब्रिटेन, अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान और यूरोप के कई देशों के कम्युनिस्ट आंदोलन को सक्रिय और लड़ाकू कार्यकर्ता दिए हैं।

ऑस्ट्रेलिया की द कंस्ट्रक्शन, फॉरेस्ट्री, माइनिंग एंड एनर्जी यूनियन (सी.एफ.एम.ई.यु.), यूनाइटेड माइन वर्कर्स ऑफ अमरीका, ब्रिटेन की नेशनल यूनियन ऑफ माइन वर्कर्स और जापान कोल माइनर्स यूनियन, कोयला खदान मज़दूरों की प्रमुख यूनियन रही हैं।

1912 में आयोजित राष्ट्रीय कोयला हड़ताल ब्रिटेन के कोयला खदान मज़दूरों की सबसे पहली देशव्यापी हड़ताल थी। 10,00,000 मज़दूरों द्वारा 37 दिनों की हड़ताल के बाद ब्रिटेन की सरकार को न्यूनतम मज़दूरी का कानून पारित करना पड़ा था। ब्रिटेन में 1926 की आम हड़ताल के दौरान, खदानों पर तालाबंदी करके कोयला मज़दूरों को बाहर रखा गया। यह हड़ताल ब्रिटेन में औद्योगिक विवाद का सबसे बड़ा मामला था। उसके बाद ब्रिटेन के कोयला मज़दूरों ने 1972 में सबसे बड़ी हड़ताल आयोजित की। इस हड़ताल से मज़दूरों के वेतन में बढ़ोतरी की मांग को स्वीकार करने के लिए खदान मालिक मजबूर हो गए। इसके अलावा, न्युमोकोनिओसिस नाम की बीमारी से ग्रसित खदान मज़दूरों को मुआवजा देने के लिए मज़दूरों ने सरकार को मजबूर कर दिया।

अमरीका में दशकों के संगठित और अडिग संघर्ष के चलते खदान मज़दूर खदान के अंदर सुरक्षा को बेहतर करने और वेतन में बढ़ोतरी और कई अन्य सुविधाएं हासिल करने में कामयाब रहे। 1902 में पेन्सिल्वेनिया के खदान मज़दूरों की पांच महीने लंबी हड़ताल, 1930 के दशक में केंटकी में मज़दूरों की बार-बार हड़ताल, 1946 में नौ महीने की देश-व्यापी हड़ताल और 1972 में केंटकी में 13 महीने की हड़ताल, यह सब अमरीकी कोयला मज़दूरों की कुछ प्रमुख हड़तालें रही हैं।

कनाडा में 1917 में स्थापित अमाल्गमेटेड माईन वर्कर्स ऑफ नोवा स्कॉशिटआ के खदान मज़दूरों ने मतदाताओं को लामबंद किया और टाउन कौंसिल का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया। खदान मज़दूरों ने कोयला कंपनियों द्वारा कंपनी की पुलिस और टैक्स के मूल्यांकन को चुनौती दी। अपने संघर्ष की वजह से वे आज अपनी यूनियन के लिए मान्यता, वेतन में बढ़ोतरी और 8-घंटे का कार्यदिवस यह सब हासिल करने में कामयाब रहे।

1889, 1905 और 1912 में जर्मनी के कोयला खदान मज़दूरों की हड़ताल, 1949 में ऑस्ट्रेलियाई कोयला खदान मज़दूरों की हड़ताल और 1962-63 में जापान के कोयला खदान मज़दूरों की हड़ताल, यह सारी ऐतिहासिक हड़ताले थी, जहां इन मज़दूरों को अपने देश के पूंजीवादी राज्यों द्वारा बर्बर दमन का सामना करना पड़ा था।

हिन्दोस्तान में कोयला मज़दूरों की पहली यूनियन इंडियन कोलियरी वर्कर्स एसोसिएशन का गठन 1920 में हुआ था। वर्ष 1921 में झारिया कोयला क्षेत्र में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (ए.आई.टी.यु.सी.) का दूसरा अधिवेशन आयोजित किया गया जिसमें 50,000 से अधिक कोयला मज़दूरों ने हिस्सा लिया था। उस समय कोयला मज़दूरों ने एक सफल हड़ताल का आयोजन कर जीत हासिल की थी। कोयला मज़दूरों ने सोवियत यूनियन के मज़दूरों के नाम संदेश भेजा, जो साम्राज्यवादी घेराबंदी के माहौल में अपने देश में एक समाजवादी समाज का निर्माण कर रहे थे।

1935 सितम्बर के महीने में सोवियत यूनियन में एक नौजवान कोयला मज़दूर स्ताख़ानोव ने दिन की एक ही शिफ्ट में 227 टन कोयला खदान से निकालकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया था। उनका यह कीर्तिमान उत्पादन का एक नमूना बन गया और उनके नाम से स्ताख़ानोववादी आंदोलन का जन्म हुआ, जहां उत्पादन के लक्ष्य को पार करने वाले मज़दूरों को सोवियत राज्य द्वारा सम्मानित किया जाने लगा। 1935 में स्ताख़ानोव को खदानों का निदेशक बनाया गया। उनके देश में फैसले लेने वाले सबसे ऊंचे निकाय सुप्रीम सोवियत पर चुनाव किया गया।

सारांश में, सभी देशों के कोयला मज़दूरों ने अपनी जान को जोखिम में डालकर अपने देश के औद्योगीकरण में अनमोल योगदान दिया है। उन्होंने मज़दूर वर्ग के अधिकारों और सम्मान की हिफाजत में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता है। उन्होंने दुनिया के स्तर पर समाजवाद और कम्युनिज़्म के आंदोलन में बहुमूल्य योदगान दिया है।

पिछले कुछ सप्ताहों से यूक्रेन, कोलंबिया, अमरीका और कुछ अन्य देशों के कोयला खदान मज़दूर अपने देश में खदानों को बंद किये जाने, उत्पादन में कटौती किए जाने और रोजगार ख़त्म किये जाने के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं। अपने संघर्षों से उन्होंने अपने देश की सरकारों को उनकी समस्याओं पर ध्यान देने के लिए मजबूर कर दिया है।

हमारे देश के कोयला मज़दूर सरकार द्वारा कोयला क्षेत्र को देशी और विदेशी निजी कंपनियों के लिए खनन और वितरण के लिए खोले जाने के ख़िलाफ़ जोरदार संघर्ष कर रहे हैं। यह मज़दूर देश के प्राकृतिक संसाधनों को इन निजी कंपनियों द्वारा लूटे जाने के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं, जिन कंपनियों के लिए मुनाफे ही सब कुछ है और जिनका मज़दूरों की सुरक्षा और पर्यावरण को बर्बादी से बचाने से कोई सारोकार नहीं है।

दुनिया के सबसे बड़े कोयला खदान मज़दूरों की जत्थे बतौर अपने अधिकारों की हिफाज़त में हिन्दोस्तान के मज़दूरों के संघर्ष का दुनियाभर के कोयला मज़दूरों पर असर होगा। उनके इस संघर्ष को हमारे देश के सभी मज़दूरों और सभी देशों के मज़दूरों के समर्थन की जरूरत है।

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