संयुक्त राष्ट्र संघ की 75वीं वर्षगांठ :

भाग-3: संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के बाद से प्रमुख घटनाक्रम

सोवियत संघ और समाजवादी खेमे की यह आशंका कि अमरीका और अन्य साम्राज्यवादी शक्तियां संयुक्त राष्ट्र संघ को अपने हित में इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगी, यह बहुत पहले ही सही साबित हो गया। साम्राज्यवादी शक्तियों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन की स्थायी सीट पर कब्ज़ा करने के लिए, 1949 में चीन की विजयी क्रांति के बाद पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार को अनुमति देने से इंकार कर दिया और ताइवान में भागे हुए पराजित गुओमिंदंग सरकार के दावे का समर्थन किया। इसके विरोध में सोवियत संघ ने सुरक्षा परिषद की कार्यवाही का बहिष्कार किया। इस दौरान सोवियत संघ की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर अमरीका ने इंग्लैंड और फ्रांस की सहायता से कोरियाई युद्ध में दखलंदाजी करने के लिये संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव पारित करवा लिया। इसके अनुसार, संयुक्त राष्ट्र सशस्त्र बल का उपयोग उत्तर कोरिया के खिलाफ किया गया और दक्षिण कोरिया में, अमरीका समर्थित सिंगमैन र्ही के शासन को समर्थन दिया गया।

1960 के दशक में, सोवियत संघ एक समाजवादी देश से एक सामाजिक साम्राज्यवादी देश में बदलना शुरू हुआ। सोवियत संघ के शासकों ने अपने राज्य को हथियारबंद किया और दुनिया पर अपना वर्चस्व जमाने के लिए अमरीका के साथ टकराव और संघर्ष शुरू कर दिया। इससे संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्य पर बहुत असर पड़ा। इसके बाद, सुरक्षा परिषद और संयुक्त राष्ट्र संघ की अन्य एजेंसियां इन दोनों महाशक्तियों के बीच टकराव का एक अखाड़ा बन गईं। हालांकि दो महाशक्तियों के बीच दुनिया पर कब्ज़ा करने की इस होड़ का अंजाम एक और विश्व युद्ध में नहीं हुआ। लेकिन जहां भी इन दो शक्तियों के हित शामिल थे, उन राज्यों की स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा करने के लिए और दुनिया में शांति बनाये रखने के लिए कार्रवाई करने में संयुक्त राष्ट्र संघ बिलकुल शक्तिहीन साबित हुआ। इसमें फिलिस्तीनी और अन्य अरब लोगों के ख़िलाफ़ अमरीका समर्थित इस्राइल द्वारा बार-बार किए गए हमले, वियतनाम पर अमरीकी हमला, क्यूबा के ख़िलाफ़ अमरीकी धमकियां व हमले और इसी तरह के अन्य कई उदाहरण हमारे सामने हैं। दोनों महाशक्तियों द्वारा परमाणु भंडार का निर्माण भी इन उदाहरणों में शामिल था।

संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों की संख्या में विस्तार यह एक अन्य प्रमुख हकीक़त रही है। सिर्फ 51 राज्यों से शुरू करते हुए, संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता अब 193 हो गयी है। गौर करने की बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता में विस्तार, उसकी संरचना और निर्णय लेने की प्रक्रिया में यह बड़ा बदलाव कहीं नहीं झलकता है। युद्ध और शांति से संबंधित सभी फैसले तथा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सशस्त्र बलों की तैनाती के फैसलों के लिये अभी भी पांच स्थायी सदस्यों (अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन और रूस) की सहमति की आवश्यकता है जिनको यह विशेषाधिकार, 75 साल पहले दूसरे विश्व युद्ध में उनके प्रमुख विजेता होने के आधार पर मिला था। संयुक्त राष्ट्र संघ में बड़े वित्तीय योगदान के साथ दुनिया के अमीर देशों का संयुक्त राष्ट्र संघ पर दबदबा अन्य राज्यों की तुलना में कहीं ज्यादा है।

1991 में सोवियत संघ का पतन और अमरीका का एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरने के बाद, अमरीकी साम्राज्यवाद द्वारा दुनियाभर में अपने वर्चस्व का विस्तार करने की कोशिश और भी तेज़ हो गई। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने या तो एकतरफा या अपने सहयोगियों के साथ मिलकर विभिन्न देशों हमले किये हैं तथा मौत और तबाही मचाई है। अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, यमन, सीरिया और अन्य देशों में उन्होंने जो तबाही मचाई है उसकी मिसाल पूरी दुनिया में नहीं दी जा सकती। ईरान, क्यूबा, वेनेजुएला, उत्तर कोरिया जैसे देश, जो अमरीकी साम्राज्यवादियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं और उनके हुक्म का विरोध करते हैं, उन सभी देशों पर अमरीका लगातार अमानवीय प्रतिबंध थोपता आया है। संयुक्त राष्ट्र संघ अमरीकी साम्राज्यवादियों से इन देशों का बचाव करने में नाकाम रहा है। एक ओर अमरीका, संयुक्त राष्ट्र संघ की परमाणु ऊर्जा आयोग जैसी एजेंसियों का उपयोग, ईराक और ईरान जैसे राज्यों के मामलों में दखल देने के लिए करता है, वहीं दूसरी तरफ वह खुद अपने और अन्य प्रमुख साम्राज्यवादी शक्तियों के हाथों में विशाल परमाणु भंडार के बारे में आँख मूंद लेता है। ऐसे कई उदहारण है, जब अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र संघ में कुछ देशों के ख़िलाफ़ हमला करने के इरादे से और अन्य राज्यों के मामलों में हस्तक्षेप को मंजूरी देने वाले प्रस्तावों को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ को धमकी देने और उस पर दबाव डालने में हिचकिचाता नहीं है। पिछले 70 वर्षों में किसी अन्य शक्ति की तुलना में अमरीका ने सुरक्षा परिषद में सबसे अधिक प्रस्तावों को वीटो कर किया है।

इन सबके बावजूद संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकांश देशों ने अलग-अलग समय पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में एकजुट होकर विभिन्न देशों की हिफाज़त में फैसले पारित करने में सफलता हासिल की है, जैसे कि क्यूबा के ख़िलाफ़ अमरीकी प्रतिबंधों का विरोध, फिलिस्तीनी और पड़ोसी राज्यों, आदि के ख़िलाफ़ अमरीका समर्थित इस्राइली जाउनवादी हमलों की निंदा, आदि। हाल ही में, अगस्त के महीने में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक अमरीकी प्रस्ताव को पारित किया गया, जिसमें ईरान को हथियार न बेचने के प्रस्ताव की अवधि को बढ़ाने की कोशिश की गई है। इसके साथ की दुनिया के कई देशों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र का उपयोग बड़ी ताक़तों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करने और स्वयं अपने व अन्य देशों के ख़िलाफ़ हमलों का पर्दाफाश करने के लिए किया गया है।

भाग-4 के लिए क्लिक करें : संयुक्त राष्ट्र के लिए आगे का रास्ता क्या है?

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