मज़दूरों और किसानों के लिए आगे का रास्ता

4 अक्तूबर, 2020 को मज़दूर एकता कमेटी द्वारा आयोजित वेब मीटिंग में मज़दूरों और किसानों के लिए आगे का रास्ताविषय पर कामरेड बिरजू नायक द्वारा पेश की गई प्रस्तुति

देशभर में मज़दूर और किसान संसद में हाल में पारित किये गए कानूनों का विरोध कर रहे हैं। 23 सितम्बर को तीन लेबर कोड और कृषि व्यापार व भण्डारण से सम्बंधित तीन विधेयकों के विरोध में, मज़दूर यूनियनों और किसान संगठनों के बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए।  25 सितम्बर को 250 किसान संगठनों ने ‘भारत बंद’ आयोजित किया।

ये लेबर कोड रोज़गार की सुरक्षा, कार्यस्थल पर सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा, यूनियन बनाने का अधिकार, हड़ताल करने का अधिकार – इन सारे मामलों में पूंजीपति मालिकों द्वारा मज़दूरों के अधिकारों के हनन को पूरी तरह कानूनी ठहराते हैं।

कृषि विधेयक कृषि व्यापार पर देशी-विदेशी बड़ी-बड़ी पूंजीवादी कंपनियों के वर्चस्व को बढ़ाने का रास्ता खोलते हैं। उनका मक़सद है सरकारी खरीदी को और घटा देना तथा सरकारी मंडियों की भूमिका को और कमजोर कर देना। करोड़ों-करोड़ों किसान पूंजीवादी कंपनियों के गुलाम बन जायेंगे, जैसे अंग्रेजों के शासन काल में ईस्ट इंडिया कंपनी के गुलाम हुआ करते थे।

कुल मिलाकर, मज़दूर और किसान देश के हर इलाके में आबादी के 90 प्रतिशत से ज्यादा हैं। आज आबादी की यह बहुसंख्या संसद में लिए गए फैसलों का विरोध कर रही है। पर सरकार उनकी आवाज़ को नहीं सुन रही है। इससे यह साफ हो जाता है कि वर्तमान संसदीय व्यवस्था सिर्फ नाम के वास्ते ही लोकतंत्र है।

लोकतंत्र का मतलब होता है लोगों का तंत्र, यानी लोगों का राज। लेकिन अपने देश में तो मौजूद है पूंजीपतियों का राज, जिसमें टाटा, अंबानी, बिरला और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घराने सबसे आगे हैं। हिन्दोस्तान की सरकार इन चंद अति-धनवानों के हित में काम करती है। मौजूदा व्यवस्था पूंजीपतियों की हुक्मशाही है।

1947 के बाद से, जो भी पार्टी सरकार में रही है, उसने मज़दूरों और किसानों से झूठे वायदे किये हैं। उन्होंने दावा किया है कि समाजवाद बना रहे हैं। उन्होंने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया है। परन्तु इस दौरान कॉर्पोरेट घरानों की दौलत ही तेज़ी से बढ़ती रही है, जबकि मज़दूर और किसान ग़रीबी व अति-शोषण के शिकार बने रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी आज वादा कर रहे हैं, ‘सब का विकास’ का, किसानों की आमदनी दुगुनी कर देने का। वे ‘श्रमेव जयते!’ का नारा देते हैं। पर सच तो यह है कि मज़दूरों और किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा का कोई नामोनिशान नहीं है। लॉक डाउन के दौरान जिस तरह करोड़ों-करोड़ों मज़दूर अपने गांवों की तरफ पलायन करने को मजबूर हुए थे, उससे साफ दिखता है कि उनकी हालतें कितनी असुरक्षित हैं। हजारों-हजारों किसान आज भी खुदकुशी करने को मजबूर हो जाते हैं।

हरेक सरकार उन्हीं नीतियों को लागू करती है जो पूंजीवादी अरबपतियों के हित में हैं। ‘इज ऑफ डूइंग बिजनस’ के नाम पर, वे पूंजीपतियों के लिए, मज़दूरों को मनमाने तरीके से, जब मर्जी, काम से निकाल देना और आसान बनाना चाहते हैं। पूंजीपतियों को ज्यादा से ज्यादा मज़दूरों को ठेके पर रखने की पूरी छूट दी जा रही है। पर मज़दूर अपने परिवार की देखभाल कैसे करेगा, घर का खर्चा कैसे चलाएगा, अगर उसकी नौकरी ही सुरक्षित नहीं है?

किसानों को कहा जा रहा है कि अब वे अपनी उपज किसी को भी बेचने को आज़ाद हैं। पर अगर किसान को इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि उसे अपनी उपज के लिए लागत का डेढ़ गुना दाम मिलेगा, तो उसका परिवार कैसे ज़िंदा रह सकता है?

बीते तीस बरसों में, केंद्र सरकार और राज्य सरकारों में जो भी पार्टी रही है, वह उदारीकरण और निजीकरण के कार्यक्रम को लागू करती आयी है। अब तक तो इतना स्पष्ट हो चुका है कि उदारीकरण और निजीकरण के कार्यक्रम का इरादा है उन थोड़े-से अधिकारों को भी ख़त्म करना, जिन्हें मज़दूरों ने सालों-सालों तक संघर्ष करके हासिल किये थे। इस कार्यक्रम का इरादा है कि किसानों को बिजली-पानी-उर्वरक-कीटनाशक आदि की सब्सीडाइजड रेट पर सप्लाई, समर्थन मूल्य पर गेहूं-चावल की सुनिश्चित सरकारी खरीदारी, आदि के रूप में जो सीमित समर्थन मिलता था, उसे भी ख़त्म कर देना। यह मज़दूरों और किसानों को तबाह करके, देशी-विदेशी बड़े-बड़े पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ाने का कार्यक्रम है।

कांग्रेस पार्टी, भाजपा या कोई और पार्टी – जो भी केंद्र सरकार या राज्य सरकार में रही है – वे सब ऐसे बात करती हैं जैसे कि उन्हें मज़दूरों और किसानों की खुशहाली की बहुत चिंता है। पर जब-जब वे सत्ता में होती हैं, तो कॉर्पोरेट घरानों के अधिक-से-अधिक मुनाफ़ों को सुनिश्चित करने के ही कार्यक्रम को लागू करती हैं। जब विपक्ष में होती हैं तो सरकार की जन-विरोधी नीतियों के खि़लाफ़ हड़ताल और चक्का-जाम करती हैं। इसी ड्रामे को बार-बार दोहराया जाता है, ताकि लोगों को बुद्धू बनाया जाये और लोगों के गुस्से का फ़ायदा उठाकर विपक्ष की पार्टियां खुद सत्ता में आ सकें।

ये सभी पार्टियां एक ही धुन गुनगुनाती हैं, कि पूंजीवादी व्यवस्था और उदारीकरण व निजीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। हरेक पार्टी यह दावा करती है कि इस कार्यक्रम को दूसरों से ज्यादा बेहतर तरीके से लागू करेगी। वे दावा करती हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था के चलते, कुछ जनता-परस्त नीतियां लागू की जा सकती हैं। वे दावा करती हैं कि बड़े पूंजीपतियों की लालच और मज़दूरों-किसानों की ज़रूरतों, दोनों को एक ही साथ पूरा किया जा सकता है। लेकिन बीते 70  बरसों का अनुभव दिखाता है कि यह एक भ्रम मात्र है। कोई भी सरकार या तो पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफ़ों की लालच को पूरा कर सकती है, या फिर मज़दूरों-किसानों की ज़रूरतों को। दोनों को साथ-साथ पूरा करना संभव नहीं है!

उदारीकरण और निजीकरण के पूंजीवादी कार्यक्रम का एक ही असली विकल्प है। वह विकल्प है अर्थव्यवस्था की दिशा को ही पूरी तरह बदल देना। ज्यादा से ज्यादा पूंजीवादी मुनाफ़ों को सुनिश्चित करने की दिशा को बदलकर, अगर पूरी मेहनतकश आबादी की रोज़ी-रोटी और खुशहाली को सुनिश्चित करने की दिशा में अर्थव्यवस्था को चलाया जाये तो – यह एक असली विकल्प हो सकता है।

किसानों की रोज़ी-रोटी सुनिश्चित करने का एक ही तरीका है, कि लागत की सभी चीजों की सप्लाई पर और कृषि उपज की खरीदारी पर सामजिक नियंत्रण लागू किया जाये। जब तक कृषि उपज की खरीदारी निजी व्यापारियों के हाथों में रहेगी, तब तक वे हमेशा कम-से-कम दाम पर ही खरीदेंगे। अगर किसानों को लाभकारी दाम सुनिश्चित करने हैं तो केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को कृषि उपज का प्रमुख खरीददार बनना होगा और न सिर्फ गेहूं- चावल बल्कि सभी अन्य कृषि उत्पादों का भी। बीज, कीटनाशक और लागत की दूसरी चीजों की सप्लाई करने में और कृषि उत्पादों की खरीदारी में निजी मुनाफ़ाखोरों की भूमिका को ख़त्म कर देना होगा।

हमारे देश के अधिकतम किसान गरीब हैं और ज़मीन के छोटे-छोटे पट्टों पर खेती करते हैं। केंद्र और राज्य सरकारों को किसानों को प्रोत्साहित करना होगा कि वे अपनी-अपनी ज़मीन के पट्टों को सामूहिक करें और कृषि सहकारी समूह बनाएं, ताकि उत्पादकता भी बढ़े और लागत की क़ीमत भी कम हो। इन सहकारी फार्मों को सरकार की तरफ से मशीन व तकनीकी मदद दी जानी चाहिए।

आज उत्पादन की पूरी व्यवस्था पूंजीवादी कंपनियों के ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ों को सुनिश्चित करने की दिशा में चलायी जाती है। पर इसका नतीजा – मज़दूरों की बढ़ती बेरोज़गारी तथा किसानों की बढ़ती असुरक्षा – यही हो रहा है।

अगर अर्थव्यवस्था लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में चलायी जाये तो रोटी-कपड़ा-मकान, हर चीज के उत्पादन में बहुत बढ़ोतरी होगी। दसों-हजारों शिक्षकों, डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की ज़रूरत होगी, यानी सबको रोजगार दिलाना मुमकिन होगा।

किसी भी फैक्ट्री या दुकान, स्कूल या अस्पताल, में काम पर लगाये गए हर कर्मी को मज़दूर बतौर रजिस्टर्ड होना चाहिए। मज़दूर वर्ग के जो भी अधिकार हैं, जैसे कि न्यूनतम वेतन, आठ घंटे की दैनिक ड्यूटी टाइम, वेतन समेत अवकाश, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा, आदि ये सब मज़दूरों को सुनिश्चित होने चाहियें। आज ज्यादातर मज़दूरों को ये सारे अधिकार नहीं मिलते हैं। जिन थोड़े से मज़दूरों को कुछ हद तक कानूनी सुरक्षा मिलती थी, अब इन हालिया लेबर कोडों से उनके भी सारे अधिकारों को छीना जा रहा है।

इन लेबर कोडों के लागू होने से, अगर किसी फैक्ट्री में 40 से कम मज़दूर हैं या फिर अगर कोई ठेकेदार 50 से कम मज़दूरों से काम करवाता हो, तो उन मज़दूरों के कोई भी अधिकार नहीं होंगे। वे मालिक के रहम पर जीने को मजबूर होंगे। उनसे हर रोज, चाहे कितने भी घंटे काम करवाया जा सकता है, और उन्हें जब चाहे निकाल दिया जा सकता है। क्या ये मज़दूर इंसान नहीं हैं? क्या इन्हें अपने परिवारों की देखभाल करने या आराम करने या फिर अपने बच्चों के साथ थोड़ा समय बिताने की ज़रूरत नहीं होती?

सरकार के वक्ता कहते हैं कि छोटे उद्योगों के मालिकों के लिए अपने मज़दूरों को सामाजिक सुरक्षा दिलाना संभव नहीं है। परन्तु मालिकों के मुनाफ़ों को सुनिश्चित करने के लिए मज़दूरों के हक़ों को छीनना – यह वाजिब नहीं है। सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि सभी मज़दूरों को सामाजिक सुरक्षा मिले।

अपने मालिकों के अमानवीय बर्ताव के चलते, सभी क्षेत्रों के मज़दूर अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए, यूनियन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। मज़दूर हड़ताल और तरह-तरह के संघर्ष करके ही मालिकों को अपनी मांगों को मानने को मजबूर कर सकते हैं और अपनी हालतों को सुधार सकते हैं। परन्तु लेबर कोड मज़दूरों को अपने इस हथियार से वंचित करने जा रहे हैं। अब नए यूनियनों को रजिस्टर करना और हड़ताल पर जाना बहुत मुश्किल होगा।

साथियों,

इन दिनों में जो बहुत ही सकारात्मक और नयी उम्मीदें जगाने वाली बात देखने में आ रही है, वह है कि अब मज़दूर और किसान अपनी रोज़ी-रोटी और अधिकारों की हिफ़ाज़त करने के लिए मिलकर संघर्ष कर रहे हैं और बढ़-चढ़कर अपनी एकता प्रदर्शित कर रहे हैं। इस एकता को और बढ़ाकर व मजबूत करके ही हम आगे बढ़ पाएंगे। हां, उदारीकरण और निजीकरण के, पूंजीपतियों की अमीरी बढ़ाने के कार्यक्रम का विरोध ज़रूर करना होगा, परन्तु उदारीकरण और निजीकरण के कार्यक्रम को खारिज करना काफ़ी नहीं होगा। हमें इसके वैकल्पिक कार्यक्रम के लिए एक होना और संघर्ष करना होगा।

पूंजीवाद का विकल्प समाजवाद है। ‘समाजवाद’ शब्द को संविधान में तो जोड़ दिया गया है, परन्तु मौजूदा व्यवस्था पूंजीवादी है। हमें समाजवाद को हक़ीक़त में बदलने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट होना होगा। इसके लिए हमें अर्थव्यवस्था को नयी दिशा दिलानी होगी, पूरी आबादी की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा। बैंकिंग, थोक व्यापार और बड़ा खुदरा व्यापार, जैसे अहम क्षेत्रों को समाज के नियंत्रण में लाना होगा। ऐसा करके ही उत्पादन की पूरी व्यवस्था को एक केंद्रीकृत योजना के अनुसार और लोगों की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से चलाया जा सकेगा। अगर कोई निजी कारोबार इस योजना का पालन नहीं करता है तो राज्य उसे अपने हाथों में ले लेगा और उसे जनता के हाथों में एक सामाजिक कारोबार में बदल देगा।

मौजूदा संसदीय लोकतंत्र वास्तव में पूंजीतंत्र है। इस व्यवस्था में मज़दूरों और किसानों के हाथों में फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं है। पूंजीपतियों के धनबल से समर्थित पार्टियां चुनाव के लिए उम्मीदवारों को चुनती हैं। मज़दूरों और किसानों को पूंजीपति वर्ग की प्रतिस्पर्धी पार्टियों के बीच में से चुनने को कहा जाता है। हम सिर्फ वोट डालते हैं, उसके बाद हमसे यह नहीं पूछा जाता है कि किसकी सरकार होगी या फिर उसकी क्या नीतियां होंगी।

पूंजीपतियों की हुकूमत का विकल्प है मज़दूर-किसान की हुकूमत। हमें खुद अपने फैसले लेने के अधिकार को हासिल करने के उद्देश्य के इर्द-गिर्द एकजुट होना होगा, ताकि अर्थव्यवस्था को समाजवाद की दिशा में ले जा सकें।

भाजपा और उसके मित्र कहते हैं कि हिन्दू बहुसंख्या में हैं, इसलिए हमें हिन्दू राष्ट्र लाना चाहिए। कांग्रेस पार्टी और उसके मित्र कहते हैं कि साम्प्रदायिकता मुख्य समस्या है और हमें धर्म निरपेक्ष सरकार चाहिए। दोनों ही ग़लत हैं। वे मज़दूरों और किसानों को गुमराह करना चाहते हैं। असली संघर्ष एक तरफ पूंजीपति वर्ग और दूसरी तरफ मज़दूर-किसान के बीच में है। हमारा राजनीतिक लक्ष्य न तो हिन्दू राष्ट्र स्थापित करना है और न ही धर्म निरपेक्ष सरकार। हमारा लक्ष्य है मौजूदा पूंजीवादी राज की जगह पर मज़दूर-किसान का राज स्थापित करना।

साथियों,

आगे बढ़ने का एक ही रास्ता है, मज़दूरों और किसानों की लड़ाकू एकता को मजबूत करना। हम मानते हैं कि ‘एक पर हमला सब पर हमला!’ है। हमें एक सांझे कार्यक्रम के इर्द-गिर्द अपनी राजनीतिक एकता बनानी होगी। इस कार्यक्रम का उद्देश्य होगा मज़दूर-किसान का राज स्थापित करना और अर्थव्यवस्था को समाजवाद की दिशा में ले जाना। हमें उन पार्टियों के जाल में नहीं फंसना चाहिए जो हमारे संघर्षों का फायदा उठाकर खुद सत्ता में आने के अपने तंग इरादों को हासिल करना चाहती हैं और फिर सत्ता में आकर, उन्हीं चंद इजारेदार पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ाने वाली व्यवस्था और कार्यक्रम को बरकरार रखना चाहती हैं।

मज़दूर एकता कमेटी मज़दूरों और किसानों को संगठित करने वाले सभी कार्यकर्ताओं से अपील करती है कि इस प्रयास में सब साथ दें। हम मज़दूर-किसान हिन्दोस्तान की अधिकतम आबादी हैं। अगर हम एकजुट होकर एक राजनीतिक ताकत बन जाते हैं, तो हम समाज की दिशा को बदल सकते हैं। हिन्दोस्तान की पीढ़ी दर पीढ़ी इन्क़लाब ज़िंदाबाद! के नारे से प्रेरित होती आयी है। अब उसे एक नारे से एक कार्यक्रम में बदलने का वक्त आ गया है।

एक पर हमला सब पर हमला!

मज़दूर-किसान का राज लाने के लक्ष्य के साथ एकजुट हों!

नए उज्ज्वल समाजवादी समाज के लिए संघर्ष करें!

close

Share and Enjoy !

0Shares
0

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *