बैंकिंग का संकेंद्रण और बढ़ती परजीविता

देश के सार्वजनिक बैंकों के विलयन और निजीकरण के जरिये बैंकिंग पूंजी का तेजी से संकेंद्रण होता जा रहा है। इसका मकसद है देश में कुछ चंद मुट्ठीभर बड़े इजारेदार बैंक तैयार करना, जो अधिकतम मुनाफों के लिए एक-दूसरे से होड़ करेंगे और समझौते करेंगे। बैंक के मज़दूरों और आम तौर पर समाज पर इसका बहुत बुरा परिणाम होने वाला है। इसका एक नतीजा यह होगा कि परजीविता का स्तर बहुत बढ़ जायेगा।

बैंकों की आय के दो प्रमुख हिस्से होते हैं, पहला ब्याज से होने वाली शुद्ध आय और दूसरा गैर-ब्याज से प्राप्त आय।

ब्याज की शुद्ध आय कर्ज़दारों से प्राप्त ब्याज और बैंक में जमा धन राशि पर दिए गए ब्याज के बीच का अंतर होता है। हमारे देश में आज अधिकांश बैंक जमा धन राशि पर 3-3.5 प्रतिशत दर पर ब्याज देते हैं। 1-3 वर्ष की सावधि जमा धन राशि पर 5.5 प्रतिशत दर पर ब्याज देते हैं। लेकिन कर्ज पर दी जाने वाली राशि पर ब्याज दर बहुत अधिक होती है। बैंक एक वर्ष के लिए कार्यशील पूंजी कर्ज 12-16 प्रतिशत ब्याज दर पर देते हैं। चार वर्ष के निवेश कर्ज 15-18 प्रतिशत ब्याज पर देते हैं। उपभोक्ता उधार (कंजुमर क्रेडिट) पर बैंक 11-15 प्रतिशत दर पर ब्याज वसूलती है। केंद्र और राज्य सरकारों को दिए जाने वाले कर्जो पर 6-7 प्रतिशत का ब्याज वसूलती है।

जब कोई बैंक किसी उत्पादक पूंजीवादी उद्यम के लिए कर्जा देता है तो इससे ब्याज के रूप में मिलने वाली आय उत्पादक गतिविधि द्वारा जोड़े गए नए मूल्य का हिस्सा होती है। यह नया मूल्य उस कंपनी द्वारा काम पर रखे गए मज़दूर द्वारा पैदा किया जाता है। मज़दूर जो नया मूल्य पैदा करता है, उसका एक हिस्सा उसे वेतन के रूप में वापस मिलता है जबकि उसका बाकी हिस्सा बेशी मूल्य होता है, जो पूंजीपति मालिक के हिस्से में आता है। इसी बेशी मूल्य का एक हिस्सा उस बैंक के पास जाता है, जिसने कर्जा दिया है। शेष हिस्सा पूंजीपति मालिक की जेब में मुनाफे के रूप में जाता है, जिसने उत्पादक मज़दूर को काम पर रखा है।

जब कोई बैंक किसी वेतनभोगी को दुपहिया, टी.वी. या वाशिंग मशीन खरीदने के लिए कर्जा देता है, तो इस पर लगने वाली ब्याज की वसूली पूंजीपति द्वारा कमाए गए बेशी मूल्य से नहीं आती है। यह उस वेतनभोगी मज़दूर की कड़ी मेहनत की लूट से आती है, जिसने वह वस्तुएं उधार लेकर खरीदी है। उस व्यक्ति के वेतन का एक हिस्सा बैंक के पास हर महीने समान मासिक किश्त (ई.एम.आई.) के रूप में जाता है।

जब बैंक सरकार को कर्जा देती है, तो बैंकों की जो ब्याज से आय होती है, वह लोगों से वसूले गए टैक्स से इकठ्ठा धन से अदा की जाती है। साल-दर-साल सरकार के राजस्व का बड़ा हिस्सा व्यवसायिक बैंकों के खजाने में जमा होता रहता है। यह सभी लोगों की सामूहिक लूट का एक नमूना है।

बैंकों की गैर-ब्याज आय में वह शुल्क शामिल है जो क्रेडिट कार्ड रखने, भुगतान में देरी, ऑनलाइन भुगतान, ए.टी.एम. लेन-देन, न्यूनतम बैलेंस न रखने, मियादी जमा खाते से समय से पहले पैसा निकाले जाने, इत्यादि पर लगाया जाता है। बैंकों को गैर-ब्याज आय में म्यूच्यूअल फण्ड के लेन-देन पर कमीशन से मिलने वाली आय और स्टॉक बाजार, मुद्रा और कमोडिटी बाजार से मिलने वाले मुनाफे भी शामिल हैं।

जैस-जैसे बैंक बड़े होते हुए इजारेदार बनते जा रहे हैं, वैसे-वैसे उनके मुनाफों में गैर-ब्याज से प्राप्त होने वाली आय का हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है। पिछले 10 वर्षों में व्यापारिक बैंकों ने अपनी कुल आय का 30-40 प्रतिशत हिस्सा गैर-ब्याज आय के रूप में कमाया है।

बैंकों द्वारा लिया जाने वाला सेवा-शुल्क बहुत कम नज़र आता है। जब लेन-देन की संख्या बहुत बढ़ जाती है, तो यही शुल्क बैंकों के मुनाफों के प्रमुख स्रोत बन जाते हैं। डिजिटल लेन-देन के प्रसार के चलते देश के सबसे बड़े बैंकों की गैर-ब्याज आय में भारी बढ़ोतरी हुई है।

सबसे बड़े बैंक स्टॉक बाजार, बांड बाजार, और मुद्रा और कमोडिटी वायदा बाजारों में सट्टेबाजी के रास्ते भारी मात्रा में मुनाफे कमा रहे हैं। ये बैंक अक्सर उत्पादक गतिविधियों के लिए दिए गए कर्ज की तुलना में, सट्टेबाजी और जुए के रास्ते से ज्यादा मुनाफा बनाते हैं। उदाहरण के लिए देश की सबसे बड़े निजी बैंक, एच.डी.एफ.सी. बैंक के मुनाफों में अप्रैल-जून 2020 की तिमाही के दौरान 20 प्रतिशत का उछाल आया। जबकि देशभर में आर्थिक गतिविधियां और बैंकों से लिए जाने वाले कर्जों की गति बेहद धीमी हो गयी थी। एच.डी.एफ.सी. बैंक ने बांड बाजार में सट्टेबाजी से 2500 करोड़ रुपये के मुनाफे बनाये हैं।

लोगों की जमा पूंजी को इकठ्ठा करके इजारेदार पूंजीपति घरानों की सेवा में लगाने में बैंक अहम् भूमिका अदा करते हैं। बैंक न सिर्फ लोगों के बचत खातों के जमा धन को कर्ज में देते हैं, बल्कि उन्हें म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश करने के लिए भी लालच देते हैं। इन म्यूच्यूअल फण्डों के जरिये बड़ी पूंजीवादी कंपनियों के समूहों के शेयर्स में निवेश किया जाता है। जब कोई व्यक्ति बैंक के ललचाने पर म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश करता है तो उस बैंक को इसका कमीशन मिलता है। पिछले 10 वर्षों में म्यूच्यूअल फण्ड के व्यापार में चार गुना बढ़ोतरी हुई है और यह जून 2010 में 6 लाख 30 हजार करोड़ रुपये से बढ़कर जून 2020 में 25 लाख करोड़ रुपयों का हो गया है।

2008 के अंतराष्ट्रीय बैंकिंग संकट से हिन्दोस्तान के बैंकों को कोई खास नुकसान नहीं हुआ क्योंकि उस समय सार्वजनिक बैंक अपनी पूंजी को सट्टेबाजी के लिए सीमित पैमाने पर ही उपयोग करते थे। लेकिन अब “प्रतिस्पर्धी” बनने के नाम पर तमाम पाबंदियां हटा दी गयी हैं, जिसका मतलब है किसी भी तरीके से अधिकतम मुनाफे बनाने की होड़ में बैंकों को झोंक देना।

कुल मिलाकर देखा जाये तो विलयन और निजीकरण के रास्ते चंद मुट्ठीभर महाकाय बैंकों का निर्माण करने के लक्ष्य से सरकार द्वारा उठाए गए नीतिगत कदमों की वजह से अर्थव्यवस्था पर इन साहूकार संस्थाओं का दबदबा बहुत बढ़ जाएगा। यह इजारेदार बैंक मानव श्रम द्वारा निर्मित नए मूल्य को बढ़ते पैमाने पर निगलते रहेंगे, जिस तरह कोई परजीवी एक स्वस्थ शरीर से पूरा खून चूस लेता है।

अमरीका में बैंकों की परजीवी भूमिका

संयुक्त राज्य अमरीका उच्चतम स्तर की परजीविता का जीता-जागता उदहारण है जो कि कुछ मुट्ठीभर मुनाफे के भूखे इजारेदार बैंकों के हाथों में मुद्रा पूंजी के संकेन्द्रण का नतीजा है।

2019 में अमरीका के सबसे बड़े बैंक जे.पी. मॉर्गन चेस की गैर-ब्याज आय का प्रमाण उसकी 63 अरब डॉलर (4,75,000 करोड़ रुपये के बराबर) की कुल आय के आधे से अधिक था। अमरीका के दूसरे सबसे बड़े बैंक, वेल्स फार्गो बैंक में यह अनुपात 45 प्रतिशत था। इसके अलावा, इन बैंकों की शुद्ध ब्याज आय का बहुत बढ़ा हिस्सा उपभोक्ता कर्ज, छात्रों के कर्ज और मज़दूर वर्ग के वेतन पर अलग-अलग तरीकों से डाका डालने के रास्ते आता है, और यह लगातार बढ़ता ही जा रहा है।

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