दिल्ली दंगों की साज़िश का मुक़दमा :

राजकीय आतंकवाद को जायज़ ठहराने के लिए सच को झुठलाने की कोशिश

केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि उसने फरवरी 2020 में, उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के पीछे एक साज़िश का पता लगाया है जिसमें 53 लोगों की जान चली गई और सैकड़ों लोग घायल हो गए।

इस सांप्रदायिक हिंसा के तुरंत बाद, गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि यह नागरिकता संशोधन अधिनियम (सी.ए.ए.) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एन.आर.सी.) के ख़िलाफ़ सड़क पर हुए जन-विरोध प्रदर्शनों की एक सहज प्रतिक्रिया थी। लेकिन, उन्होंने एक महीने बाद अपना बयान बदल दिया। उन्होंने लोकसभा में घोषणा की कि यह सांप्रदायिक हिंसा उन लोगों द्वारा एक साज़िश का परिणाम थी जो सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के ख़िलाफ़ जन-विरोधों को आयोजित कर रहे थे। खासतौर से, उन्होंने “यूनाइटेड अगेंस्ट हेट” अभियान के आयोजकों को इस साजिश का मास्टरमाइंड बताया।

गृहमंत्री के इस षड्यंत्र सिद्धांत के समर्थन में दिल्ली पुलिस ने 17000 पन्नों की चार्जशीट पेश की है। चार्जशीट में कई लोगों के नाम हैं जो सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के ख़िलाफ़ सड़कों पर विरोध प्रदर्शन आयोजित करने में सक्रिय थे। चार्जशीट में उनपर आरोप लगाया गया है कि अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की यात्रा के दौरान, कथित रूप से अंतर्राष्ट्रीय तौर पर भारत को बदनाम करने के लिए उन्होंने सांप्रदायिक हिंसा की योजना बनायी थी।

लेकिन भाजपा नेताओं के नफ़रत भरे भाषणों का कोई जिक्र नहीं किया गया है जहां उन्होंने सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों को “देश के गद्दार” करार देते हुए उनको गोली मारने के लिए खुला बुलावा दिया था। इस आरोप पत्र में इन चश्मदीदों की गवाही का कोई जिक्र नहीं है जहां यह बताया गया है कि किस तरह से सशस्त्र गिरोह मुसलमान लोगों को निशाना बनाकर उनके ख़िलाफ़ प्रत्यक्ष हिंसा कर रहे थे, जबकि पुलिस केवल खड़े होकर तमाशा देखती रही थी।

असम में नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर बनाने की प्रक्रिया 2013 में शुरू हुई और 2019 में संपन्न हुई। सरकार ने बजाय यह साबित करने के लिए कि कोई व्यक्ति एक अवैध अप्रवासी है, इस प्रक्रिया के तहत, असम में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को मजबूर किया गया कि वे इस बात को साबित करें कि उसके पूर्वज हिन्दोस्तान के भारतीय नागरिक थे और इसके लिए कई तरह के दस्तावेज़ पेश करने के लिए कहा गया। इसका नतीजा यह हुआ कि 19 लाख से अधिक लोगों को गैरकानूनी घोषित किया गया है और जिन्हें अपना बाकि जीवन डिटेंशन सेंटर में गुजारना पड़ सकता है।

31 मई, 2019 को केंद्र सरकार ने सभी राज्य सरकारों को एन.आर.सी. को पूरे देश में लागू करने की प्रस्तावित प्रक्रिया की तैयारी में, “अवैध प्रवासियों” के लिए “डिटेंशन सेंटर” बनाने के लिए कहा। गृहमंत्री अमित शाह ने बार-बार, बंगाली मुस्लिमों को “कीड़े-मकौड़े” और “दीमक” के रूप में संबोधित किया, जिन्हें देश से बाहर निकाल दिया जाना चाहिए।

11 दिसंबर, 2019 को संसद द्वारा पारित नागरिकता संशोधन अधिनियम के अनुसार, जो लोग अवैध रूप से बांग्लादेश, भारत या अफ़गानिस्तान से भारत आ गए थे, उन्हें भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने की अनुमति है। लेकिन यह सुविधा मुसलमान लोगों नहीं दी गयी है। देश से निर्वासित होने का या डिटेंशन सेंटर में अपनी पूरी ज़िदगी बिताने का ख़तरा, खास तौर से उन सभी मुसलमानों के सिर पर मंडरा रहा है जो अपने पूर्वजों के हिन्दोस्तानी होने के दस्तावेज़ी सबूत नहीं दे सकते।

विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोगों ने बड़े पैमाने पर एकजुट होकर यह मांग की कि सरकार भेदभावपूर्ण सी.ए.ए. को वापस ले और प्रस्तावित एन.आर.सी. आगे न बढ़ाये। इन विरोध प्रदर्शनों में महिलायें सबसे आगे थी। कई विश्वविद्यालयों के छात्रों और शिक्षाविदों सहित विदेशों में पढ़ रहे हिन्दोस्तानी छात्रों ने सक्रिय रूप से इन विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया और अपना रोष प्रकट किया। हुक्मरानों द्वारा इस जन आंदोलन में हिंसा को भड़काने की कई कोशिशों के बावजूद, ये विरोध प्रदर्शन आमतौर पर शांतिपूर्ण रहे।

फरवरी 2020 में, उत्तर-पूर्व दिल्ली में जो सांप्रदायिक हिंसा आयोजित की गयी थी, उसका उद्देश्य था भेदभावपूर्ण सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर हो रहे इस जन-विरोध को बदनाम करना और उसको किसी तरह दबाने की कोशिश करना। मार्च में लगाए गए लॉक-डाउन के बाद, विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय भूमिका निभाने वाली सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों को यू.ए.पी.ए. के तहत गिरफ़्तार किया गया और अनिश्चित काल के लिए जेल में बंद कर दिया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा प्रचारित और दिल्ली पुलिस की चार्जशीट द्वारा समर्थित, साज़िश के आरोप को इस पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए।

लोगों के जन-आंदोलनों को दबाने के लिए बल के उपयोग को सही ठहराने के लिए, कई आधिकारिक साज़िश के आरोप के प्रचार को पिछले 40 वर्षों में हमने बार-बार देखा है। इसी तरह हथियारों से लैस सिख हजारों हिंदुओं को मारने की साज़िश कर रहे थे, इस तरह के प्रचार को जून 1984 में स्वर्ण मंदिर पर सेना के हमले को सही साबित करने के लिये किया गया था। इसी प्रकार सिखों ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की साज़िश रची थी, इस प्रचार को नवंबर 1984 के सांप्रदायिक नरसंहार को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल किया गया था। इसी तरह का प्रचार सिख युवाओं की मनमानी गिरफ्तारी, नज़रबंदी और तथाकथित मुठभेड़ों में सुरक्षा बलों द्वारा उनकी हत्या को सही ठहराने के लिए भी किया गया था।

किसी एक विशेष धार्मिक समुदाय के लोगों को हिन्दोस्तान के लिए ख़तरा बताने वाले झूठे प्रचारों का इस्तेमाल शासक वर्ग अपने अन्यायपूर्ण और शोषणकारी शासन के ख़िलाफ़ सभी प्रतिरोधों को दबाने के लिए अपने गैरकानूनी राजकीय आतंकवाद का औचित्य साबित करने के लिए बार-बार करता रहा है। आम लोगों की जायज़ राजनीतिक और आर्थिक मांगों के संघर्ष को, हुक्मरान वर्ग “कानून और व्यवस्था” की समस्या के रूप में पेश करता है। इस साल फरवरी में आयोजित दिल्ली की सांप्रदायिक हिंसा के बारे में साज़िश के आरोप का भी यही उद्देश्य है।

गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम (यू.ए.पी.ए.) के तहत गिरफ़्तारी और जेल

फरवरी में सांप्रदायिक हिंसा के लिए ज़िम्मेदार कथित साजिशकर्ताओं की पहली सूची में दिल्ली पुलिस द्वारा पंद्रह लोगों का नाम लिया गया है। इनमें अब्दुल खालिद सैफी, इशरत जहां, मीरान हैदर, ताहिर हुसैन, गुलफिशा खातून, सफूरा ज़रगर, सफा-उर-रहमान, आसिफ इक़बाल तनहा, शादाब अहमद, नताशा नरवाल, देवांगना कलिता, तस्लीम अहमद, सलीम मलिक, सलीम खान और अथर खान शामिल हैं। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, छात्र नेताओं उमर खालिद और शारजील इमाम के ख़िलाफ़ भी, पूरक आरोप पत्र तैयार किए जा रहे हैं, जिन पर साजिश के पीछे मास्टरमाइंड होने का आरोप लगाया जा रहा है।

इन सभी लोगों पर अत्यंत कठोर, गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यू.ए.पी.ए.) के काले कानून के तहत आरोप लगाए गए हैं। कई महीनों की गर्भावस्था के कारण, जमानत पर बाहर आने वाली सफूरा ज़रगर को छोड़कर, अन्य सभी को अनिश्चित काल के लिए बिना किसी जमानत के जेल में रखा जा सकता है।

राज्यसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए गृह राज्य मंत्री ने स्वीकार किया कि 2016, 2017 और 2018 के दौरान 3974 व्यक्तियों को यू.ए.पी.ए. के तहत गिरफ्तार किया गया था। इनमें से केवल 178 मामलों में आरोप पत्र दायर किए गए थे। शेष 3153 व्यक्ति बिना किसी आरोप के जेल में बंद हैं। 2019 और 2020 में गिरफ्तारियों की संख्या की जानकारी अभी प्रकाशित नहीं हुई है।

जिन लोगों के मामलों में मुक़दमा चलाया गया है, उनमें से अधिकांश लोगों को जेल में कई साल बिताने के बाद, कोर्ट द्वारा निर्दोष करार दिया गया है। आम धाराओं के तहत पुलिस को आरोपी व्यक्तियों के अपराध को साबित करना होता है, लेकिन यू.ए.पी.ए. इस काले कानून तहत अपनी बेगुनाही साबित करने का बोझ उस व्यक्ति पर होता है जिसपर पुलिस ने आरोप लगाया है।

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