साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ वियतनामी लोगों की जीत आज भी लोगों को प्रेरणा देती है

इस वर्ष वियतनामी लोगों के देशभक्त आंदोलन की अमरीकी साम्राज्यवाद की हमलावर सेना के ख़िलाफ़ जीत की 45वीं सालगिरह है। अमरीकी साम्राज्यवाद ने इस देश पर 15 वर्षों के लिए कब्ज़ा जमाये रखा था और बर्बरता का ऐसा खेल खेला जिसकी मिसाल दुनियाभर में कहीं नहीं मिलेगी। वियतनाम के कम्युनिस्टों और उनके नेता हो ची मिंह ने इस देशभक्त आंदोलन को अगुवाई दी थी। अमरीकी साम्राज्यवाद पर वियतनामी लोगों की यह दूसरी सबसे बड़ी जीत थी। इससे पहले द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर 2 सितम्बर, 1945 को उन्होंने अपनी राष्ट्रीय आज़ादी का ऐलान किया था।

बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को मुहतोड़ जवाब देता वियतनामी लोगों का यह अनवरत और सफल संघर्ष, जो उन्होंने अपनी राष्ट्रीय मुक्ति के लिए सबसे पहले फ्रांसीसी बस्तीवाद और बाद में अमरीकी साम्राज्यवादियों के ख़िलाफ़ चलाया था, दुनियाभर के उन सभी संघर्षों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन गया है, जो सामाजिक और राष्ट्रीय मुक्ति के लिए संघर्ष करते आ रहे हैं। इस अवसर पर हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी वियतनामी लोगों और कम्युनिस्टों की दिलेरी को सलाम करती है, जिन्होंने इस जंग की सफलता में अगुवाई दी।

फ्रांसीसी बस्तीवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष

1858 से एक फ्रांसीसी उपनिवेश बतौर वियतनाम का बेलगाम शोषण किया गया। वियतनाम के लोगों ने कई बगावतों के ज़रिये इस विदेशी कब्ज़े का जबरदस्त विरोध किया। कम्युनिज़्म से प्रेरित क्रांतिकारियों ने वियतनामी लोगों के बस्तीवाद-विरोधी मुक्ति संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब फ्रांस पर जर्मनी ने कब्ज़ा कर लिया, तब 1940 से वियतनाम जापान के वर्चस्व के अधीन हो गया। अगस्त 1945 में जब द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार हो गयी, तो वियतनाम में लोकप्रिय बगावत आयोजित की गयी जिसे “अगस्त क्रांति” के नाम से जाना जाता है। वियतनाम के राष्ट्रपति हो ची मिंह ने आज़ादी का ऐलान करते हुए 2 सितम्बर, 1945 को नए जनवादी प्रजातांत्रिक वियतनाम की स्थापना की और हनोई को इसकी राजधानी घोषित कर दिया। लेकिन एंग्लो- अमरीकी साम्राज्यवादियों ने तुरंत इसका विरोध किया। सितम्बर 1945 को फ्रांसीसी सैन्य टुकड़ियों के साथ बर्तानवी सैन्य टुकड़ियों ने साइगॉन में कदम रखा और फ्रांस को वियतनाम के दक्षिणी हिस्से पर फिर से कब्ज़ा करने में मदद की। साम्राज्यवादियों ने 17 पैरेलल (समानांतर रेखा) पर वियतनाम को दो टुकड़ों में बांट दिया। देश के उत्तर में बसे जनवादी प्रजातांत्रिक वियतनाम ने फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों के ख़िलाफ़ जंग लड़ी, जिसे प्रथम इंडो-चीन युद्ध के नाम से जाना जाता है। यह जंग 20 अगस्त, 1954 तक जारी रही। इस जंग में फ्रांस को जो पैसा चाहिए था, उसका अधिकांश हिस्सा अमरीकी साम्राज्यवादियों ने दिया। इस जंग की आखिरी लड़ाई दिएन बिएन फु में लड़ी गयी, जिसमें फ्रांस के साथ-साथ उसका समर्थन कर रहे एंग्लो-अमरीकी साम्राज्यवादियों की बुरी तरह से हार हुई। इसके बाद 1954 में हुई जिनेवा कांफ्रेंस ने वियतनाम में फ्रांस की बस्तीवादी मौजूदगी को खत्म कर दिया।

अमरीकी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष

लेकिन उसके तुरंत बाद नवंबर 1955 में वियतनाम हाल के इतिहास में चले सबसे लंबे, खूंखार और विध्वंसकारी युद्ध का अखाड़ा बन गया। वैसे तो आधिकारिक रूप से यह “द्वितीय इंडो-चीन युद्ध” उत्तर और दक्षिण वियतनाम के बीच हुआ था, लेकिन असलियत में यह जंग अमरीकी साम्राज्यवाद ने चलायी थी, ताकि दुनियाभर में कम्युनिज़्म के प्रसार को रोका जा सके और अपना दबदबा बढ़ाया जा सके। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने वियतनाम में हजारों फौजी सलाहकार तैनात किए। 1959 में करीब एक हज़ार सलाहकार से बढ़ते हुए 1964 तक 64,000 ऐसे सलाहकार तैनात किये गए। इसके बाद इस जंग में अमरीका की भूमिका बढ़ती ही गयी और इस दौरान उसने करीब 2 लाख सैनिक तैनात किए।

अमरीकी साम्राज्यवाद और वियतनाम में उसके पिट्ठुओं के भारी हमले के जवाब में वियतनाम के राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चे (विएत कांग) ने दक्षिण वियतनाम में गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया।

1965 से अमरीका ने विएत कांग और उनके साथियों में दहशत फैलाने और उनको घुटनों पर लाने के लिए पूरे वियतनाम में भारी बमबारी शुरू की। अमरीका का ऑपरेशन रोलिंग थंडर हमला और भी तीव्र होता गया। उत्तर वियतनाम के हौसले को तोड़ने के लिए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने उनके औद्योगिक केन्द्रों, यातायात के साधनों और हवाई सुरक्षा साधनों पर हमले शुरू कर दिए। इस दौरान 10 लाख हवाई हमले किये गए, जिसमें 7.5 लाख टन बम गिराए गए। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने जंग के क्षेत्र को बढ़ाते हुए कंबोडिया (अब कंपूचिया) और लाओस को भी इन हमलों में शामिल कर दिया। इस पूरे युद्ध के दौरान अमरीकी सेना ने 70 लाख टन बम गिराए, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पूरे यूरोप और एशिया में 21 लाख टन बम गिराए गए थे और वियतनाम में यह आंकड़ा उससे तीन गुना से भी अधिक था! इस युद्ध में नापेम, वाइट फॉस्फोरस और अन्य रासायनिक हथियार और क्लस्टर बम इस्तेमाल किये गए जो हजारों-लाखों लोगों को बड़े पैमाने पर मार डालने और सदा के लिए घायल करने के लिए बनाये गए थे।

अमरीका ने 45 लाख एकड़ ज़मीन पर एक बेहद ख़तरनाक रसायन एजेंट ऑरेंज का छिड़काव किया, जिससे तमाम जंगल और वनस्पति को नष्ट किया जा सके और देशभक्त सेना को जंगल की सुरक्षा और खाद्य संसाधनों से वंचित किया जा सके। इस रसायन के छिड़काव से कई लोगों में कैंसर और अन्य अनुवांशिक विकृतियां पैदा हो गयीं, पर्यावरण पर भयानक परिणाम हुए, जिसका असर आज तक जारी है। लेकिन साम्राज्यवादियों की इन तमाम ख़तरनाक करतूतों के बावजूद देशभक्त ताक़तों का हौसला टूटा नहीं, उनका संघर्ष जारी रहा और अंत में उन्होंने अमरीकी साम्राज्यवादियों को अपने देश से खदेड़ कर बाहर कर दिया।

उस युद्ध के दौरान अमरीकी साम्राज्यवादियों ने जो अत्याचार किये उससे दुनियाभर के सभ्य लोग दंग रह गए। अत्याचारों के इस सिलसिले में सबसे कुख्यात हमला 16 मार्च 1968 में माय लाई हुआ था जहां 500 से अधिक सामान्य निहत्थे नागरिकों को मार डाला गया। सैकड़ों महिलाओं का सामूहिक-बलात्कार किया गया और उनके शरीर को विकृत किया गया, जिसमें 12 वर्ष से भी कम उम्र के बच्चे भी शामिल हैं। मानवता के ख़िलाफ़ इन तमाम गुनाहों के लिए सिर्फ एक अमरीकी सैनिक को सज़ा दी गयी। इस कत्लेआम को रोकने और घायलों बचाने की कोशिश करने वाले अमरीकी सैनिकों से अमरीकी सरकार ने किनारा कर लिया और यहां तक कि उनको देशद्रोही करार दिया।

जंग-विरोधी आंदोलन और वियतनाम के लोगों की जीत

अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अपने देश के नौजवानों को हजारों मील दूर अन्य देशों पर नाजायज़ युद्ध में हिस्सा लेने के लिए सेना में जबरन शामिल किया। वियतनाम युद्ध में जिन 60,000 अमरीकी सैनिकों की मौत हुई उनकी औसतन आयु केवल 22.8 वर्ष थी। इन सभी कारणों से अमरीका में एक व्यापक और मजबूत युद्ध-विरोधी आंदोलन उभर कर आया। 1962 से 1975 के बीच हुये युद्ध के अंत तक अमरीका में चारों तरफ लाखों करोड़ों युवा, छात्र और मेहनतकश लोग संगठित हुए और उन्होंने अमरीकी सरकार के इस नाजायज़ युद्ध में शामिल होने का जोरदार विरोध किया। कई सैनिक जो इस युद्ध में लड़े थे और जिन्होंने उसके भयावह रूप को अपनी आंखों से देखा था, उन्होंने भी देश वापस लौटने पर इस युद्ध के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई।

इन सब बातों का अमरीकी सेना के मनोबल पर भयानक असर हुआ। मार्च 1975 को वियतनामी देशभक्त शक्तियों ने कब्ज़ाकारी ताक़तों पर अपना अंतिम हमला शुरू किया। इस हमले में 30 अप्रैल, 1975 को वियतनाम में अमरीकियों का अंतिम किला साइगॉन (जो अभी हो ची मिंह सिटी नाम से जाना जाता है) भी गिर गया। वियतनामी लोगों के लिए यह एक महान जीत थी और दुनियाभर के आज़ादी-पसंद लोगों ने इसका जश्न मनाया।

आज जब अमरीकी साम्राज्यवाद दुनिया में शांति और लोगों की आज़ादी के लिए सबसे बड़ा ख़तरा पेश करता आ रहा है, यह लाज़मी है कि हिन्दोस्तान और दुनिया में हर एक देश के लोग वियतनामी लोगों के इस अथक संघर्ष से प्रेरणा लें और अमरीकी साम्राज्यवाद और उसके मित्र देशों का मुक़ाबला करने के अपने इरादे मजबूत करें। अमरीकी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ बहादुर वियतनामी लोगों के संघर्ष को कभी भी भुलाया नहीं जायेगा।

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