“निजीकरण के खिलाफ एकता” श्रृंखला की दूसरी मीटिंग का सफल आयोजन!!

विषय : “भारतीय रेलवे के निजीकरण का विरोध करें”

कामगार एकता कमेटी द्वारा 21 सितंबर, 2020 को आयोजित बैठक

कामगार एकता कमेटी (केईसी) द्वारा “निजीकरण के खिलाफ एकता” श्रृंखला की दूसरी बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक के आयोजन का प्रचार व्यापक रूप से भारतीय रेलवे के मज़दूर नेताओं और सक्रिय कार्यकर्ताओं के साथ-साथ अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में भी किया गया था। देश भर के 320 से अधिक सक्रिय कार्यकर्ताओं ने शानदार सौहार्द-पूर्ण माहौल में इसमें भाग लिया। इसमें विभिन्न श्रेणियों के रेलवे कर्मचारी और उनके प्रतिनिधियों जैसे लोको पायलट, गार्ड, स्टेशन मास्टर्स, ट्रैक मेंटेनर्स, ट्रेन कंट्रोलर, सिग्नल एंड टेलीकम्युनिकेशन स्टाफ, टिकट चेकिंग स्टाफ और रेलवे वर्कशॉप स्टाफ ने भाग लिया। इसके अलावा बीपीसीएल, एचपीसीएल, ओएनजीसी, एयर इंडिया, एलआईसी, पोस्ट एंड टेलीकॉम, बैंकों के साथ-साथ स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े सक्रिय कार्यकर्ताओं और उनके प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। इस आयोजन ने इतनी उमंग और उत्साह पैदा किया कि एक रेल मज़दूर ने, कोविद से पीड़ित होने के बावजूद, अपने अस्पताल के बिस्तर से इस सभा में भाग लिया।

केईसी के सचिव का. मैथ्यू ने सहभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि भारतीय रेलवे के कार्यकर्ता इस महामारी से उत्पन्न कठिन परिस्थिति में  भी कड़ी मेहनत के साथ कार्य कर रहे हैं। वे सुनिश्चित कर रहे हैं कि भोजन, दवाइयां, तेल और अन्य आवश्यक चीजें हमारे देश के सभी स्थानों में शीघ्रता से पहुंचे। 13 लाख रेलवे मज़दूरों में से, 14,000 से अधिक कोविद से संक्रमित हुए और 360 से अधिक की मृत्यु हो गई। कोविद से पीड़ितों और उससे मरने वालों की दर भी अखिल भारतीय आंकड़ों की तुलना में अधिक थी। उन्होंने निजीकरण के खिलाफ़ सभी हिन्दोस्तानियों को एकजुट होने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने बैंक मज़दूरों की निजीकरण के खिलाफ़ साहसी विरोध की भी सराहना की और कहा कि हम सभी ने पर्चे और वीडियो प्रसारित कर आम जनता को बैंक निजीकरण की हानियों से अवगत कराने में उनकी मदद की।

केईसी के का. अशोक कुमार द्वारा किए गये बहुत ही रोचक प्रस्तुति के पश्चात, बड़ी संख्या में भारतीय रेलवे के श्रेणी संघों के वक्ताओं से अपने विचार व्यक्त करने को कहा गया। इनमें शामिल थे नागपुर से ए.आई.एल.आर.एस.ए (ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन) के महासचिव का. एम.एन. प्रसाद, विजयवाड़ा से का. एस.पी.सिंह, ए.आई.जी.सी. (ऑल इंडिया गार्ड्स काउंसिल) के महासचिव, ए.आई.एस.एम.ए (ऑल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एसोसिएशन) के राष्ट्रीय सलाहकार, चेन्नई से का. जॉन विंसेंट, का. विजय तारा, महासचिव, ए.आई.टी.सी.ए (ऑल इंडिया ट्रेन कंट्रोलर्स एसोसिएशन), का. ए.सी. प्रकाश, महासचिव, आई.आर.एस एंड टी.ए.एम.यू (भारतीय रेलवे सिग्नल एंड टेलीकम्युनिकेशन मेनटेनर्स यूनियन), अहमदाबाद से, का. एन.पंचाल, अध्यक्ष, ए.आर.टी.यू  (अखिल भारतीय रेलवे ट्रैक मेंटेनर्स यूनियन), भोपाल से का. हेमंत सोनी, महासचिव, आई.आर.टी.सी.ओ. (भारतीय रेलवे टिकट जाँच कर्मचारी संगठन) और मुंबई से का. ए.के. श्रीवास्तव, मंडलीय सचिव, पश्चिम रेलवे, ए.आई.आर.ई.सी. (अखिल भारतीय रेलवे कर्मचारी परिसंघ)। बड़ी संख्या में सीजीपीआई (कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी ऑफ इंडिया) के प्रतिनिधियों और अन्य संगठनों के सक्रिय कार्यकर्ताओं ने उपयोगी विचार रखे।

विभिन्य वक्ताओं के विचारों तथा प्रस्तुति से बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे सामने आए।

उदारीकरण और निजीकरण के माध्यम से वैश्वीकरण की नई आर्थिक नीति जो 1991 में कांग्रेस द्वारा शुरू की गई थी, तब से हर सरकार द्वारा इसका पालन किया जाता रहा है। यह हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदारों का कार्यक्रम है, जो प्रत्येक वस्तु और हर मानव को लाभ के स्रोत के रूप में देखता है। पूंजीवाद के स्वभाव के फलस्वरूप वे बार-बार आने वाले संकट से बाहर आने के लिए, लाभ के नए रास्ते तलाशते रहते हैं। आम जनता के धन से निर्मित सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्ति को सस्ती कीमतों पर हासिल करना उनके लिए बेहद लाभदायक है।

2001 में राकेश मोहन कमेटी ने भारतीय रेलवे के महत्वपूर्ण छेत्रों के निजीकरण की प्रक्रिया को शुरू करने की सिफारिश की थी। विभिन्न कमेटियों के सुझावों के अनुसार, निजीकरण की दिशा में, एक के बाद एक कई कदम उठाए गए और आखिर कर 2014 में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष-विदेशी-निवेश की अनुमति दे दी गई और इसके पश्चात देबरॉय कमेटी ने पूर्ण निजीकरण की वकालत की। 2019 में, नव-निर्वाचित एन.डी.ए. सरकार ने 100 दिवसीय कार्य योजना की घोषणा की। देश भर के मज़दूरों के विरोध के कारण इस योजना को 100 दिनों में लागू नहीं किया जा सका, लेकिन संकट टला नहीं है।

हाल के वर्षों में कई स्टेशनों का पहले ही निजीकरण हो चुका है, और 2 तेजस (निजी) ट्रेनों की शुरुआत 2019 में हो गयी। सबसे लाभदायक 109 मार्गों पर 150 निजी गाड़ियों को चलाने तथा 50 और स्टेशनों के निजीकरण की योजना है। इन नये मालिकों को, नई दिल्ली स्टेशन के 5 लाख वर्ग मीटर के क्षेत्र का विकास कर निजी लाभ का अवसर मिलेगा और इसके चारों तरफ के अन्य 2.6 लाख वर्ग मीटर क्षेत्र का व्यावसायिक उद्देश्यों का इस्तेमाल करके निजी मुनाफा कमाने का भी। इसी तरह, मुंबई के प्रमुख स्टेशन, सी. एस.एम.टी. का भी पुनर्विकास होगा। नये मालिकों को 2.5 लाख वर्ग मीटर का क्षेत्र साठ वर्षों के निजी उपयोग के लिए सौंप दिया जाएगा।

अगले वित्तीय वर्ष में रेलवे की उत्पादन इकाइयों के निगमीकरण की प्रक्रिया को शुरू करने का भी प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए वर्तमान सात कोच उत्पादन इकाइयों को एक निगम में विलय किया जाना है, जिसे भारतीय रेलवे रोलिंग स्टॉक का नाम दिया गया है।

स्वतंत्रता के बाद, हिन्दोस्तानी शासक वर्ग ने उस समय की सरकार से अपनी आवश्यकताओं के अनुसार राष्ट्रीयकरण और निजीकरण को लागू करवाया है। आज़ादी के बाद विभिन्न रियासतों की 32 निजी रेलवे को कब्जे में ले लिया गया था। आज केवल भारतीय रेलवे के सबसे लाभदायक हिस्सों का निजीकरण किया जा रहा है। दूसरी तरफ  नुकसान में चल रही मुंबई मेट्रो को सार्वजनिक क्षेत्र को सौंप देने की भी योजना है।

भारतीय रेलवे के मज़दूरों के एक चैथाई, करीब 4 लाख पहले से ही निजी ठेकेदारों के लिए न्यूनतम मज़दूरी, असुरक्षित हालात, आरक्षित नौकरी तथा बिना किसी सुविधा व लाभ के कार्यरत हैं। लगभग 12 लाख मज़दूर अभी भी भारतीय रेलवे के लिए काम कर रहे हैं। इन कार्यरत श्रमिकों की संयुक्त ताकत बहुत शक्तिशाली है और वे सबसे महत्वपूर्ण व “आवश्यक” सेवाओं में से एक में काम करते हैं। यदि वे निजीकरण के प्रतिकूल प्रभावों को रेलवे यात्रियों को स्पष्ट कर अपने साथ जोड़ सकें तो उनकी ताकत में कई गुना इजाफा होगा। (नीचे दिया गया बॉक्स देखें)

रेल यात्रियों और अन्य मज़दूरों पर रेल निजीकरण का प्रभाव

  • किरायों में भारी वृद्धि
  • डायनामिक किराया नीति – मांग अधिक तो किराया अधिक
  • कोई सीजन टिकट नहीं (मेट्रो सेवाओं में पहले से ही नहीं)
  • वर्तमान में छात्रों, वृद्धों तथा अलग-अलग तबकों के लोगों को दी जाने वाली रियायत निरस्त
  • पानी, शौचालय, बिस्तर रोल आदि जैसी हर सेवा के लिए भुगतान करना होगा
  • गैर-लाभकारी मार्गों और गैर-पीक घंटों के दौरान सीमित सेवाएं
  • खर्च में कटौती के कारण न्यूनतम रख-रखाव पर खर्च जिससे यात्रियों की सुरक्षा से समझौता

भारतीय रेलवे लोगों की संपत्ति है। इसकी करीब 6 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति का निर्माण, 165 से अधिक वर्षों के दौरान जनता के धन व लाखों रेल मज़दूरों के कठिन परिश्रम से किया गया है! सुरक्षित सस्ती रेल यात्रा प्रदान करना सरकार के मूल कर्तव्यों में से एक है और उसे निजी लाभ के लिए सौंपने का कोई अधिकार नहीं है। यही हाल अन्य सेवाओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, पाइप के जरिये पानी, बिजली, इत्यादी है। आवश्यक सेवाओं का निजीकरण कर करोड़ों लोगों को इन सेवाओं से वंचित करना पूरी तरह से समाज-विरोधी है।

रेलवे का रणनैतिक महत्व है और वास्तव में वह देश की जीवन रेखा है। इसमें 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष-विदेशी-निवेश की अनुमति देना निहायत देश-विरोधी कदम है!

इस प्रकार, भारतीय रेलवे का निजीकरण पूरे हिन्दोस्तानी मज़दूर वर्ग के साथ-साथ सभी कामकाजी लोगों पर भी हमला है!

गत वर्ष मज़दूर अपने परिवारों के सहयोग से भारतीय रेलवे की सात उत्पादन इकाइयों के साथ-साथ आयुध कारखानों के भी निगमीकरण को रोकने में कामयाब रहे। निजीकरण को पुर्णतः उलटा भी जा सकता है, जैसा कि ब्रिटेन, अर्जेंटीना और हाल ही में मलेशिया के कुआलालंपुर में रेलवे के मामले में हुआ है।

अधिकांश वक्ताओं ने सहमति व्यक्त की कि हमें हिन्दोस्तान के नवनिर्माण की दिशा में अग्रसर होना होगा, जहां लोगों को अर्थव्यवस्था की दिशा पूंजीपतियों के लालच पूरे करने से बदल कर उनकी जरूरतों को पूरा करने की तरफ उन्मुख करने की ताकत होगी!!

सभी ने सहमति व्यक्त की कि भारतीय रेलवे के निजीकरण के खिलाफ़ संघर्ष सभी सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों और आवश्यक सेवाओं के निजीकरण के खिलाफ संघर्ष का ही एक भाग है। हमें “एक पर हमला सभी पर हमला है” कि भावना से एक दूसरे का समर्थन करना है।

खण्ड और शाखा स्तर पर एकता और विभिन्न क्षेत्रों के साथ एकता निर्माण की कार्य योजना बनाई गई। निजीकरण के खिलाफ़ एक विस्तृत मोर्चा बनाना होगा, और इस दिशा में नागरिकों को निजीकरण के विनाशकारी परिणामों से अवगत कराने के लिए उनके बीच एक अभियान चलाने का निर्णय लिया गया।

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