“सबको शिक्षा क्यों नहीं एक समान?” विषय पर वेब मीटिंग

मज़दूर एकता कमेटी ने “सबको शिक्षा क्यों नहीं एक समान?” इस विषय पर एक विचारोत्तेजक वेब मीटिंग का आयोजन किया। इस वेब सभा की अध्यक्षता बिरजू नायक ने की और संतोष कुमार ने इस विषय पर एक प्रस्तुति पेश की। देशभर के अलग-अलग हिस्सों से लोगों ने इस सभा में हिस्सा लिया।

इस प्रस्तुति में हमारे समाज में सभी के लिए एक समान गुणवत्ता की शिक्षा क्यों उपलब्ध नहीं की गयी है, इस महत्वपूर्ण विषय पर बात रखी गयी। संतोष कुमार ने तर्कों के साथ बताया कि हमारे देश के स्कूलों में ऊंच-नीच की प्रथा को जाति और वर्ग के आधार पर भेदभाव को बनाये रखने के लिए जारी रखा गया है।

वेब सभा में हिस्सा ले रहे सभी लोगों ने माना कि इस विषय को उठाना वक्त की मांग है। यह हमारे समाज के अधिकांश लोगों की चिंता का विषय है कि क्या उनके बच्चे अच्छी शिक्षा पा सकेंगे और एक उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद रख सकते हैं? प्रस्तुति के बाद कई प्रतिभागियों ने अपनी बात रखी। अपने इन हस्तक्षेपों में उन्होंने निम्नलिखित बिंदुओं को उजागर किया –

पिछले कई दशकों से सरकार ने शिक्षा नीति निर्धारित करने के लिए समितियों का गठन करती आयी है। लेकिन इसके बावजूद ज़मीनी हक़ीक़त में कोई भी बदलाव नहीं आया है। इससे एक सवाल उठता है कि “सबको शिक्षा क्यों नहीं एक समान?”

हमारे देश के हुक्मरान नहीं मानते हैं कि शिक्षा एक बुनियादी अधिकार है। यदि वे इसे अधिकार मानते तो फिर एक सफाई मज़दूर के बेटा या बेटी हो, किसी डॉक्टर या वकील का बेटा या बेटी हो, दोनों को ही समान दर्ज़े की शिक्षा मिलती। यदि सभी के लिए अच्छी शिक्षा अधिकार बतौर देनी है तो फिर हमारे देश में एक समान स्कूली व्यवस्था होना जरूरी है।

अच्छी शिक्षा के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की ज़रूरत है, जिनके रोज़गार सुरक्षित हों। तभी कोई शिक्षक अच्छी शिक्षा देने के लिए दिल और दिमाग लगाएगा। देशभर में कई स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है। अधिकांश शिक्षकों को “अतिथि शिक्षक” के पद पर रखा जाता है, जिन्हें नियमित शिक्षकों की तुलना में आधे से भी कम वेतन दिया जाता है। तमाम सरकारें प्रशिक्षित शिक्षकों की भर्ती नहीं करती हैं, इससे यही साबित होता है कि सभी बच्चों के लिए अच्छे दर्जे की शिक्षा देने में सरकार की कोई दिलचस्पी नहीं है।

अक्सर यह सुनने में आता है कि सरकार स्कूलों को इसलिए बंद कर रही है क्योंकि उन स्कूलों में छात्रों की भर्ती कम हो रही है। यदि हम स्कूल में छात्रों की कम भर्ती के कारणों को देखेंगे तो पता चलेगा कि इसकी मुख्य वजह स्कूल की खस्ता हालत और सुविधाओं की कमी है। लेकिन इन सुविधाओं को बेहतर करने और स्कूल में भर्ती को आसान बनाने के बजाय सरकार इन स्कूलों को बंद कर रही है और लाखों हजारों बच्चों को अच्छी स्कूली शिक्षा के अधिकार से वंचित कर रही है।

कुछ देशों में एक कक्षा में केवल 15 बच्चों को पढ़ाया जाता है, जबकि हमारे देश में एक कक्षा में 100 बच्चों को ठूंसकर पढ़ाया जाता है। कई ऐसे स्कूल हैं जहां चार-चार शिक्षक एक ही कमरे में चार कक्षाओं के छात्रों को पढ़ाने को मजबूर हैं। कई ऐसे स्कूल भी हैं जहां एक ही शिक्षक स्कूल की सभी कक्षाओं के छात्रों को एक साथ पढ़ाने को मजबूर है। ऐसी हालत में किस तरह से छात्र स्कूल में जाने के लिए प्रेरित होंगे?

स्कूल में दाखिले के समय बच्चों को अपने परिवार, जाति, क्षेत्र, इत्यादि के बारे में जानकारी देने के लिए क्यों कहा जाता है? यह पूरी व्यवस्था लोगों के बीच बंटवारा और भेदभाव करने के लिए बनायी गयी है, न कि जाति, धर्म और अन्य भेदों से ऊपर उठकर अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा देने के लिए।

वेब सभा में शामिल एक प्रतिभागी ने बताया कि हुक्मरान वर्ग के राजनेता एक तरफ सरकारी स्कूलों में अच्छी शिक्षा देने की बात करते है और दूसरी ओर खुद अपने निजी स्कूल चलाकर मेहनतकश परिवारों से भारी फीस वसूलते हैं। इसका मतलब यही है कि वे इस बात पर विश्वास करते हैं कि विभिन्न तबकों के लोगों के लिए भिन्न-स्तर की शिक्षा होनी चाहिए। हम सभी को समान शिक्षा व्यवस्था के लिए संघर्ष करना चाहिए।

हमारे देश के हुक्मरान दिखावा करते हैं कि वे सभी के लिए अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराना चाहते हैं। लेकिन वे जानते हैं कि यदि ऐसा हो तो कम वेतन पर कौन उनकी चाकरी करेगा। इसलिए अलग-अलग स्तर की शिक्षा रखने की हुक्मरान वर्ग की एक सोची-समझी योजना है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मज़दूरों और मेहनतकशों के बच्चे पीछे रह जाएं।

सभी के लिए अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान करने का सरकार का कोई इरादा नहीं है। हमारे देश के हुक्मरान चाहते हैं कि मज़दूर वर्ग और किसानों के बच्चे अशिक्षित बने रहें। वे नहीं चाहते हैं कि ये बच्चे पढ़-लिखकर जागरुक हो जायें और अपने अधिकारों की मांग करने लगें। हुक्मरान चाहते हैं कि ये बच्चे अज्ञानी बने रहें और यह मानते रहें कि उनकी आज की हालत उनके पिछले जन्मों का फल है।

वेब सभा के अंत में बिरजू नायक ने सभी को धन्यवाद देते हुए कहा कि राज्य को सभी को एक समान गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान करने की ज़िम्मेदारी लेनी ही होगी। जब तक शिक्षा के क्षेत्र में निजी पूंजीवादी मुनाफ़ा हावी रहेगा, यह संभव नहीं है। “सबको शिक्षा क्यों नहीं एक समान?” इस सवाल को हमें बार-बार उठाना होगा और इसपर चर्चा करनी होगी ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इस हक़ीक़त को समझें। हम सभी को इस गैर-बराबर शिक्षा व्यवस्था के खि़लाफ़ एकजुट होकर संघर्ष करना होगा, ताकि सभी के लिए अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा की गारंटी एक अधिकार बतौर दी जा सके।

मीटिंग में पेश की गई पूरी प्रस्तुति को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :  सबको शिक्षा क्यों नहीं एक समान?

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