कोयला क्षेत्र के निजीकरण का असली उद्देश्य

जिस समय कोयला क्षेत्र कम मुनाफ़ेदार था उस समय उसमें राज्य की इजारेदारी स्थापित की गयी
आज जब यह बेहद मुनाफ़ेदार हो गया है तो इसका निजीकरण किया जा रहा है

आज हिन्दोस्तान में कोयला खनन बेहद मुनाफ़ेदार उद्योग बन गया है। ऐसा अनुमान लगाया गया है कि विभिन्न उद्योगों के लिए कोयले की मांग लगातार बढ़ती जा रही है।

मेटलर्जिकल कोयला (कोकिंग कोयला) स्टील प्लांट के लिए ज़रूरी होता है। नॉन-कोकिंग कोयला पॉवर प्लांट के अलावा एल्युमीनियम सीमेंट और फर्टिलाइज़र उद्योगों में इस्तेमाल किया जाता है।

इस समय कोयला-आधारित बिजली का अनुपात कुल बिजली उत्पादन का 72 प्रतिशत है। हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों का विकास करने की योजना के बावजूद आने वाले दो दशकों तक कोयला-आधारित थर्मल पॉवर प्लांट ऊर्जा के प्रमुख स्रोत बने रहेंगे।

वर्ष 2017 की तुलना में वर्ष 2040 तक हिन्दोस्तान में कोयले की खपत दो-गुना से अधिक बढ़ने का अनुमान है। यह इसके बावजूद कि ऊर्जा के प्रमुख स्रोत में कोयले का हिस्सा वर्ष 2017 में 56 प्रतिशत से गिरकर वर्ष 2040 में 48 प्रतिशत हो जायेगा।

कोयला-आधारित उद्योगों के मालिक इजारेदार पूंजीपतियों के बीच कोयला उत्पादन और वितरण पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए आपसी होड़ चल रही है, जिससे वह वर्टिकल इंटीग्रेशन के जरिये अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयले की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित कर सके और साथ ही कोयला उत्पादन पर अपने दबदबे के चलते अपने प्रतिस्पर्धियों को दबा सके।

कोल इंडिया लिमिटेड (सी.आई.एल.) एक मुनाफेदार सार्वजनिक नवरत्न कंपनी है और इस समय कोयला उत्पादन और बिक्री के क्षेत्र में उसकी इजारेदारी है। टाटा, अंबानी, बिरला और अन्य इजारेदार पूंजीपति इस बात पर एकमत हैं कि कोयला उत्पादन और वितरण का निजीकरण किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार इन इजारेदार पूंजीपतियों के हितों को आगे बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। सी.आई.एल. का विघटन इस योजना का केंद्र बिन्दु है।

बंगाल में रानीगंज कोयला खदान की स्थापना के साथ हिन्दोस्तान में कोयला खनन का काम एक पूंजीवादी उद्यम के रूप में शुरू हुआ। रेलवे के विकास से कोयला खनन को बड़ा प्रोत्साहन मिला। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद कोयले की मांग में बढ़ोतरी हुई और इस उद्योग में तेजी से विकास हुआ।

आज़ादी के पहले कुछ वर्षों में देश के पूर्वी और केंद्रीय हिस्सों में कोयले की सैकड़ों निजी खदाने थीं। इन खदानों में यांत्रिकीकरण बहुत निचले स्तर पर था। वर्ष 1951 तक 70 प्रतिशत से अधिक खदानों में बिजली का उपयोग नहीं किया जाता था। केवल 18 प्रतिशत अंडरग्राउंड खदानों में कोयले की कटाई के लिए मशीनों का उपयोग किया जाता था और 1 प्रतिशत से भी कम में कोयले की ढुलाई मशीनों द्वारा की जाती थी।

1951 से 1971 के बीच राज्य द्वारा पूंजीनिवेश की कारण यांत्रिकीकरण और उत्पादकता का स्तर बढ़ा। हिन्दोस्तानी राज्य ने विश्व बैंक से कर्ज़ लेकर कई बड़ी निजी खदानों में पूंजीनिवेश किया। द्वितीय विश्व युद्ध के समय 30 मीट्रिक टन से बढ़ते हुए 1971 में इन खदानों का उत्पादन 72 मीट्रिक टन हो गया।

1960 के दशक में कई कारणों की वजह से खदानों का मुनाफ़ा नीचे गिरा। कोयला-आधारित उद्योगों को फायदा पहुंचाने की सरकार की नीति के चलते कोयले की बिक्री क़ीमत को कम से कम रखा गया। रेलवे द्वारा कोयले की ढुलाई की क्षमता कम होने की वजह से कोयला खदानों के पास जमा हो गया। कोयले के बिक्री मूल्य पर मुनाफ़ा 8.4 प्रतिशत से गिरकर 5.5 प्रतिशत हो गया, जबकि इस पूरे दशक में सभी पूंजीपति उद्योगों के लिए मुनाफ़ा 10 प्रतिशत पर बना रहा। ऐसे हालातों में खदानों के मालिक कोयले की बढ़ती हुई मांग को पूरा करने के लिए कोयला खदानों में निवेश करने को तैयार नहीं थे।

उस समय बड़े इजारेदार घरानों के हित में कोयला खनन पर राज्य की इजारेदारी स्थापित की गयी। ऐसा इसलिए किया गया ताकि स्टील, उर्जा, एल्युमीनियम, फर्टिलाइजर और सीमेंट प्लांट जैसे कोयला-आधारित उद्योगों के लिए सस्ते दाम पर कोयले की आपूर्ति की गारंटी दी जा सके। इसमें सार्वजनिक और निजी दोनों ही तरह के उद्योग शामिल थे।

कोकिंग कोल माइंस (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम-1972 के ज़रिये 200 से अधिक कोयला खदानों को राजकीय स्वामित्व के तहत लाया गया। कोयला खान (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1973 के जरिये नॉन-कोकिंग कोयला खदानों को भी राजकीय स्वामित्व के तहत लाया गया।

राष्ट्रीकरण अधिनियम के तहत कोयला खदानों के नामों की सूची बनायी गयी और उन खदानों के भूतपूर्व निजी मालिकों को कितना मुआवज़ा दिया जायेगा इसका ज़िक्र किया गया। 1975 में कोल इंडिया लिमिटेड की स्थापना की गयी, जो कि केंद्र सरकार के संपूर्ण स्वामित्व की कंपनी है। इसके बाद के वर्षों में कोयले के उत्पादन में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई।

लेकिन 1972 के अधिनियम में तुरंत संशोधन किया गया और टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (टिस्को) एंड अन्य स्टील प्लांट को उनकी अपनी खदानों पर अपने स्वामित्व को बरकरार रखने की इजाज़त दी गयी, जिसका उपयोग वह खुद अपने लिए कोकिंग कोयला के उत्पादन के लिए करते थे।

1990 के दशक से इजारेदार पूंजीपतियों ने स्टील, उर्जा, एल्युमीनियम और अन्य कोयला-आधारित उद्योगों में बड़े पैमाने पर निवेश शुरू किया। नॉन-कोकिंग कोयले पर राजकीय स्वामित्व सुनिश्चित करने वाले 1973 के अधिनियम में 1992 में संशोधन किया गया और पूंजीपतियों को खुद अपने उपयोग के लिए नॉन-कोकिंग कोयला खदानों पर अपना स्वामित्व जमाने की इजाजत दी गयी। 1992 से 2010 के बीच और खास तौर से 2003 के बाद सरकार ने कोयले की खदानें कौड़ियों के दाम पर पूंजीपतियों के हाथों में दे दीं। लेकिन कोयले की खदानों के आवंटन को लेकर इजारेदार पूंजीपतियों के बीच अंतर्विरोधों के चलते एक बड़ा घोटाला सामने आया। 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इस आवंटन को रद्द कर दिया। इसके बाद नरेन्द्र मोदी सरकार ने 1972 और 1973 के अधिनियमों को ही रद्द कर दिया। अब हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपति किसी भी कोयले की खदान को खरीद सकते हैं और कोयले को बेच सकते हैं।

आज कोल इंडिया लिमिटेड देश की सबसे अधिक मुनाफेदार कंपनियों में से एक है। 31 मार्च 2020 तक उसकी कुल संपत्ति का शुद्ध मूल्य 16,800 करोड़ रुपये था। 11,300 करोड़ रुपये के टैक्स-पश्चात मुनाफे के साथ कंपनी ने अपनी कुल संपत्ति के मूल्य पर 67 प्रतिशत दर से मुनाफा कमाया है।

सरकार द्वारा हिन्दोस्तानी और विदेशी खरीदारों को कोयला खदानों की नीलामी करना, सी.आई.एल. के मुनाफ़ों को हड़पने के लिए इजारेदार पूंजीपतियों की लालच को दिखाता है।

हिन्दोस्तान के कोयला मज़दूर जो कोल इंडिया के निजीकरण की तरफ बढ़ते कदमों का जमकर विरोध कर रहे हैं, उन्होंने पिछले सदी में कई बहादुर संघर्ष किये हैं। हमारे देश के कोयला संसाधनों को सामाजिक नियंत्रण में लाना मज़दूर वर्ग और संपूर्ण समाज के हित में है, जिससे उनको वैज्ञानिक आधार पर विकसित किया जा सके और समाज के हित में उपयोग किया जा सके।

इजारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में देश के पूंजीपति वर्ग ने दिखा दिया है कि उसको समाज या पर्यावरण की कोई चिंता नहीं है। उनका केवल एक ही मकसद है, अधिकतम मुनाफे की अपनी लालच को पूरा करना।

कोयला मज़दूरों का निजीकरण के ख़िलाफ़ संघर्ष, संपूर्ण समाज के हित में एक संघर्ष है। उनके संघर्ष को पूरे मज़दूर वर्ग के समर्थन की जरूरत है।

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