कोविड-19 के संकट में दवाई कंपनियों ने भारी मुनाफ़ा कमाया

जब दुनियाभर में लोग कोविड और लॉकडाउन के भयंकर असर से त्रस्त हैं, देश और दुनिया में दवाई कंपनियों के पूंजीपति मालिक भारी मुनाफ़े लूट रहे हैं। ये दवाई कंपनियां लोगों की मजबूरी का फ़ायदा उठाते हुए तरह-तरह की दवाइयों को भारी क़ीमत पर बाजार में बेच रही हैं।

ये दवा कंपनियां कोविड के इलाज के नाम पर फर्ज़ी दवाइयां बेचकर भारी मुनाफ़े बना रही हैं। उदाहरण के लिए रेमेडेसीविर की दवाई 4800-5400 रुपये प्रति डोज पर बेची जा रही है, जबकि उसकी उत्पादन कीमत केवल 750 रुपये है। इस दवाई पर एक अमरीकी दवा कंपनी जिलेद साइंसेज की इजारेदारी है। भारत की सरकार ने केवल दो हिन्दोस्तानी कंपनियों, सिपला और हेटेरो को ही देश में इस दवाई की बिक्री की इजाज़त दी है।

तोसिलीजुमाब इंजेक्शन का किस्सा तो इससे भी ज्यादा हैरतअंगेज है। इस दवाई पर एक स्विस बहुराष्ट्रीय कंपनी रोचे की दुनियाभर में इजारेदारी है। रोचे ने केवल एक हिन्दोस्तानी कंपनी, सिपला को ही इसका आयात और वितरण करने की इजाज़त दी है। इस वजह से इसकी आपूर्ति बेहद सीमित है और क़ीमत बहुत ज्यादा। इसकी क़ीमत 40,000 रुपये है। हिन्दोस्तान में कितने लोग इस दवाई को खरीद सकते हैं? यही इंजेक्शन अमरीका में इससे भी ज्यादा मुनाफ़े बनाएगा, जहां उसकी क़ीमत 2100 अमरीकी डॉलर (यानि 1,55,000 रुपये) है।

अब तक कोई भी दवाई कोरोना वायरस के इलाज के लिए कारगर साबित नहीं हुई है। देश का स्वास्थ्य मंत्रालय लोगों को यह नहीं बता रहा है कि रेमेडेसीविर और तोसिलीजुमाब अभी तक कोरोना वायरस के इलाज के लिए कारगर साबित नहीं हुए हैं। लोगों को यह नहीं बताया जा रहा है कि ये दवाइयां केवल प्रयोग के लिए बेची जा रही हैं। इन दवाइयों के इस्तेमाल के लिए मरीज या उसके परिजनों से लिखित अनुमति लेने की कोई ज़रूरत नहीं है। केंद्र सरकार इन दवाइयों की आपूर्ति की न तो निगरानी कर रही है और न ही उनकी क़ीमत को नियंत्रित कर रही है।

वैसे तो महामारी के बहाने पी.पी.ई. किट, अन्य उपकरण और सेनीटाईज़र, इत्यादि का उत्पादन करने वाली कंपनियां लोगों को लूट ही रही हैं, लेकिन कोविड टीके से दवा और टीका बनाने वाली कंपनियों को भारी मुनाफ़े की उम्मीद है। किसी दवा और टीके में भारी अंतर है। दवाई बीमार व्यक्ति को दी जाती है, टीका स्वस्थ व्यक्तियों को दिया जता है। इस तरह से टीका लेने वालों की तादाद कई गुना बड़ी होगी! इसके अलावा ऐसे भी टीके हैं जो केवल एक सीमित अवधि के लिए ही असरदार रहते हैं। इसका मतलब है दुनियाभर में अरबों लोगों को बार-बार टीके बेचे जाने की संभावना है।

इस समय दुनियाभर में छह अलग-अलग प्रकार के करीब 200 टीकों पर काम चल रहा है, जिसमें से सात हिन्दोस्तान में हैं। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि प्रति वर्ष कई अरब डोज का उत्पादन करने की क्षमता वाली सुविधाएं तैयार की जा रही हैं। टीका बनाने वाली कंपनियां साफ तौर से यह चाहती हैं कि दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति को टीका दिया जाये। इस कार्य में दुनियाभर की दवा और टीका उत्पादन करने वाली कंपनियां शामिल हैं। जबकि टीके पर अभी काम चल ही रहा है, लेकिन उसके लिए उत्पादन सुविधाएं पहले से ही तैयार की जा रही हैं।

सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया, जो कि दुनियाभर में टीका उत्पादन करने वाली सबसे बड़ी कंपनी है, यह माना है कि वह कम आय वाले देशों को कम कीमत यानी 3 अमरीकी डॉलर (220 रुपये) दाम पर टीका बेचेगी। यह कंपनी हर साल टीके के 2 अरब डोज़ तैयार करने की योजना बना रही है। कम आय वाले देशों में जिन लोगों को सरकार से कोई समर्थन नहीं मिलता है उन्हें कम से कम 6 अमरीकी डॉलर (440 रुपये) प्रति व्यक्ति खर्च करने होंगे।

यदि हिन्दोस्तान की सरकार देश की एक तिहाई आबादी यानी 45 करोड़ लोगों को टीका लगवाने का खर्चा उठाती है, और बाकि लोगों को खुद अपना पैसा खर्च करने को कहती है, तो अगले तीन वर्षों में इससे 45,000 करोड़ रुपये का कारोबार पैदा होगा।

अमरीकी सरकार ने दुनिया की सबसे बड़ी दवा कंपनी प्फिजेर द्वारा विकसित टीके के लिए प्रति व्यक्ति 40 अमरीकी डॉलर (करीब 3000 रुपये) खर्च करने की मंजूरी दी है, जबकि इसकी असली क़ीमत केवल 2 डॉलर प्रति खुराक से भी कम होगी! ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि अगले दो से तीन वर्षों में दुनियाभर में कोविड के टीके की बिक्री 40-50 अरब अमरीकी डॉलर (3-3.5 लाख करोड़ रुपयों) की होगी।

इसका मतलब है टीके बनाने वाली कंपनियां दुनिया के सभी लोगों से औसतन 370 रुपये प्रति व्यक्ति की वसूली करेंगी। भारी मुनाफों का यही लालच है जिसकी वजह से दवाई कंपनियां दुनियाभर में यह संदेश फैला रही हैं कि जब तक सभी लोगों का टीकाकरण नहीं हो जाता तब तक कोविड महामारी का अंत नहीं होगा। दुनियाभर की सरकारें भी इस बात का प्रचार करने का काम कर रही हैं, जिससे यह साफ  नज़र आता है कि सरकारी नीतियों पर इन दवा कंपनियों की पकड़ कितनी मजबूत है।

दवाइयों की ऊंची क़ीमतों को जायज़ साबित करने के लिए ये दवा कंपनियां दावा कर रही हैं कि चूंकि इन दवाइयों को विकसित करने में बरसों की मेहनत और पैसा खर्च करना होता है और इसलिये इसकी भरपाई के लिए दवाइयों की कीमत ज्यादा रखी गयी है। लेकिन असलियत में कोविड-19 के टीके को विकसित करने के लिए सरकार अपने बजट से पैसा लगा रही है। अधिकांश दवा कंपनियां कोई भी खर्चा नहीं कर रही हैं। हिन्दोस्तान में सरकार कोविड का टीका विकसित करने के लिए एक निजी दवाई कंपनी, भारत बायोटेक को पैसा दे रही है।

किसी भी टीके को पूरी तरह से विकसित करने के लिए आमतौर पर 6-10 वर्ष का समय लगता है, जिस दौरान उसकी सुरक्षा और क्षमता की पुष्टि की जाती है। कोविड-19 के टीके के लिए इस पूरी प्रक्रिया को 8-12 महीने में निपटाया जा रहा है। नियामक संस्थाएं जल्दबाज़ी में इजाज़त देती जा रही हैं। इस तरह से किये गए प्रयोग और जांच से टीके के केवल फौरी और अल्पकालिक प्रतिकूल प्रभाव (साइड इफेक्ट) के बारे में ही जानकारी मिल सकती है। इसके दीर्घकालीन प्रभाव क्या होंगे इसकी कोई भी जानकारी नहीं मिलेगी। इसके अलावा ये टीके कितने समय के लिए असरदार रहेंगे इसकी भी कोई जानकारी नहीं है। इसकी सही मात्रा क्या होनी चाहिए यह भी तय नहीं किया गया है।

कोविड-19 के टीके के विकास के लिए उपयोग की जा रही तकनीकों में आर.एन.ए. परिवर्तन शामिल है। क्या मानव जीन (वंशाणु) पर इसका असर होगा? क्या आने वाली पीढ़ियों पर इसका असर होगा? कोई नहीं जानता। इसलिए यदि कोई टीका इस समय कारगर साबित हुआ तो भी इसका दीर्घकालीन प्रभाव क्या होगा और यह कितना सुरक्षित है इसकी पुष्टि नहीं हो पाएगी।

सबसे बड़ी चिंता का विषय कुछ खबरे हैं,  जो बताती हैं कि अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू सफर के लिए इस टीके को अनिवार्य बनाया जायेगा। इन दवाई कंपनियों के पास जो राजनीतिक दबदबा है उसके चलते यह टीका दुनियाभर में सभी लोगों पर थोपा जायेगा।

स्वास्थ्य संकट के समय लोगों पर गैर-ज़रूरी दवाइयां और टीके थोपकर उनसे भारी मुनाफ़े कमाना, यह दवाई कंपनियों का इतिहास रहा है। ये कंपनियां कोविड के बहाने आज भी वही काम कर रही हैं। दुनियाभर में पूंजीवादी देशों की सरकारें इन दवा कंपनियों के साथ मिली हुई हैं। लोगों के पैसे का इस्तेमाल इन दवा कंपनियों के मुनाफ़े बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।

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