किसान-विरोधी कानूनों का सच बनाम झूठ

देशभर में किसान तीन किसान-विरोधी कानूनों के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर आए हैं और ज़ोरदार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। 25 सितम्बर को देशभर के 250 किसान संगठनों ने देशव्यापी बंद का आयोजन किया। किसानों के इस बंद को केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और सैकड़ों अन्य मज़दूर संगठनों से पूरा समर्थन हासिल हुआ।

पंजाब के 31 किसान संगठनों ने 24 सितम्बर से तीन-दिवसीय चक्का जाम करने का फैसला लिया जिसे शहरों और गांवों के लाखों करोड़ों लोगों का सक्रिय समर्थन मिला। हरियाणा में 17 किसान संगठनों ने उप-मुख्यमंत्री दुष्यंत चैटाला के घर की घेराबंदी करने का संयुक्त आह्वान किया और उनसे सरकार से इस्तीफा देने की मांग की। आंसू गैस और लाठीचार्ज के हमलों का बहादुरी से सामना करते हुए दस हज़ार से अधिक किसानों ने 6 अक्तूबर को सिरसा में उनके निवास स्थान को घेर लिया। देश के कोने-कोने से किसानों के लगातार विरोध प्रदर्शन की खबरें आ रही हैं।

इन हालातों में केंद्र सरकार, प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी ने किसानों की एकता को तोड़ने और उनके संघर्ष को भटकाने के मक़सद से अपना झूठ का प्रचार अभियान चलाया है। इन कानूनों से देशभर के किसानों को होने वाले तथाकथित फ़ायदों के बारे में सरासर झूठ फैलाया जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्री दावा कर रहे हैं कि इन कानूनों से किसानों की बेड़ियां टूट जाएंगी और वे “खलनायक और शोषक” बिचैलियों से मुक्त हो जायेंगे। दिन-रात यही प्रचार किया जा रहा है कि इन कानूनों के लागू करने से किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी और वे समृद्ध हो जायेंगे। इन कानूनों को ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे कि ये किसानों को सशक्त और समृद्ध बनाने के लिए एक रामबाण हैं।

इनमें से कोई भी दावा सच्चाई की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है। यह केवल खोखले ऐलान और झूठे वादे हैं।

किसान देश में कहीं पर भी अपने उत्पाद बेच सकता है, जहां उसे सबसे अच्छी क़ीमत मिलेगी इस बात में कोई सच्चाई नहीं है। हमारे देश में बहुसंख्य किसान ऐसे हैं जो बहुत छोटी ज़मीन पर गुजारा करते हैं। किसान अपनी उपज को या तो स्थानीय निजी व्यापारी के हाथों बेचते हैं, जो उसे सीधे खेत से उठाता है, या किसान उसे सबसे करीब की मंडी तक ले जाकर खुद बेचते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि सबसे करीब मंडी कितनी दूरी पर है और क्या वह उसे मंडी तक ले जाने का खर्चा उठा सकता है। इसके अलावा मंडी में भी वह अपनी सारी उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं बेच पाता है।

बरसों से किसान व्यापारियों के गिरोह का शिकार बनता आया है, जिनसे मोलभाव करने की ताक़त उसके पास नहीं है। किसानों को अक्सर अपनी उपज को बेहद कम दाम पर बेचने को मजबूर होना पड़ता है। तमाम कृषि उत्पादों का 60-70 प्रतिशत हिस्सा स्थानीय निजी व्यापारी को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) से बेहद कम मूल्य पर बेचा जाता है। इसलिए किसान मांग करते आये हैं कि सरकार सभी कृषि उत्पादों को एम.एस.पी. या उत्पादन के खर्चे से 50 प्रतिशत अधिक मूल्य पर खरीदने की गारंटी दे, जिसमें परिवार के श्रम और ज़मीन के किराये को भी जोड़ा जाए। लेकिन तमाम सरकारें किसानों की इस मांग को पूरा करने से इंकार करती आई हैं।

राजनीतिक पार्टियां जब तक विरोधी खेमे में होती हैं, तो वे किसानों की इन जायज़ मांगों का समर्थन करती हंै। लेकिन जैसे ही वे सत्ता में आ जाती हंै, वे अपने वादों से मुकर जाती हैं। अब यह तीन किसान-विरोधी कानून पारित करके राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन (रा.ज.ग) की सरकार ने अपने फैसले से दिखा दिया है कि अब कृषि उत्पादों के थोक व्यापार पर पूरी तरह से इजारेदार व्यापारियों और कृषि -व्यापार कंपनियों का दबदबा क़ायम किया जायेगा। अपने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अब सरकार उस व्यवस्था को भी खत्म करने जा रही है जिसके तहत एक सीमित स्तर पर सरकार कुछ चुनिंदा फ़सलों की खरीदी किया करती थी।

इन कानूनों में कॉन्ट्रैक्ट खेती के प्रावधानों से किसानों की असुरक्षा और भी बढ़ गयी है। किसानों का अनुभव यह दिखलाता है कि बड़ी कृषि कंपनियां कॉन्ट्रैक्ट में कृषि उत्पादों को पूर्व निर्धारित दाम पर खरीदने के वादा करती है, वे अपनी मनमर्जी से कॉन्ट्रैक्ट के नियमों का उल्लंघन करती हैं। ये कंपनियां पहले किसानों को नगद फ़सलों की खेती करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं, और उनकी खरीदी के लिए कॉन्ट्रैक्ट करती हैं। उसके बाद वे उपज को कम दाम पर खरीदने के लिए तरह-तरह के बहाने बनाती हैं। जब बम्पर फ़सल होती है तो वे क़ीमतों को गिराने के लिए इसका इस्तेमाल करती हैं, और फ़सल की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए उसे खरीदने से इंकार कर देती हैं। इसकी वजह से किसान बर्बाद हो जाता है।

केंद्रीय कृषि मंत्री के अनुसार, यदि इस मामले में कोई विवाद पैदा हो जता है तो किसान सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के पास शिकायत कर सकता है। यदि वह इसमें नाक़ामयाब हो जाता है, तो वह कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकता है। हमारे देश की हक़ीक़त से जिसका कोई वास्ता नहीं है ऐसा केवल वही व्यक्ति यह कह सकता है। जो किसान पूरी तरह से बर्बाद हो गया है, वह इन बड़ी और शक्तिशाली कंपनियों के ख़िलाफ़ कोर्ट में लड़ सकता है। इन विशाल कंपनियों के सामने किसान के पास मोल-भाव करने की कोई ताक़त नहीं है।

अति-आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून, साफ तौर से इजारेदार व्यापारियों और एग्रो-प्रोसेसिंग कंपनियों के हित में है। इस कानून की वजह से कृषि उत्पादों की जमाखोरी और सट्टेबाजी को बढ़ावा मिलेगा। फ़सल की कटाई के तुरंत बाद इजारेदार व्यापारी किसानों की उपज को लाभदायक मूल्य से बहुत कम दाम पर खरीद लेंगे, उसकी जमाखोरी करेंगे और बाद में ऊंचे दाम पर बेचेंगे। यह सभी किसानों, कृषि मज़दूरों के साथ-साथ शहरी मेहनतकशों के हितों के ख़िलाफ़ है।

ये तीनों कानून सरकार के दावों के ठीक विपरीत काम करेंगे। किसान पूरी तरह से इजारेदार व्यापारियों के रहमो-करम पर जीने को मजबूर हो जायेगा। जैसे-जैसे यह कानून लागू किए जायेंगे, बढ़ते पैमाने पर किसान बर्बाद होते रहेंगे।

किसानों के गुस्से को शांत करने के लिए सरकार ने इस मौसम के लिए एम.एस.पी. की घोषणा की है, ताकि यह दिखाया जा सके कि एम.एस.पी. ख़त्म नहीं किया गया है। सरकार ने यह भी ऐलान किया है कि मंडियां खत्म नहीं की जाएंगी। लेकिन हमारे देश का किसान इन सब बहकावों में आने वाला नहीं है। उसने अपने कड़वे अनुभवों से सीखा है कि पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकार पर कतई भी भरोसा नहीं किया जा सकता। उनकी जुबान पर मीठे-मीठे शब्द होते हैं कि किस तरह से उनके दिल किसानों के लिए धड़कते हैं, लेकिन फिर वही लोग किसानों की पीठ में छुरा घोपते हैं। “मुंह में राम बगल में छुरी”, यही इनकी फितरत है।

आज किसान जो संघर्ष चला रहे हैं, वह केवल उनकी अपनी ज़िन्दगी और रोज़गार की हिफ़ाज़त के लिए नहीं है। उनका यह संघर्ष सभी मज़दूरों के हितों का संघर्ष है। यदि सरकार खाद्य पदार्थ खरीदना बंद कर देती है तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी.डी.एस. या राशन व्यवस्था) जिसे अभी सीमित तौर पर चलाया जा रहा, और जिसमें गेहूं और चावल दिए जाते हैं, वह भी खत्म हो जाएगी।

आज जो सैकड़ों किसान संगठन इस संघर्ष में एकजुट होकर आगे आये हंै वे इस बात की पूरी कोशिश कर रहं हैं कि कांग्रेस पार्टी जैसी पूंजीवादी पार्टियां उनको गुमराह न कर सकें और उन्हें गलत दिशा में न ले जा सकें। ये संगठन ऐसी राजनीतिक पार्टियों से जानबूझकर दूरी बनाये हुए हैं, जो इस समय सरकार के विरोधी खेमे में है और जो किसानों के समर्थन में नारे लगा रहे हैं। किसान अच्छी तरह से जानते हैं कि ये पार्टियां किसानों की लंबे समय से चलती आ रही मांगों को कभी भी पूरा नहीं करेंगी।

हमारे देश में किसानों का सच्चा दोस्त केवल मज़दूर है। मज़दूर और किसान दोनों मिलाकर देश की अधिकांश आबादी हैं। जिस तरह से किसानों के संघर्ष को मज़दूर संगठनों का समर्थन मिला है और जिस तरह से किसान संगठनों ने मज़दूरों के संघर्ष का समर्थन किया है, उससे मज़दूरों-किसानों की एकता की असली संभावना है। आज समय की मांग है कि हम इस एकता को मजबूत बनाये और पूंजीपति वर्ग की हुकूमत को उखाड़ फेंकने और मज़दूरों और किसानों की हुकूमत क़ायम करने के लक्ष्य के साथ अपने संघर्ष को तेज़ करें। तब जाकर देश की अर्थव्यवस्था की दिशा को पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने से बदलकर लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में मोड़ा जा सकेगा।

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