क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की जापान में बैठक: अमरीका-नीत क्वाड सैन्य गठबंधन एशिया में शांति के हितों के ख़िलाफ़ है

(चतुर्भुज सुरक्षा वार्ता) या क्वाड की दूसरी मंत्री स्तरीय बैठक 6-7 अक्तूबर को जापान में आयोजित की जा रही है। क्वाड में चार देश शामिल हैं – अमरीका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और हिन्दोस्तान। विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस बैठक में हिन्दोस्तान का प्रतिनिधित्व करेंगे।

क्वाड एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमरीका द्वारा प्रायोजित एक सैनिक गठबंधन के केंद्र में है। इसका मक़सद है चीन की घेराबंदी करना और पूरे एशिया पर अमरीका का दबदबा क़ायम करना।

यह क्वाड बैठक ऐसे समय पर हो रही है जब अमरीका चीन को बदनाम करने, उसे अकेला करने, फौजी रूप से धमकाने और आर्थिक रूप से उसका गला घोंटने की लगातार कोशिश कर रहा है। अमरीका के युद्धपोत दक्षिण चीन महासगार में सैन्य अभ्यास कर रहे हैं। अमरीका ताईवान को हथियारबंद कर रहा है और दक्षिण-पूर्वी एशिया के अन्य राज्यों को चीन के ख़िलाफ़ भड़का रहा है। वह चीन के आतंरिक मामलों में खुलेआम दख़लंदाज़ी कर रहा है और हांगकांग और शिनजियांग में सरकार-विरोधी ताक़तों को समर्थन दे रहा है।

अमरीका चीन पर कई तरह के प्रतिबंध थोप रहा है और उसकी उच्च टेक्नोलॉजी कंपनियों को निशाना बना रहा है। सुरक्षा के ख़तरे का दावा करते हुए अमरीकी सरकार ने अपने देश में इन कंपनियों के व्यापार पर रोक लगा दी है। वह यूरोप के अपने मित्र देशों, जापान, हिन्दोस्तान और अन्य देशों पर ऐसा ही करने के लिए दबाव डाल रहा है। अमरीका ने चीन पर इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी की चोरी और साइबर जासूसी का आरोप लगाया है। कोरोना वायरस महामारी के बहाने वह दुनियाभर में चीन-विरोधी उन्माद को हवा दे रहा है और चीन पर आरोप लगा रहा है कि उसने जानबूझकर इस वायरस को फैलाया है और इस बारे में जानकारी को छुपाया है।

अमरीका काफी समय से एक लक्ष्य के साथ हिन्दोस्तान को क्वाड में शामिल करने की लगातार कोशिश कर रहा था। वह हिन्दोस्तान की विशाल आबादी और सशस्त्र बलों को चीन के ख़िलाफ़ अपनी जंग में युद्धबलि की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। वह चीन पर दक्षिण दिशा से आक्रमण करने के लिए हिन्दोस्तान की धरती को सैनिकी अड्डे के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है। अपने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अमरीका बड़े ही सुनियोजित तरीक़े से हिन्दोस्तान के हुक्मरान वर्ग को एक बड़ी साम्राज्यवादी ताक़त बनने के मंसूबों को हवा दे रहा है और चीन के ख़िलाफ़ आक्रामक रवैया अपनाने के लिए उकसा रहा है।

हिन्दोस्तान और चीन की बीच सरहद पर हाल में हुए टकराव के संदर्भ में अमरीका ने हिन्दोस्तान को समर्थन देने का ऐलान किया है। अमरीका हिन्दोस्तान से बार-बार कह रहा है कि वह रूस, चीन और हिन्दोस्तान के बीच शंघाई कोऑपरेशन आर्गेनाईजे़शन (एस.सी.ओ.) जैसे बहु-पक्षीय गठबंधनों को छोड़कर, अमरीकी रणनीति के साथ तालमेल बनाये।

अमरीका के उप-विदेश सचिव स्टीफन बिगुन ने अमरीका-हिन्दोस्तान रणनैतिक साझेदारी मंच (यू.एस.-इंडिया स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप फोरम) में 31 अगस्त को हुई एक चर्चा के दौरान कहा, “चीन को टक्कर देने के लक्ष्य से अमरीका हिन्द-प्रशांत महासागर क्षेत्र के देशों – हिन्दोस्तान, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ अपने क़रीबी रिश्तों को एक औपचारिक रूप देना चाहता, जो नार्थ अटलांटिक ट्रीटी आर्गेनाईज़ेशन (नाटो) के तर्ज पर होंगे”। इस सांझेदारी का मक़सद है “चीन से आने वाली संभावित चुनौती के ख़िलाफ़” मिलकर काम करने के लिए इन चार देशों को तैयार करना। नाटो एक अमरीका-नीत सैन्य गठबंधन है जिसके ज़रिये अमरीका पूरे यूरोप पर अपना दबदबा क़ायम किये हुए है। 31 अगस्त को हुई इस चर्चा में विदेश मंत्री ने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया और बिगुन के विचारों का विरोध नहीं किया। इससे यह साफ नज़र आता है कि हिन्दोस्तान की सरकार अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को आगे बढ़ाने की दिशा में चीन की घेराबंदी करने और एशिया पर अपना दबदबा जमाने की अमरीकी रणनीति में सक्रिय रूप से हिस्सा ले रही है।

हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच सैन्य-रणनैतिक सांझेदारी लगातार बढ़ती ही जा रही है। 2016 में अमरीका ने हिन्दोस्तान को अपना “प्रमुख सुरक्षा सांझेदार” होने का दर्ज़ा दिया। हिन्दोस्तान ने अमरीका के साथ कई समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं जिसके तहत अमरीकी सशस्त्र बलों को आराम करने और ईंधन भरने के लिए हिन्दोस्तान के सैन्य अड्डों का इस्तेमाल करने इजाज़त दी गयी है। हिन्दोस्तान और अमरीका अपने सशस्त्र बलों के लिए संचार की एक समान व्यवस्था का इस्तेमाल करने पर सहमत हो गए हैं। जल्दी ही हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच सेटलाइट जानकारी को साझा करने के समझौते पर हस्ताक्षर किये जाने हैं। हिन्दोस्तान ने अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया को इस वर्ष के अंत में होने वाले मालाबार नौसेना अभ्यास में हिस्सा लेने का न्योता दिया है।

हिन्दोस्तान का अमरीका के साथ सैन्य-रणनैतिक गठबंधन और क्वाड में हिस्सा लेना, हिन्दोस्तान और चीन के बीच बढ़ते शक और तनाव का प्रमुख कारण है। यह इन दोनों देशों के बीच जंग के हालात पैदा कर रहा है। 2008 में क्वाड की स्थापना के एक ही साल बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ऐलान किया था कि हिन्दोस्तान चीन के साथ अपने संबंधों को प्राथमिकता देता है और वह “चीन पर नकेल कसने” की किसी भी रणनीति का हिस्सा नहीं बनेगा। इस वजह से चीन के साथ हिन्दोस्तान के रिश्तों में सुधार आया था। लेकिन अमरीका लगातार यह कोशिश करता रहा है कि हिन्दोस्तान अपनी रणनीति को अमरीकी रणनीति के साथ तालमेल करते हुए चलाये। अपने इस मक़सद में वह हिन्दोस्तान को चीन के ख़िलाफ़ उकसाता रहा है। 2017 में हिन्दोस्तान, चीन और भूटान की सरहदों पर डोकलाम में जो टकराव हुआ था, वह अमरीका की इन्हीं कोशिशों का नतीजा था। हिन्दोस्तान-अमरीकी गठबंधन के समर्थकों ने इस घटना को अमरीका के साथ गठबंधन को मजबूत करने ज़रूरत के लिए तर्क़ के रूप में पेश किया। 2017 में क्वाड को पुनर्जीवित किया गया और क़रीब एक दशक बाद हिन्दोस्तान इसमें वापस शामिल हो गया।

इस समय लद्दाख में सरहद पर हुए टकराव की वजह से हिन्दोस्तान और चीन के बीच संबंध बेहद तनावपूर्ण हैं। सितम्बर की शुरुआत में दोनों देशों के विदेश मंत्री रूस में मिले और इस तनाव को कम करने के लिए क़दम उठाने को सहमत हो गए। हिन्दोस्तान में ऐसी ताक़तें हैं जो यह तर्क़ दे रही हैं कि चीन की घेराबंदी करने में अमरीका का साथ देने में हिन्दोस्तान का हित है। लेकिन यह गलत है। वे अमरीकी साम्राज्यवाद की चाल में फंस रहे हैं।

हिन्दोस्तान और चीन के बीच टकराव दोनों ही देशों के हित में नहीं है। अमरीकी साम्राज्यवाद एशिया की इन दो बड़ी ताक़तों, हिन्दोस्तान और चीन के बीच हुये टकराव की आग को हवा दे रहा है, ताकि इन दोनों को ही कमजोर बनाया जा सके और पूरे एशिया पर अपने दबदबे को क़ायम करने का रास्ता खोला जा सके। क्वाड और अमरीका के साथ सैन्य-रणनैतिक गठबंधन में हिन्दोस्तान का शामिल होना एशिया में टकराव को बढ़ावा देगा। यह युद्ध का एक कारक है।

पूरे एशिया पर अपना दबदबा जमाने की अमरीकी साम्राज्यवाद की कोशिश ही एशिया प्रशांत महासागर क्षेत्र में बढ़ते तनाव का प्रमुख कारण है। इतिहास का हमारा अनुभव यही दिखाता है कि अमरीका कभी भी किसी भी देश का भरोसेमंद साथी नहीं रहा है। अमरीकी साम्राज्यवादी अपने खुदगर्ज़ हितों के आधार पर गठबंधन बनाते हैं और तोड़ते हैं। वे किसी भी देश का केवल तब तक साथ देते हैं जब तक दुनिया पर अपना प्रभुत्व जमाने के लिए उनकी ज़रूरत है। एक बार उनका मतलब पूरा हो गया तो उस देश को पूरी तरह से बर्बाद करने में उन्हें कोई झिझक नहीं होती है, जिसके साथ उन्होंने गठबंधन बनाया था।

हिन्दोस्तान को अमरीकी साम्राज्यवाद के जाल में नहीं फंसना चाहिए। हिन्दोस्तान को अमरीका-नीत किसी भी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनने से इंकार करना चाहिए।

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