संयुक्त राष्ट्र संघ की 75वीं वर्षगांठ :

भाग-4 : संयुक्त राष्ट्र के लिए आगे का रास्ता क्या है?

इस समय, संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों के बीच सुधार के लिए एक व्यापक और बढ़ती मांग नज़र आ रही है। इन सभी सदस्य देशों को यह गवारा नहीं है कि दुनिया में युद्ध और शांति से संबंधित सवालों पर संयुक्त राष्ट्र में सिर्फ पांच देशों के हाथों में वीटो की प्रथा को जारी रखा गया है। यह सब विशेष रूप से इसलिए नहीं किया जा सकता है, क्योंकि अमरीकी साम्राज्यवाद सहित यह वे ही शक्तियां हैं, जो दुनियाभर में अधिकांश टकराव और बढ़ते तनावों के लिए ज़िम्मेदार हैं। अपने स्वयं के स्वार्थ को बरकरार रखने के लिए, ये शक्तियां संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो शक्ति के साथ स्थायी सदस्यों की संख्या में किसी भी बदलाव का पूरी तरह से विरोध करती हैं या केवल अपने सहयोगियों या समर्थकों में से कुछ देशों को शामिल करने के लिए राज़ी हैं।

उनके वित्तीय योगदान के आधार पर कुछ सदस्य राष्ट्रों द्वारा चलायी जा रही दादागिरी संयुक्त राष्ट्र संघ के मूलभूत सिद्धांत का घोर उल्लंघन है, जिसके अनुसार राज्य चाहे बड़ा हो या छोटा सभी सदस्य राज्यों पर समानता का सिद्धांत लागू होता है। अमरीकी साम्राज्यवाद विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र संघ पर अपनी वित्तीय जकड़ का उपयोग, उसको “सज़ा” देने के लिए करता है – जब कभी संयुक्त राष्ट्र संघ किसी मुद्दे पर अमरीकी लाइन का समर्थन नहीं करता है या जब कभी संयुक्त राष्ट्र संघ के विभिन्न निकायों में अमरीका की आलोचना की जाती है।

वक्त का तकाज़ा है, कि संयुक्त राष्ट्र संघ का पूरी तरह से लोकतांत्रिकरण हो। हिन्दोस्तान, जर्मनी, जापान आदि जैसे कुछ राज्य, वीटो शक्ति के साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या में केवल थोड़ा विस्तार चाहते हैं ताकि वे बड़ी शक्तियों के क्लब में शामिल हो सकें। इससे संयुक्त राष्ट्र की समस्याओं का हल नहीं होगा या विश्व शांति सुनिश्चित नहीं की जा सकेगी।

संयुक्त राष्ट्र के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक क़दम के रूप में सुरक्षा परिषद को सभी सदस्य राज्यों से मिलकर बनी महासभा के अधीन और उसके प्रति जवाबदेह बनाना होगा। सुरक्षा परिषद के सभी सदस्यों का चुनाव होना चाहिए और वीटो-पावर वाले कुछ स्थायी सदस्य नहीं होने चाहिए। सुरक्षा परिषद में लिए गए फैसलों की पुष्टि, संयुक्त राष्ट्र की महासभा में की जानी चाहिए।

साथ ही, यह भी याद रखा जाना चाहिए कि आज दुनिया में युद्ध और हमलों का असली स्रोत, मुट्ठीभर साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा दुनिया पर वर्चस्व बनाये रखने का प्रयास और उनकी अधिकतम मुनाफे बनाने की  होड़ है। संयुक्त राष्ट्र जैसे एक वैश्विक निकाय का केवल अस्तित्व, अपने आप में स्थायी शांति सुनिश्चित नहीं कर सकता है। साम्राज्यवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ और सभी प्रकार के आक्रमण के ख़िलाफ़ दुनिया के लोगों द्वारा जारी लगातार और एकजुट संघर्ष ही मानवता को युद्ध की तबाही से बचा सकते हैं। केवल एक संपूर्ण लोकतांत्रिक संयुक्त राष्ट्र संघ, जो अधिकांश सदस्य देशों की आवाज़ का प्रतिनिधित्व करता हो, साम्राज्यवादी शक्तियों की बेलगाम महत्वाकांक्षाओं का पर्दाफाश करने और उनपर रोक लगाने का काम कर सकता है।

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