कोयला का निजीकरण और खदान मजदूरों का विरोध संघर्ष

कोल इंडिया लिमिटेड (सी.आई.एल.) और सिंगरेनी कोलियरीज कंपनी लिमिटेड (एस.सी.सी.एल.) के पांच लाख से अधिक मजदूर 18 अगस्त को एक दिन की हड़ताल करेंगे। यूनियनों ने 1 अगस्त को हड़ताल की नोटिस दे दी है। उस दिन से, मज़दूर तरह-तरह के विरोध कार्यक्रम कर रहे हैं, जैसे कि वर्क-टू-रूल, रैली, गेट मीटिंग, पिट मीटिंग, आदि, जिनमें आखिरी कदम होगा 18 अगस्त की हड़ताल। बी.एम.एस., एच.एम.एस., एटक, सीटू और इंटक से सम्बंधित, कोयला मजदूरों के पांच ट्रेड यूनियनों की संयुक्त सभा में इसकी घोषणा की गयी।

18 जून को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घोषणा की थी कि 41 कोयले की खदानें नीलामी के द्वारा, निजी पूंजीपतियों को व्यवसायिक खनन के लिए बेची जायेंगी। नीलामी की प्रक्रिया 18 अगस्त को शुरु होने जा रही है।

निजी औद्योगिक कंपनियों को अब तक सिर्फ अपने-अपने उद्योगों की जरूरतों के लिए, अपने-अपने कोयले की खदानों का संचालन करने की इजाजत दी जाती थी। कोयला खनन क्षेत्र को निजी व्यवसायिक खनन के लिए खोल देने का मतलब यह है कि अब निजी कम्पनियां कोयले का खनन करके उसे किसी को भी बेच सकेंगी।

41 कोयले की खदानों की नीलामी से पहले, कोयला खनन से संबंधित कानूनों में कई प्रमुख तब्दीलियाँ की गयी हैं। रिपीलिंग एंड अमेंडिंग (सेकंड) एक्ट 2017 के जरिये, 8 जनवरी, 2018 को कोकिंग कोल माइंस (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम 1972 और कोल माइंस (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम 1973 को रद्द किया गया। 20 फरवरी, 2018 को कैबिनेट कमिटी ऑन इकनोमिक अफेयर्स (सी.सी.ई.ए.) ने निजी कंपनियों को हिन्दोस्तान के व्यवसायिक कोयला खनन उद्योग में प्रवेश करने की इजाजत दी। 28 अगस्त, 2019 को केन्द्रीय मंत्री मंडल ने कोयला खनन में सौ प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी पूंजीनिवेश (एफ.डी.आई.) के लिए अनुमति दे दी।

इन सभी कदमों का विरोध करने के लिए कोयला मजदूरों ने 2-4 जुलाई, 2020 को तीन दिवसीय हड़ताल की। कोयला मजदूरों के सभी यूनियनों ने उस हड़ताल को सफल बनाने में सक्रियता से योगदान दिया। परन्तु सरकार मजदूरों के विरोध को नजरंदाज करते हुए, कोयला खदानों की नीलामी करने जा रही है। अब कोयला मजदूरों ने फैसला किया है कि अपने विरोध को और मजबूत करने के लिए, 18 अगस्त को फिर से हड़ताल करेंगे।

कोयला मजदूरों ने पांच मांगें उठाई हैं।

पहली मांग यह है कि कोयले के व्यावसायिक खनन को शुरू करने के फैसले को फौरन वापस लिया जाये।

निजी पूंजीवादी कंपनियों द्वारा अति-शोषण के खिलाफ कोयला मजदूरों के अनवरत संघर्ष की वजह से, 38 वर्ष पहले कोयले की खदानों पर राज्य की मालिकी और नियंत्रण स्थापित किया गया था। उस समय से कोयला मजदूरों ने अपना संघर्ष जारी रखा है और न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा तथा इंसान लायक सही काम की हालतों समेत अपने अनेक अधिकारों के लिए कानूनी मान्यता हासिल की है। अगर कोयले के खनन को फिर से निजी कंपनियों के लिए खोल दिया जाता है तो मजदूर बड़ी कठिनाई से हासिल किये गए इन अधिकारों को खो सकते हैं।

पूंजीवादी कम्पनियाँ ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए खदानों का संचालन करेंगी। खर्च कम करने के लिए वे भूमिगत खनन के बजाय, सतही (ओपन कास्ट) खनन करेंगी, जैसे कि पहले करती थीं। वे सी.आई.एल. के दामों से कम दाम पर कोयला बेचकर उसे नुकसान पहुंचाएंगी। उसके बाद, सी.आई.एल. को “अक्षम”, क्षति-ग्रस्त और “बीमार” कंपनी बताया जायेगा। उसे क्रम-क्रम से खत्म कर दिया जायेगा और निजी कंपनियों के हाथों बेच दिया जायेगा। कोल इंडिया के लाखों-लाखों मजदूरों में यह जायज डर है।

ओपन कास्ट खनन देश के लम्बे समय के हित के लिए सही नहीं है क्योंकि सतही कोयले को निकाल लेने के बाद, भूमिगत कोयले को निकालना बहुत मुश्किल होता है। इससे इस कीमती और समय के साथ समाप्त होने वाले ऊर्जा स्रोत, कोयले का बहुत बड़े पैमाने पर विनाश होता है।

दूसरी प्रमुख मांग यह है कि निजीकरण, यानि सी.आई.एल. के शेयर्स की बिक्री को फौरन रोका जाये। 

निजीकरण का मतलब है सार्वजनिक संसाधनों को पूंजीवादी कंपनियों को, उनके निजी मुनाफों के लिए, बेच देना। जब कोयले की खदानों को हिन्दोस्तानी या विदेशी पूंजीपतियों को बेचा जाता है, तो यह निजीकरण का एक रूप है। जब कोल इंडिया के शेयर्स को बाजार में बेचा जाता है, तो यह निजीकरण का दूसरा रूप है। दोनों ही कोयला उद्योग में निजीकरण की प्रक्रिया के हिस्से हैं।

8 जून को प्रधान मंत्री ने बड़े घमंड के साथ ऐलान किया था कि उनकी सरकार “कोयला क्षेत्र को कई दशकों लम्बे लॉक डाउन से मुक्त करा रही है”। उनका मतलब यह था कि अब हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों को अधिक से अधिक मुनाफों की अपनी लालच को पूरा करने के लिए, हिन्दोस्तान के कोयला संसाधनों का दोहन करने और कोयला मजदूरों का अति-शोषण करने की पूरी छूट दी जायेगी।

भूतपूर्व मनमोहन सिंह सरकार ने अक्तूबर 2010 में कोयला के निजीकरण का पहला कदम लिया था, जब सी.आई.एल. के शेयर्स का पब्लिक ओफरिंग किया गया था। उस समय से अब तक, कोल इंडिया में सरकार का शेयर 100 प्रतिशत से घटकर 66 प्रतिशत हो गया है।

सी.आई.एल. हिन्दोस्तान के स्टॉक एक्सचेंज पर सबसे कीमती कंपनियों में से एक है। 2019 में उसका बाजारी मूल्य 2.16 लाख करोड़ रुपये था। कोल इंडिया के मजदूर यह सवाल उठा रहे हैं कि इस अत्यंत मुनाफेदार और कीमती सार्वजनिक संपत्ति को क्यों टुकड़े-टुकड़े में बांटकर मुनाफों के लालची पूंजीपतियों को बेचा जाना चाहिए।

कोयला मजदूरों की तीसरी मांग यह है कि सेंट्रल माइंस प्लानिंग एंड डिजाईन इंस्टिट्यूट लिमिटेड (सी.एम.पी.डी.आई.एल.) को सी.आई.एल. से अलग करने की योजना को फौरन वापस लिया जाये।

सी.एम.पी.डी.आई.एल. को 1975 में कोल इंडिया लिमिटेड के एक सहायक संसथान के रूप में स्थापित किया गया था, जिसका उद्देश्य था परियोजनाओं की अवधारणा से लेकर कमीशन होने तक, सब-तरफा सलाहकारी सेवाएं प्रदान करना। सी.एम.पी.डी.आई.एल. को सी.आई.एल. से अलग करने का यह मतलब होगा कि सी.आई.एल. के पास, देश में कोयला खनन का और अधिक विकास सुनिश्चित करने के लिए अपना संस्थान नहीं होगा। इसके बजाय, निजी पूंजीवादी कम्पनियाँ अपने हितों के लिए सी.एम.पी.डी.आई.एल. की वैज्ञानिक-प्रौद्योगिक सेवाओं का फायदा उठाएंगी। यह सी.आई.एल. को खत्म करने के सरकार के इरादे को साफ-साफ दर्शाता है।

कोयला मजदूरों की चौथी मांग यह है कि सी.आई.एल. और एस.सी.सी.एल. के प्रबंधक ठेका मजदूरी से सम्बंधित, लिए गए फैसलों को लागू करें।

सी.आई.एल. के लगभग 2 लाख से अधिक मजदूर अस्थायी ठेके पर काम कर रहे हैं। उन्हें नियमित मजदूरों से बहुत कम वेतन दिया जाता है। उन्हें ज्यादा लम्बे समय तक काम करना पड़ता है और ज्यादा खतरनाक काम उठाना पड़ता है। उनके लिए कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं होती। मजदूर यूनियनों के लम्बे संघर्ष के बाद, सी.आई.एल. के प्रबंधकों ने 18 फरवरी, 2013 को ठेका मजदूरों को न्यूनतम वेतन देने और उनकी सामाजिक सुरक्षा की योजना को लागू करने का आदेश जारी किया था। लेकिन यह आदेश अभी भी लागू नहीं हुआ है। कोयला मजदूर यह मांग कर रहे हैं कि 2013 के आदेश को फौरन लागू किया जाये।

कोयला मजदूरों की पांचवी मांग यह कि दुर्घटनाओं में मारे गए या घायल हुए मजदूरों के आश्रितों को कोयला कंपनियों में काम दिया जाये।

इसके लिए मजदूरों ने बहुत संघर्ष किया है। अक्तूबर 2017 को मजदूर यूनियनों और सी.आई.एल. व एस.सी.सी.एल. के प्रबंधकों के बीच में एक समझौता हुआ था, 10वां कोयला वेतन समझौता, जिसमें इस मांग को माना गया था। मजदूर उस समझौते को लागू करने की मांग कर रहे हैं।

इन पांच मांगों के अलावा, कोयला मजदूर यह भी मांग कर रहे हैं कि जुलाई की हड़ताल में भाग लेने के लिए मजदूरों पर हमला करने वाले अफसरों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाये।

कोयला मजदूर हमारे देश के मजदूर वर्ग के सबसे संगठित हिस्सों में से एक हैं। शोषण के खिलाफ और अपने अधिकारों की हिफाजत में संघर्ष का उनका लम्बा इतिहास है। कोयला खनन के निजीकरण के खिलाफ उनका संघर्ष जायज है। यह कई पीढ़ियों के मजदूरों की मेहनत से पैदा की गयी सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करने का संघर्ष है। यह इस कीमती ऊर्जा स्रोत को इजारेदार पूंजीपतियों की लालच से बचाने का संघर्ष है। देश के सम्पूर्ण मजदूर वर्ग और सभी लोगों को इस संघर्ष का समर्थन करना चाहिए।

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