“सबको शिक्षा क्यों नहीं एक समान?” विषय पर गोष्ठी

कामगार एकता कमिटी (के.ई.सी.) और लोक राज संगठन ने संयुक्त रूप से 4 अक्तूबर, 2020 को “सबको शिक्षा क्यों नहीं एक समान?” विषय पर एक वेब गोष्ठी आयोजित की। इस ज्वलंत विषय ने देशभर से युवाओं और बुजुर्गों को समान रूप आकर्षित किया और उन्होंने इस चर्चा में उत्साहपूर्वक भाग लिया। कई आमंत्रित वक्ताओं ने इस चर्चा में अपने विचारों का योगदान दिया, जिनमें थे, शिक्षाविद डा. अनिल सदगोपाल, मुंबई और उपनगरीय माध्यमिक विद्यालय शिक्षक संघ से श्री कानाडे, जय महाराष्ट्र शिक्षण और कर्मचारी सेना से विजय पाटिल, पुणे से सतीश गोरे और ए.आई.आर.एस.ओ. से सात्विक।

इस गोष्टी का प्रारंभ गिरीश की प्रारम्भिक प्रस्तुति से हुआ। इसमें बताया गया कि संविधान में अच्छी गुणवत्ता की समान शिक्षा का वादा किया गया है और विभिन्न सरकारों द्वारा स्थापित कई आयोगों द्वारा इसे दोहराया भी गया लेकिन यह वादा महज कागज़ के पन्नों पर ही रह गया। इसका कारण है कि हमारे देश का शासक वर्ग सभी को समान गुणवत्ता की शिक्षा का अधिकार नहीं देना चाहता। यह सिर्फ एक विशेषाधिकार है। इस अधिकार के हनन से उन्हें फ़ायदा होता है जैसा कि आज़ादी से पहले अंग्रेज शासकों ने किया था। उन्होंने जाति प्रथा पर आधारित सदियों पुरानी इस धारणा को और पुख्ता किया कि इस देश के कुछ समुदायों के लोग अन्य समुदायों के लोगों से श्रेष्ठ हैं और जो निम्न स्तर के हैं उन्हें अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण ज़िन्दगी भर बेरहम श्रम ही करना है। हमारा शासक वर्ग चाहता है कि इस अशिक्षित समुदाय के लोग चन्द सिक्कों के लिए उम्र भर उनकी चाकरी करते रहें और वे इसका लाभ अर्जित करते रहें।

स्कूली प्रणाली में स्तरीकरण समाज में विभाजन को दर्शाता है। बदले में देश के स्कूलों में वर्गीकरण की प्रणाली का अनुसरण समाज में जाति और वर्ग के नाम पर विभाजन को और सक्षम कर रहा है। राष्ट्रीय आय के अनुपात में सार्वजनिक शिक्षा के खर्च के मामले में 193 देशों में भारत की रैंक 143वीं है। अगर अच्छी शिक्षा हमारा मौलिक अधिकार है तो हमारे देश में एक सामान्य स्कूल प्रणाली का होना लाजिमी है। अच्छी शिक्षा के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की आवश्यकता होती है जिनके पास नियमित रूप से सुरक्षित नौकरियां अच्छे वेतन पर उपलब्ध हों। तभी एक शिक्षक अच्छी शिक्षा प्रदान करने में अपनी ऊर्जा लगा सकता है।

आइए हम अपने सभी अवरोधों जैसे कि जाति, समुदाय और पार्टी या यूनियन की संबद्धता तथा विचारधारा से ऊपर उठकर अपने देश में समान रूप से अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा और एक समान स्कूल प्रणाली के हमारे अधिकार की मांग के इर्द-गिर्द जुड़ जाएं और हम सभी वर्गों के लोगों को इस हक़ के लिये संघर्ष में खड़ा करें।

डा. अनिल सदगोपाल ने कहा कि चर्चा के लिए चुना गया विषय अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसे हल किए बिना न तो संविधान में किए गए वादे पूरे हो पायेंगे और न ही हमारे देश के 130 करोड़ लोग सुखपूर्वक रह पाएंगे। उन्होंने प्रस्तुति की सराहना करते हुए कहा कि “मुझे एहसास हुआ कि मैं खुद यह सब बोल रहा हूं और मैं इससे पूरी तरह सहमत हूं!” उन्होंने इस तथ्य पर खेद प्रकट किया कि चुने गए दलों में से किसी ने भी इस अहम सवाल पर ध्यान नहीं दिया है। चुप रहने की यह साज़िश क्यों?

डा. सदगोपाल ने कहा कि दुनिया में कोई भी ऐसा देश नहीं है, वो चाहे पूंजीवादी हो या समाजवादी, जो एक सामान्य स्कूल प्रणाली के बिना सभी को शिक्षित करने में कामयाब रहा हो और हिन्दोस्तान एक अपवाद नहीं हो सकता। हमें पूरे देश को एकजुट करके एक समान स्कूल प्रणाली के समर्थन में आंदोलन शुरू करना होगा और इसका मतलब है कि हमें शिक्षा में मुनाफ़ाख़ोरी के कारोबार के उन्मूलन की मांग करनी होगी। अपने वक्तव्य का समापन करते हुए उन्होंने “सबको समान शिक्षा” तथा “मज़दूर व किसान इसके लिए लड़ेंगे और जीतेंगे!” का आवाह्न किया।

अन्य वक्ताओं ने स्कूलों में पाई जाने वाली भयावह हालतों पर ध्यान आकर्षित किया, चाहे वे सरकारी स्कूल हों या निजी। वक्ताओं में से एक ने घोषणा की कि राजनेता अपनी मालिकी वाले निजी स्कूलों और कालेजों से लाभ कमाते हैं। वर्तमान में चाहे भाजपा हो या इससे पहले कांग्रेस दोनों की भूमिका एक जैसी ही रही है। कुछ वक्ताओं ने समान कार्य के लिए मज़दूरी में बड़ी असमानता और सुविधाओं की कमी के बारे में बात की। उनमें से एक ने छात्रों के माता-पिता को पूरे देश में समान शिक्षा प्रणाली लागू करने के संघर्ष में जोड़ने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।

एक सहभागी ने तथ्यों और आंकड़ों की मदद से प्रदर्शित किया कि हिन्दोस्तान के पास अच्छी गुणवत्ता तथा सभी को समान रूप से शिक्षा प्रदान करने के संसाधन मौजूद हैं। इस पर पैसा क्यों नहीं खर्च किया जा रहा है? देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के लगभग 10 लाख पद रिक्त हैं। इन पदों पर भर्ती करने से इतने ही बेरोज़गारों को रोज़गार मिलेगा। जिसकी कुल वार्षिक लागत करीब 40,000 करोड़ रुपये होगी। यदि अधिक शिक्षकों को विश्व शिक्षक छात्र औसत के अनुरूप भर्ती किया जाता है, तो सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में तुरंत सुधार होगा, इसके अलावा लगभग 30 लाख लोगों को रोज़गार भी मिलेगा।

देश के लगभग 22,000 स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय की सुविधा नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं। प्रति शौचालय 1 लाख रुपये के अनुमानित व्यय से इन 22,000 स्कूलों में शौचालय पर कुल खर्च केवल 220 करोड़ रुपये होगा। बिहार में लगभग 5,000 स्कूल भवन विहीन हैं। यदि 50 लाख रुपये प्रति विद्यालय भवन निर्माण पर खर्च किया जाये तो भी कुल खर्च सिर्फ 2500 करोड़ रुपये ही होगा।

उपरोक्त प्रत्यक्ष ज़रूरतों के विपरीत, फिजूल खर्ची के कितने ही उदाहरण हमारे सामने आए हैं। इनमें 20,000 करोड़ रुपये की लागत से नई दिल्ली में सेन्ट्रल विस्टा का विकास और दुनिया की सबसे ऊंचाई वाली प्रतिमा का 2000 करोड़ रुपये की लागत से निर्माण शामिल है। इजारेदार पूंजीपतियों के 6 लाख करोड़ रुपये के ऋण की माफ़ी के उपरांत सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में पुनः 3 लाख करोड़ रुपये का पूंजी निवेश किया गया। 2019 में कॉरपोरेट्स को दी गयी कर रियायतों के फलस्वरूप प्रति वर्ष 1 करोड़ 67 लाख रुपये से अधिक के सरकारी राजस्व का नुकसान होगा।

हमारे देश के सभी बच्चों के लिए समान गुणवत्ता की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष को आगे बढ़ाने पर ज़ोरदार चर्चा के बाद यह बैठक संपन्न हुई और इसमें कई प्रस्ताव भी रखे गए।

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