संयुक्त राष्ट्र संघ की 75 वीं वर्षगांठ :

भाग-2 : संयुक्त राष्ट्र संघ क्यों और कैसे बनाया गया?

विश्व शांति को बनाए रखने के लिए समर्पित एक विश्व निकाय के विचार का जन्म प्रथम विश्व युद्ध से शुरू हुआ था। लीग ऑफ नेशन का गठन 1920 में 42 संस्थापक सदस्यों के साथ किया गया था। अपने 26 साल के लंबे इतिहास में लीग ऑफ नेशन ने किसी भी समय 50 से अधिक राज्यों को शामिल नहीं किया। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संगठन उस समय में हुए हमलों के ख़िलाफ़ कोई सार्थक कार्रवाई करने या उनको रोकने में पूरी तरह से विफल रहा। इसकी स्थापना के बीस साल से भी कम समय में ही, दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत, लीग ऑफ नेशन की विफलता और पतन को दर्शाता है, हालांकि औपचारिक रूप से इसकी समाप्ति 1946 में हुई थी।

द्वितीय विश्व युद्ध के अंत से पहले भी, मित्र राष्ट्र (एलाइस) जो नाज़ीवाद और फासीवाद के ख़िलाफ़ संयुक्त रूप से लड़ रहे थे, उन्होंने कई बार एक साथ चर्चा भी की कि युद्ध समाप्त होने के बाद स्थायी शांति कैसे सुनिश्चित की जाए और इस तरह के एक और भयानक विश्व युद्ध की संभावना से मानवता को कैसे बचाया जाए। इस पर चर्चा के लिए अमरीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन और चीन सहित प्रमुख मित्र राष्ट्रों के नेताओं के बीच कई बैठकें हुईं।

परिणामस्वरूप, द्वितीय विश्व युद्ध के पूरी तरह समाप्त होने से पहले ही संयुक्त राष्ट्र संघ के संस्थापना सम्मेलन में 50 देशों के प्रतिनिधि अमरीका के शहर सैन-फ्रांसिस्को में इकट्ठा हुए। कई सप्ताह के विचार-विमर्श के बाद, 25 जून, 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर को सर्वसम्मति से पारित किया गया। अधिकांश राज्यों की संसदों द्वारा चार्टर की पुष्टि होने के बाद, संयुक्त राष्ट्र संघ 24 अक्तूबर, 1945 को 51 सदस्यों के साथ औपचारिक रूप से अस्तित्व में आया।

संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर ने ऐलान किया कि उसका मक़सद है “आने वाली पीढ़ी को युद्ध की त्रासदी से बचाना – जिस तरह के युद्ध ने हमारे अपने जीवन काल में दो बार मानव जाति के लिए अनगिनत दुखों और तबाही बरसाई”। इस चार्टर ने दुनियाभर के लोगों के बीच शांति, समानता और न्याय के लिए गहरी भावनाओं को एक ठोस रूप दिया। इस दौरान एक सबसे महत्वपूर्ण विचार उभर कर सामने आया कि सभी राज्यों, चाहे वे बड़े हों या छोटे सभी की स्वतंत्रता, संप्रभुता और समानता का सम्मान करते हुए ही स्थायी शांति का निर्माण किया जा सकता है।

प्रथम विश्व युद्ध के अंत की स्थिति के विपरीत, जहां शांति वार्ता केवल मुट्ठीभर साम्राज्यवादी शक्तियों के नेतृत्व में की गयी थी, संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के लिए होने वाली चर्चाओं में, समाजवादी सोवियत संघ भी शामिल था। इसमें चीन भी शामिल था, जो उस समय गुओमिंदंग (राष्ट्रवादी) पार्टी के शासन में था। लेकिन जिन परिस्थितियों में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई थी, वह तनाव और संभावित टकरावों से भरी हुई थी।

इस परिस्थिति का प्रथम पहलू यह था कि अमरीका और ब्रिटेन के नेतृत्व में साम्राज्यवादी शक्तियों ने समाजवादी सोवियत संघ के ख़िलाफ़ एक नया “शीत युद्ध” शुरू कर दिया था, हालांकि वे औपचारिक रूप से उनके सहयोगी थे। युद्ध के बाद के हालातों में इन साम्राज्यवादी शक्तियों की मुख्य चिंता थी सोवियत संघ को अकेला करना और उसकी घेराबंदी करना। जबकि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अपनी भूमिका के बल पर सोवियत संघ की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और प्रभाव में भारी बढ़ोतरी हुई थी। समाजवाद और साम्यवाद (कम्युनिज़्म) को बदनाम करने और उसे “स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिए खतरा” साबित करने के लिए उन्होंने सोवियत संघ के ख़िलाफ़ झूठ और दुष्प्रचार का एक अभियान चलाया।

दूसरा पहलू यह था कि साम्राज्यवादी ताक़तों ने युद्ध के दौरान पूर्व उपनिवेशों और गुलाम देशों के राष्ट्रीय मुक्ति और स्वतंत्रता के मजबूत होते संघर्षों को नाकाम करने या दबाने के लिए, तरह-तरह की साज़िशों को अंजाम देने की कोशिश की। जिन देशों ने नाज़ीवाद और फासीवाद से आज़ादी हासिल की थी, उन देशों में साम्राज्यवाद-विरोधी, फासीवाद-विरोधी सरकारों की स्थापना को नाकाम करने के लिए साम्राज्यवादी ताक़तें पूरी तरह से डटी हुई थीं।

तीसरा गौर करने वाला मुद्दा यह है कि युद्ध में भयानक तबाही के बावजूद, अमरीकी साम्राज्यवाद ने न केवल जनसंहार के नए और घातक हथियार विकसित किए थे, बल्कि उनका इस्तेमाल भी किया था। उन्होंने इन बमों से दो जापानी शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर अगस्त 1945 में दो परमाणु बम गिराकर उनको पूरी तरह से तबाह कर दिया था। यह सब उस समय किया गया था जब दुनियाभर के देश संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर की पुष्टि कर रहे थे।

दुनियाभर के लोगों को उम्मीद थी कि संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व शांति और प्रगति के लिए काम करेगा। लेकिन वास्तव में शुरू से ही संयुक्त राष्ट्र दो खेमों के बीच संघर्ष का एक अखाड़ा था। इस संघर्ष में एक तरफ  साम्राज्यवादी शक्तियों का खेमा था, जो लोगों और राज्यों पर नए हमलावर युद्ध शुरू करना चाहता था और दूसरी तरफ सोवियत संघ के नेतृत्व में वह ताक़तें थीं जो शांति, लोकतंत्र और लोगों की मुक्ति के लिए खड़ी थीं।

जे.वी. स्टालिन के नेतृत्व में सोवियत संघ पूरी तरह से वाकिफ था कि साम्राज्यवादी शक्तियां, जो उस समय के अधिकांश सदस्य राज्यों को नियंत्रित करती हैं, संयुक्त राष्ट्र संघ का इस्तेमाल पूरी दुनिया पर अपने वर्चस्व को बरकरार रखने और उन सभी ताक़तों को दबाने के लिए करेगी जो समाजवाद, लोकतंत्र और राष्ट्रीय मुक्ति के हक़ में संघर्ष कर रहे थे। इसी कारण से सोवियत संघ ने इस प्रावधान का समर्थन किया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी निर्णय – जो युद्ध और शांति से संबंधित मामलों पर लिए जाते हैं, उन्हें सभी पांच स्थायी सदस्यों (अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, सोवियत संघ और चीन) द्वारा एकमत से लिया जाना चाहिए। इस तरह से इन पांच राज्यों को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लिए गए किसी भी निर्णय को वीटो करने के अधिकार की शुरुआत हुई।

भाग-3 के लिए क्लिक करें : संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के बाद से प्रमुख घटनाक्रम

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