“मज़दूरों और किसानों के लिए आगे बढ़ने का रास्ता” विषय पर एक वेब मीटिंग

मज़दूर एकता कमेटी (एम.ई.सी.) ने 4 अक्तूबर, 2020 को “मज़दूरों और किसानों के लिए आगे बढ़ने का रास्ता” विषय पर एक वेब मीटिंग आयोजित की। मुख्य प्रस्तुति बिरजू नायक ने पेश की।

यह चर्चा बेहद सामयिक और आवश्यक थी क्योंकि सरकार ने हाल ही में विभिन्न मज़दूर-विरोधी और किसान-विरोधी विधेयकों को संसद में पारित किया है। ये कानून, मज़दूरों और किसानों की आजीविका पर एक बर्बर हमला हैं। लाखों मज़दूरों और किसानों ने बड़ी बहादुरी के साथ, बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों का आयोजन करते हुए मज़दूर-किसान विरोधी, समाज-विरोधी और जन-विरोधी इन विधेयकों के ख़िलाफ़, अपना गुस्सा जाहिर किया है। इस मीटिंग ने अपने संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए मज़दूर-किसान एकता को मजबूत करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।

ट्रेड यूनियनों के नेताओं के साथ-साथ, कई मज़दूर और किसान संगठनों के नेता इस वेब मीटिंग में शामिल हुए। हिन्दोस्तान के कई राज्यों में सक्रिय कार्यकर्ताओं ने भी इस सभा में हिस्सा लिया। सभी प्रतिभागियों ने इस महत्वपूर्ण चर्चा का आयोजन करने के लिए मज़दूर एकता कमेटी की सराहना की। उन्होंने मुख्य प्रस्तुति की सराहना करते हुए मज़दूर-किसान का राज क़ायम करने के कार्यक्रम की दिशा में मज़दूर-किसान एकता को मजबूत करने के आह्वान का समर्थन किया।

कई प्रतिभागियों ने चर्चा में हस्तक्षेप किया और अपने विचार प्रस्तुत किए। इनमें, लोक राज संगठन के हनुमान प्रसाद शर्मा, अखिल भारतीय किसान सभा और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के हन्नान मोल्ला, जमात-ए-इस्लामी हिंद से सलीम इंजीनियर, अखिल भारतीय कामगार परिषद से शिवाजी राय, लोक पक्ष से कृष्णकांत, हरियाणा से बृज पाल, बिहार से संतोष कुमार और कानपुर से रवींद्र द्विवेदी शामिल थे।

सभी वक्ताओं ने कहा कि सरकार मज़दूरों और किसानों को गुमराह करने के लिए तमाम तरह के झूठ फैला रही है। सरकार के मंत्री और प्रवक्ता दावा कर रहे हैं कि किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) पर बिक्री जारी रख सकते हैं, जबकि वास्तव में इन विधेयकों का उद्देश्य ही एम.एस.पी. को ख़त्म करना है। कई प्रतिभागियों ने एक छोटा किसान होने के नाते अपने स्वयं के अनुभवों और उनसे सीखों को चर्चा के दौरान पेश किया। उन्होंने नए कृषि विधेयकों में एम.एस.पी. का कहीं भी जिक्र न होने की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा “किसान सवाल पूछ रहे हैं – यदि सरकार उनके हितों की रक्षा करने में इतनी दिलचस्पी रखती है, तो वह जायज़ क़ीमतों पर उनकी उपज की खरीद की गारंटी क्यों नहीं देती है?” उन्होंने मांग की कि सरकार मंडियों को परिवहन सुविधा प्रदान करते हुए किसानों की उपज को खरीदे, न कि खरीद के लिए समय अवधि को सीमित करके उनकी ज़िन्दगी को और भी मुश्किल बना दे।

प्रतिभागियों ने बिहार जैसे राज्यों का उदाहरण दिया, जहां एम.एस.पी. को समाप्त कर दिया गया है। बड़े व्यापारी इन राज्यों में किसानों की उपज को कौड़ियों के मोल खरीदते हैं, जो एम.एस.पी. की तुलना में बहुत कम दर पर होती हैं और फिर उसी अनाज को पंजाब और हरियाणा में ले जाकर एम.एस.पी. पर बेचकर बहुत मुनाफ़ा कमाते हैं!

प्रतिभागियों ने कॉन्ट्रैक्ट कृषि के विस्तार के कानून की भी निंदा की। उन्होंने बताया कि शुरू में किसानों को बेहतर क़ीमत मिल सकती है, लेकिन बहुत जल्द ही जब बड़े कॉर्पोरेट्स कृषि व्यापार पर अपना दबदबा क़ायम कर लेंगे वे क़ीमतों को कम कर देंगे। इजारेदार कंपनियों के इस हमले के सामने, किसान पूरी तरह से तबाह हो जाएंगे।

कई प्रतिभागियों ने यह सवाल भी उठाया कि अगर ये कानून वास्तव में किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए थे, तो सरकार को बिना किसी बहस के संसद में इन विधेयकों को जबरदस्ती पारित करने की इतनी जल्दी और इतनी ज़रूरत क्यों थी?  यह साफ है कि सरकार को डर था कि किसान इन बिलों का विरोध करेंगे। यह केवल यही साबित करता है कि इन विधेयकों का उद्देश्य, किसानों को बड़े पैमाने पर तबाह करना, और बड़े इजारेदार कॉर्पोरेट घरानों को कृषि क्षेत्र में अपना कब्ज़ा करने के लिए रास्ता साफ करना है।

मज़दूर-विरोधी विधेयकों की कड़ी निंदा करते हुए, प्रतिभागियों ने कहा कि औद्योगिक संबंधों से संबंधित हाल ही में पारित श्रम संहिता से मज़दूरों का शोषण और ग़रीबी और भी बढ़ेगी। इसका केवल एक ही मक़सद है, मज़दूरों के अधिकारों पर बर्बर हमला करना और उनको अपनी यूनियन बनाने और हड़ताल पर जाने के अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित करना। सरकार से कोई अनुमति लिए बिना औद्योगिक इकाई को बंद करने के लिए, उस कारखाने में काम करने वाले मज़दूरों की सीमा को 100 से 300 तक बढ़ाकर, पूँजीपतियों को अपनी मनमानी करने की खुली छूट दी जा रही है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश में कारखानों में काम करने वाले लगभग आधे मज़दूरों को पूंजीपतियों द्वारा मनमाने ढंग से नौकरी से निकाले जाने और कारखाने को बंद होने से रोका नहीं जा सकेगा।

इन सभी कानूनों से यह साफ है कि हिन्दोस्तान पर पूंजीपतियों का राज है। मज़दूर और किसान समाज की सम्पत्ति के असली निर्माता हैं लेकिन इस व्यवस्था में उनका ही अत्यधिक शोषण होता है। किसान कर्ज़ में जन्म लेते हैं और आजीवन कर्ज़ में ही डूबे रह जाते हैं। बड़े पूंजीवादी उद्यमों ने लॉकडाउन का उपयोग और अधिक मुनाफ़ा कमाने के लिए किया है जबकि मज़दूरों और किसानों को केवल ज़िन्दा रहना मुश्किल हो गया है। मज़दूरों-किसानों और अन्य मेहनतकशों के अधिकारों पर हमला करने के लिए एक अच्छे मौके बतौर शासक वर्ग ने कोरोनावायरस के संकट का इस्तेमाल किया है और इस मौके का फ़ायदा उठाकर, इस समय सभी विरोध प्रदर्शनों पर भी कड़े प्रतिबंध लगाये हैं।

वेब मीटिंग में प्रतिभागियों ने इन हमलों के विरोध में बढ़ती मज़दूर-किसान एकता के सकारात्मक संकेतों की सराहना की। मज़दूरों और किसानों ने हाथ मिलाकर ऐसे कई विरोध प्रदर्शनों को आयोजित किया है। एक प्रतिभागी ने कहा कि किसानों के बेटे, ग्रामीण युवा, शहरों में काम करने के लिए मजबूर हैं और वे मज़दूरों और किसानों के बीच एक पुल बनकर, मज़दूर-किसान एकता के लिए काम कर रहे हैं।

यह अर्थव्यवस्था की पूंजीवादी दिशा है न कि केवल मोदी सरकार जो इन मज़दूर-विरोधी और किसान-विरोधी हमलों को दिन पर दिन तेज़ कर रही है। कई प्रतिभागियों ने उदाहरण देकर बताया कि वर्तमान सरकार, बिल्कुल पिछली सरकारों की तरह ही पूंजीपतियों के लिए काम कर रही है। मनमोहन सरकार के दौरान स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट जारी की गई थी लेकिन संप्रग ने इसे लागू नहीं किया। साफ है कि सरकारों को बदलने से हमारी समस्याओं को समाधान नहीं होगा। हमें इस पूंजीवादी व्यवस्था को बदलने और मज़दूरों और किसानों के राज को स्थापित करने के संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा।

सभा के अंत में संतोष कुमार ने सभी प्रतिभागियों का आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि मज़दूर एकता कमेटी, मज़दूरों और किसानों की एकता के लिए काम करने के लिए प्रतिबद्ध है। मेहनतकशों की फ़ौलादी लड़ाकू एकता ही मज़दूरों और किसानों का राज क़ायम कर सकती है, जो सभी मेहनतकशों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

मुख्य प्रस्तुति को पढ़ने के लिए क्लिक करें: “मज़दूरों और किसानों के लिए आगे बढ़ने का रास्ता”

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