दवा उद्योग में मज़दूरों का अति-शोषण

वैश्विक बाज़ार में 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ हिन्दोस्तान को अक्सर ‘दुनिया की फार्मेसी’ कहा जाता है, क्योंकि वह जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है।

           चित्र-1 : हिन्दोस्तान के दस सबसे बड़े दवाई निर्माता

जेनेरिक दवा का मतलब है एक ऐसी दवा जिसमें वही रासायनिक पदार्थ होते हैं जो मूल रूप से रासायनिक पेटेंट द्वारा संरक्षित थे। मूल दवाओं के पेटेंट समाप्त होने के बाद जेनेरिक दवाओं को बिक्री के लिए अनुमति दी जाती है। ब्रिटेन में बेची जाने वाली सभी जेनेरिक दवाओं में से एक-चैथाई दवाइयों की आपूर्ति हिन्दोस्तानी फार्मा कंपनियों द्वारा की जाती है। अमरीका में इस्तेमाल होने वाली सभी जेनेरिक दवाओं में से 40 प्रतिशत हिस्सा हिन्दोस्तान से आता है। जानलेवा बीमारी एड्स के इलाज के लिए दुनियाभर में इस्तेमाल की जाने वाली 80 प्रतिशत दवाओं की आपूर्ति भारतीय फार्मा कंपनियों द्वारा की जाती है। चार हिन्दोस्तानी फार्मा कंपनियां, सन फार्मास्यूटिकल्स, ल्यूपिन, सिप्ला और डॉ रेड्डी लैब की गिनती दुनिया के दस सबसे बड़े जेनेरिक दवा उत्पादकों में की जाती है ।

हिन्दोस्तान की फार्मा कंपनियां, विभिन्न टीकों (वैक्सीन) की वैश्विक मांग का 50 प्रतिशत से अधिक की आपूर्ति करती हैं। दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन उत्पादक, पूनावाला का सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एस.आई.आई.) है, जो महाराष्ट्र के पुणे शहर में स्थित है। पूनावाला की गिनती देश के दस सबसे अमीर पूंजीपतियों में होती है। बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सहयोग से सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, दुनिया में कोविड वैक्सीन का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बनने की कोशिश कर रहा है।

फोब्र्स की 2020 की सबसे अमीर हिन्दोस्तानियों की सूची में सबसे अमीर 50 हिन्दोस्तानियों में 13 और सबसे अमीर 100 हिन्दोस्तानियों में 19 फार्मा कंपनियों के मालिक हैं। पिछले एक वर्ष में अधिकांश फार्मा कंपनियों ने अपनी संपत्ति में काफी बढ़ोतरी की है।

देशभर में 10,500 से अधिक उत्पादन कारखानों के साथ 3,000 से अधिक छोटी और बड़ी फार्मा कंपनियां हैं। हालांकि, केवल शीर्ष 10 कंपनियां देश में दवाओं की कुल बिक्री का लगभग एक-तिहाई हिस्सा बेचती हैं। (चित्र 1 देखें)। दिलीप शांघवी के स्वामित्व वाली सबसे बड़ी हिन्दोस्तानी फार्मा कंपनी सन फार्मा की सालाना बिक्री 33,000 करोड़ रुपये है, जो 100 से अधिक देशों में दवाइयों की आपूर्ति करती है, जिसके पास दवाई बनाने के 43 प्लांट हैं, जिनमें से 17 प्लांट देश के बाहर हैं और पूरी दुनिया में सन फार्मा की कंपनियों में लगभग 36,000 मज़दूर काम करते हैं।

हिन्दोस्तानी फार्मा उद्योग के शीर्ष पर बड़ी कंपनियों की प्रधानता होने के बावजूद, इसमें सूक्ष्म, लघु और मध्यम स्तर के उद्यमों (एम.एस.एम.ई.) का भी एक बड़ा योगदान है, जिनकी संख्या 20,000 इकाइयों से भी अधिक है। उनमें से बड़ी संख्या में एम.एस.एम.ई. कम्पनियां, बड़ी फार्मा कंपनियों के लिए कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग और जॉब वर्क करती हैं। बड़ी फार्मा कंपनियां, छोटी इकाइयों द्वारा मज़दूरों को बहुत कम मज़दूरी पर काम कराने का लाभ उठाती हैं और इसलिए अपने उत्पादन को उनसे करवाती हैं। हालांकि एम.एस.एम.ई. इकाइयों का उत्पादन मात्रा के आधार पर कुल उत्पादन का 70 प्रतिशत है लेकिन उनके उत्पादन का मूल्य, कुल उत्पादन मूल्य का केवल 50 प्रतिशत है।

फार्मा उद्योग से जुड़े मज़दूरों की संख्या, पिछले दशक में 4 लाख से बढ़कर 8 लाख से अधिक हो गई है। लेकिन उद्योग का तेज़ी से विकास और इसमें अत्यधिक मुनाफ़े से मज़दूरों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। पैकिंग और डिस्पैच के लिए आवश्यक मज़दूरों की बड़ी संख्या, पीस-रेट पर रखे गये ठेका मज़दूर हैं जिन्हें न्यूनतम मज़दूरी भी नसीब नहीं होती है। फार्मा उद्योग को “एक उद्योग” के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया गया है, इसलिए “न्यूनतम मज़दूरी” देने का कानून, उनके लिए लागू करना अनिवार्य नहीं है।

हाल की तालाबंदी के दौरान अपने मज़दूरों के प्रति पूंजीपतियों के घिनौने रवैये का पर्दाफाश हुआ है। अपने भारी मुनाफ़े को जारी रखने के बावजूद, इन कंपनियों के मालिकों ने लॉकडाउन के कारण अपने काॅन्ट्रेक्ट और पीस-रेट के मज़दूरों द्वारा सामना की जाने वाली कठिनाइयों का समाधान करने के लिए कुछ भी नहीं किया। इसलिए फार्म उद्योग से जुड़े अधिकांश मज़दूर अपने गांवों में लौटने के लिए मजबूर थे।

फार्मा कंपनियां अपने उत्पादों की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए लगभग 3-3.5 लाख मेडिकल प्रतिनिधियों को नियुक्त करती हैं। कुछ कंपनियों में तो इनकी संख्या कुल स्थायी कर्मचारियों की संख्या के 70-80 प्रतिशत के बराबर है। उन्हें कम वेतन दिया जाता है उनका कोई परिभाषित कार्य समय नहीं है और नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं है। यदि मासिक बिक्री के लक्ष्य पूरे नहीं होते हैं तो उन्हें एक दिन के नोटिस पर नौकरी छोड़ने के लिए कह दिया जाता है।

फार्मा उद्योग, पुरानी बीमारियों का स्थायी रूप से इलाज करने में विश्वास नहीं करता है और इस उद्देश्य के लिए ज़रूरी अनुसंधान में भी निवेश नहीं करता है। उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी बीमारियों को नियंत्रण में रखने के लिए ज़िन्दगी भर दवाएं लेनी पड़ती हैं। यह दवाओं के लिए एक बहुत बड़ा बाज़ार सुनिश्चित करता है।

1970 तक भारतीय फार्मा बाज़ार में विदेशी कंपनियों का वर्चस्व क़ायम था। वर्ष 1911 के पेटेंट अधिनियम को 1970 में बदला गया उत्पाद पेटेंट के बजाय प्रोसेस पेटेंट (दवा के बनाने की प्रक्रिया) की अनुमति दी जाने लगी और पेटेंट की अवधि भी कम कर दी गयी। उत्पाद पेटेंट के तहत, उस उत्पाद को पेटेंट धारक को छोड़कर किसी अन्य के द्वारा उत्पादित नहीं किया जा सकता है, जबकि (प्रोसेस) प्रक्रिया पेटेंट, उत्पाद को एक अलग विधि द्वारा उसी उत्पाद को उत्पादित करने की अनुमति देता है।

हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों ने उनकी मांग पर पेटेंट कानून में लाए गए इस बदलाव का पूरा फ़ायदा उठाया। उन्होंने देश में विदेशी कंपनियों द्वारा बेची जाने वाली दवाओं के उत्पादन के वैकल्पिक तरीकों को ढूंढ निकाला और इस तरह से विदेशी कंपनियों की इजारेदारी ख़त्म कर दी। 2010 तक हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों ने देश के फार्मा बाज़ार के 70 प्रतिशत हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया था और उस समय से आज तक उनका अपना दबदबा क़ायम है। आज भी देश के शीर्ष दस दवा उत्पादकों और विक्रेताओं की सूची में कोई विदेशी इजारेदार कम्पनी नहीं है।

1980 के दशक से ही हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों ने जेनेरिक दवाओं का निर्यात शुरू कर दिया था। विदेशी बाज़ारों में दवा की ऊंची क़ीमतों के कारण निर्यात बाज़ार बहुत अधिक लाभदायक था। 2000 के अंत तक प्रमुख हिन्दोस्तानी फार्मा कंपनियों की 50 प्रतिशत से अधिक आय अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों से हुई। हिन्दोस्तानी फार्मा कंपनियां लगभग 1,45,000 करोड़ रुपये की राशि की दवाएं निर्यात करती हैं। दस सबसे बड़ी हिन्दोस्तानी फार्मा कंपनियों के लिए घरेलू बिक्री का हिस्सा उनकी कुल बिक्री का केवल एक तिहाई है। कुछ हिन्दोस्तानी फार्मा कंपनियों की विदेशी बिक्री उनके कुल बिक्री का 80 प्रतिशत है।

जब विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) ने हिन्दोस्तान और अन्य देशों को बौद्धिक संपदा अधिकार (ट्रिप्स) के व्यापार-संबंधित पहलुओं पर समझौते के प्रावधानों का पालन करने के लिए मजबूर किया तो उत्पाद पेटेंट की अनुमति देने के लिए 2005 में देश के पेटेंट कानून को फिर से बदला गया। हिन्दोस्तानी फार्मा कंपनियों को अब नयी दवाओं के मूल पेटेंट की समाप्ति तक, समतुल्य जेनेरिक दवा के विकास और उत्पादन के लिए इंतजार करना होगा। हालांकि, वर्षों से विकसित की गई उत्पादन तकनीक और उत्पादन पैमाने ने हिन्दोस्तानी फार्मा पूंजीपतियों को वैश्विक स्तर पर जेनेरिक दवाओं के बाज़ार पर हावी रहने के क़ाबिल बनाया है।

हिन्दोस्तानी फार्मा उद्योग ने कम वेतन वाले मज़दूरों के शोषण और केंद्र सरकार के सक्रिय समर्थन के दम पर खुद को दुनिया की फार्मेसी बना लिया है। दुनियाभर में दवाओं की आपूर्ति करने के लिए देश में भारी दवा उत्पादन क्षमता होने के बावजूद, अभी भी देश के सभी लोगों को सस्ती दवाएं नहीं मिलती हैं।

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