द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 75वीं वर्षगांठ पर

भाग 4 : द्वितीय विश्व युद्ध की प्रमुख लड़ाइयां

द्वितीय विश्व युद्ध में स्तालिनग्राद की लड़ाई सबसे निर्णायक मोड़ थी। स्तालिनग्राद के लोगों ने हर गली, हर घर और अपने शहर की एक-एक इंच ज़मीन को बचाने के लिए जंग लड़ी। कई महीनों तक चली इस बेहद कठिन जंग में जर्मन सेना की हार हुई, जिसे अभी तक अजेय माना जा रहा था। जर्मनी की सेना पूरी तरह से नष्ट हो गयी और आत्मसमर्पण के लिए मजबूर हो गयी।

हालांकि ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी को पूर्व दिशा में जाने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन पोलैंड पर कब्ज़ा जमाने के बाद जर्मनी ने अपना रुख पश्चिम की ओर कर लिया। अप्रैल से जून 1940 के बीच नाज़ियों ने डेनमार्क, नॉर्वे, हॉलैंड, लक्सेम्बर्ग और बेल्जियम पर कब्ज़ा जमा लिया। एक प्रमुख जीत के रूप में उन्होंने इसी जून के महीने में फ्रांस को हरा कर अगले चार साल तक उसपर अपना कब्ज़ा बनाये रखा। वे ब्रिटेन पर भी हमला करने जा रहे थे और इस द्वीप पर भारी हवाई बमबारी शुरू कर दी थी। जब यूरोप में उसके सारे मित्र देश करीब-करीब हार चुके थे, उस समय भी अमरीका उनको केवल नैतिक और कुछ भौतिक समर्थन ही देता रहा, लेकिन जंग में शामिल नहीं हुआ।

लेकिन नाज़ी जर्मनी की नज़र ख़ास तौर से सोवियत संघ के विशाल इलाके और उसके समृद्ध संसाधनों पर लगी हुई थी। अगले वर्ष उसने अपना पूरा जोर पूर्व दिशा की ओर लगा दिया। 22 जून, 1941 को जर्मनी ने सोवियत संघ पर भारी हमला शुरू कर दिया। जर्मनी, इटली, रोमानिया, हंगरी और फिनलैंड की संयुक्त सेना में 30 लाख सिपाही थे। वे उम्मीद कर रहे थे कि इतनी बड़ी सेना के आक्रमण के सामने सोवियत संघ जल्द ही घुटने टेक देगा, जैसा कि फ्रांस के साथ हुआ था। लेकिन उनकी योजना धरी की धरी रह गयी।

यूरोप में जंग शुरू होने से पहले ही 1937 में जापान ने चीन पर हमला किया और तेज़ी से चीन के सबसे विकसित और सबसे बड़ी आबादी वाले इलाके पूर्वी और मध्य चीन पर कब्ज़ा कर लिया। हालांकि इस जंग में चीन के 3 करोड़ लोग मारे गए और 10 करोड़ लोग शरणार्थी बन गए, चीन की सरकार और वहां के लोगों ने कभी भी आत्मसमर्पण नहीं किया। 8 साल तक चीन के लोग एक संयुक्त मोर्चे के तहत बहादुरी के साथ इस जंग में डटे रहे जिसमें चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने अहम भूमिका निभाई। उसके प्रतिरोध की वजह से लाखों जापानी सैनिक यहां पर फंस कर रह गए।

सितम्बर 1940 में जापान ने फ्रेन्च  इंडोचाइना में घुस कर कब्ज़ा जमा लिया, जिसमें उस समय के वियतनाम, कंबोडिया और लाओस के फ्रांसीसी उपनिवेश थे। 8 दिसंबर, 1941 को जापान ने बर्तानवी उपनिवेश, मलया पर हमला कर दिया और सिंगापुर पर बमबारी शुरू कर दी। उसी दिन अमरीकी उपनिवेश फिलीपींस पर भी हमला करके कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद जनवरी 1942 में बर्तानवी उपनिवेश, बर्मा पर हमला किया। आगे बढ़ती जापानी सेना के सामने बर्तानवी फौज ने 15 फरवरी, 1942 को घुटने टेक दिये। अप्रैल 1942 में जापानी सेना ने डच उपनिवेश, इंडोनेशिया में घुसकर कब्ज़ा कर लिया। इसके साथ ही पूरा दक्षिण-पूर्वी एशिया जापानी कब्ज़े में था।

दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों और लोगों पर अपने कब्ज़े को जापानियों ने इन देशों की पश्चिमी साम्राज्यवाद से “मुक्ति” और एक “महान पूर्वी एशियाई सह-समृद्ध इलाके” के निर्माण की दिशा में एक क़दम के रूप में पेश किया। लेकिन जापानी दक्षिण-पूर्वी एशिया के लोगों को बेवकूफ नहीं बना पाए, और जापान के कब्ज़े के ख़िलाफ़ एक तीव्र प्रतिरोध आंदोलन उभर कर आया, जिसकी अगुवाई बहुत जगहों पर कम्युनिस्ट कर रहे थे।

सोवियत संघ की भूमिका और अंतर-साम्राज्यवादी जंग का फासीवाद के ख़िलाफ़ जन-युद्ध में परिवर्तन

हालांकि द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत दुनियाभर के इलाकों, बाज़ारों और संसाधनों के पुनः बंटवारे के लिए साम्राज्यवादियों के बीच जंग के रूप में हुई थी, लेकिन जल्दी ही इसका परिवर्तन फासीवाद के ख़िलाफ़ एक महान जंग में हो गया। सोवियत संघ और चीन के लोगों द्वारा अपने देश की रक्षा में संघर्ष तथा कई देशों में फासीवादी शक्तियों के कब्ज़े के ख़िलाफ़ बहादुर प्रतिरोध आंदोलनों के ज़रिये ऐसा हुआ।

सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी (सी.पी.एस.यू.) और स्टालिन की अगुवाई में सोवियत लोगों ने मौत को हराने वाली बहादुरी के साथ इस जंग में हिस्सा लिया और अनगिनत कुर्बानियां दीं, जिसमें 2 करोड़ 80 लाख लोग मारे गये। बहादुर लाल सेना के अलावा लाखों करोड़ों की तादाद में नागरिकों ने देश के पूर्वी हिस्से में, जिसपर दुश्मन सेना का कब्ज़ा था, खुद को पार्टीसान जत्थों में संगठित किया और दुश्मनों के ख़िलाफ़ लगातार गुरिल्ला जंग छेड़ दी, जिससे हमलावर सेना के हौसले पस्त हो गए। पश्चिमी साम्राज्यवादी राज्यों के उकसावे पर नाज़ी इस भ्रमजाल में फंसे रहे कि सोवियत लोग अपने मुक्तिदाता के रूप में उनका स्वागत करेंगे। इसके ठीक विपरीत सोवियत लोगों ने सोवियत व्यवस्था और अपनी एक-एक इंच ज़मीन की हिफाज़त में उनको मुंह तोड़ जवाब दिया। हालांकि शुरुआत में दुश्मन को अपने इलाके में अंदर तक आने की इजाज़त देने और फिर उसकी घेराबंदी करके उसके संसाधनों की श्रृंखला को तोड़ने की रणनीति के तहत, अपनी ज़मीन का कुछ हिस्सा ताकतवर एक्सिस सेना के हवाले करना पड़ा था। उन्होंने हमलावरों को एक पल का भी चैन नहीं दिया।

जर्मन सेना ने सितम्बर 1941 से लेकर 1944 तक महान लेनिनग्राद शहर की घेराबंदी कर रखी थी। लेनिनग्राद के लोगों को बर्बर बमबारी और अति-भुखमरी का सामना करना पड़ा, मगर उन्होंने कभी भी आत्मसमर्पण नहीं किया। लेकिन वह वोल्गा नदी के तट पर बसे स्तालिनग्राद का युद्ध था, जिसने फासीवादी हमलावरों की कमर तोड़ दी। सोवियत संघ के ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण करने के लिए स्तालिनग्राद पर कब्ज़ा करना जर्मनी के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। लेकिन लाल सेना और सोवियत संघ के लोगों के संगठित दस्तों ने हमलावर सेना पर ज़ोरदार प्रतिरोधी हमला बोल दिया जिससे जर्मन सेना के हौसले पस्त हो गए। स्तालिनग्राद के लोगों ने शहर की हर एक गली, घर और हर एक इंच की हिफाज़त के लिए संघर्ष किया। कई महीनों तक चलने वाली इस जबरदस्त जंग में जर्मनी की सेना नष्ट हो गयी, जिसे अभी तक “अजेय” माना जाता था। 2 फरवरी, 1943 को जर्मनी की छठी फौज ने घुटने टेक दिये। यह दूसरे विश्व युद्ध का निर्णायक मोड़ था।

उसके बाद सोवियत लाल सेना ने जर्मन सेना को वापस जर्मनी तक खदेड़ते हुए कई देशों और लोगों को जर्मन कब्ज़ाकारी सेना के राज से मुक्ति दिलाई।

साम्राज्यवाद की भूमिका

जब नाज़ी जर्मनी ने सोवियत संघ पर हमला किया उस समय अमरीका बस इंतजार में देखता रहा, ठीक वैसे ही जब जर्मन सेना ने पश्चिमी यूरोप के अधिकांश हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया था। जर्मनी द्वारा सोवियत संघ पर हमले के तुरंत बाद हैरी ट्रूमैन, जो कि उस समय अमरीकी सीनेट के सदस्य थे और आगे चलकर जंग के दौरान रूज़वैल्ट की मौत के बाद अमरीका के राष्ट्रपति बने, उन्होंने कहा कि: “यदि हम देखते हैं कि उस जंग में जर्मनी जीत रहा है तो हमें रूस की सहायता करनी चाहिए, और यदि रूस जीत रहा है तो फिर हमें जर्मनी की सहायता करनी चाहिए, ताकि ये दोनों आपस में संभवतः जितने लोगों को मार सकते हैं मारें।” (न्यूयॉर्क टाइम्स, 24 जून, 1941) उनका यह बयान अमरीकी साम्राज्यवाद के पूरी तरह से साम्राज्यवादी मानवद्वेशी नज़रिये को दर्शाता है।

जब जापान ने 7 दिसंबर को अमरीकी नौसैनिक अड्डे पर्ल-हार्बर पर हवाई बमबारी की, तब जाकर अमरीका मित्र देशों (अलाइड फोर्सेस) की तरफ से जंग में शामिल हो गया। अपने उपनिवेशों और खुद के देश (फ्रांस के मामले में) के खो जाने से ब्रिटेन और फ्रांस बहुत कमज़ोर हो गए थे और सोवियत संघ जर्मन जंगी मशीन की आग का सामना कर रहा था, ऐसे समय में अमरीका उम्मीद कर रहा था कि उसका पलड़ा भारी होगा।

1941 से ही सोवियत संघ जंग के समय के अपने युद्धकालीन मित्र देशों अमरीका और ब्रिटेन से पश्चिम यूरोप में युद्ध का दूसरा मोर्चा खोलने के लिए लगातार आह्वन करता रहा, ताकि सोवियत संघ पर दबाव कुछ कम हो सके, जो जर्मन सेना के साथ अकेले लड़ रहा था। लेकिन ब्रिटेन और अमरीका जानबूझकर दूसरा मोर्चा खोलने में देरी करते रहे। अंत में 1944 में जाकर उन्होंने दूसरा मोर्चा खोला, जब उनको यह स्पष्ट हो गया कि सोवियत संघ ने जर्मन हमले को ध्वस्त कर दिया है और अब वह उनकी सहायत के बगैर अकेले ही यूरोप को नाज़ी हमलावरों से मुक्त करा सकता है। तब जाकर अमरीका ने फ्रांस के नोर्मंडी में हवाई जहाज और नौसेना की मदद से अपनी सेना को उतारने की पहल की, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जब जर्मनी आत्मसमर्पण करता है तो यूरोप की धरती पर उसकी सेना मौजूद हो। उनका मक़सद था, यूरोप का बंटवारा करना और पूरे महाद्वीप पर अपना दबदबा कायम करना।

यही कहानी पूर्वी एशिया की भी थी 1945 के आते-आते यह साफ हो गया था कि जापानी सेना एशिया में पीछे हट रही थी। चीनी प्रतिरोध से उसकी सेना नष्ट हो रही थी, जबकि एशिया में उसके पहले गढ़ मंचूरिया में सोवियत लाल सेना ने उसको पूरी तरह हरा दिया था। जब एशिया में जंग साफ तौर से ख़त्म होने की कगार पर थी तो अमरीका ने 6 अगस्त और 8 अगस्त को जापानी शहर हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए, जिससे हुए नरकीय विनाश में कुछ ही पल में लाखों करोड़ों मारे गए। अमरीका यह सुनिश्चित करना चाहता था कि जापान अमरीकी सैनिक नेतृत्व के सामने आत्मसमर्पण करे। उसके बाद अमरीका ने अपने पसंदीदा मित्र, चीन के राष्ट्रपति चियांग काई-शेक की सेना को मंचूरिया ले जाने के लिए हवाई जहाज भेजे, ताकि जापानी सेना चीनी कम्युनिस्टों या सोवियत लाल सेना के सामने आत्मसपर्मण न कर सके।

लेख के 6 भागों में से अगला भाग–पांच पढ़ें : युद्ध का अंत और विभिन्न देशों और लोगों के उद्देश्य

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