केंद्र सरकार के किसान विरोधी अध्यादेशों पर क्रांतिकारी किसान यूनियन (पंजाब) के अध्यक्ष से साक्षात्कार

हाल में केंद्र सरकार द्वारा पारित कृषि क्षेत्र से संबंधित अध्यादेशों के बारे में मज़दूर एकता लहर ने क्रांतिकारी किसान यूनियन (पंजाब) के अध्यक्ष, डा. दर्शन पाल के साथ बातचीत की। साक्षात्कार की कुछ मुख्य बातें यहां पेश की जा रही हैं।

म.ए.ल. : हाल ही में केन्द्र सरकार ने किसानों से संबंधित दो अध्यादेश पास किए हैं।  अध्यादेश के अंतर्गत निजी कंपनियों के लिए देश के किसी भी भाग में सरकारी मंडियों से अलग सीधे तौर पर किसानों से खरीदी करने की गुंजाइश होगी। किसानों को कहा जा रहा है कि अब उन्हें उत्पादन के सही दाम मिल सकेंगे। इन अध्यादेशों का किसानों पर क्या असर होगा?

डा. दर्शन पाल : सरकार अध्यादेशों के ज़रिए कृषि क्षेत्र का उदारीकरण और निजीकरण कर रही है। दोनों ही अध्यादेशों का लक्ष्य कृषि क्षेत्र का निजीकरण करके किसानों को बड़े निजी व्यापारियों के हवाले करना है।

किसान को फ़सल के लिए दो चीजें चाहिए। एक, फ़सल का सुनिश्चित दाम मिले और दूसरा, बाज़ार सुनिश्चित हो। दोनों एक दूसरे से जुड़े हैं। एक के बिना दूसरा नहीं होगा।

आज मंडियों को संचालित व नियंत्रित करने का काम राज्य की संस्थाएं करती हैं। पंजाब में एक मंडीकरण बोर्ड है, मार्केट कमेटी है, एक नेटवर्क है। मंडियों के बड़े-बड़े यार्ड बने हुए हैं। यहां किसान के लिए कृषि मशीनरी, कीटनाशक, दवाइयां, उर्वरक आदि की दुकानें होती हैं। बहुत बड़े स्तर पर मज़दूर होते हैं, जिनका जीवन-यापन मंडी पर ही निर्भर है। मंडी में बड़े पैमाने पर ट्रांसपोर्टरों को काम मिलता है।

दूसरी ओर, सरकारी संस्थान हैं, जैसे कि पूरे देश के लिए भारतीय खाद्य निगम (एफ.सी.आई.) है। उसी तरह से पंजाब एग्रो प्रोग्राम, मार्कफेड सहित अन्य सरकारी एजेंसियां होती हैं। ये एजेंसियां उपज की गुणवत्ता को नियंत्रण करती हैं। सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) पर उपज की खरीद होती है। किसान अपनी उपज को लेकर मंडी में जाता है। यहां उपज की सफाई होती है। सरकारी एजेंसी का इंस्पेक्टर उपज के लिये तय किये गये न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करता है। गुणवत्ता की जांच सरकारी मापदंडों के अनुसार होती है। फिर वह उपज सरकारी या प्राइवेट गोदामों में चली जाती है।

उपज की बिक्री पर 8.5 प्रतिशत टैक्स लगता है। टैक्स का भुगतान किसान नहीं, बल्कि उपज को खरीदने वाली एजेंसी करती है। वह एजेंसी सरकारी हो या प्राइवेट सभी को टैक्स देना होता है। 8.5 प्रतिशत में से 3 प्रतिशत मार्केट फीस, 3 प्रतिशत ग्रामीण विकास फंड और 2.5 प्रतिशत कमीशन एजेंट को जाता है। ग्रामीण विकास के कोष का इस्तेमाल गांवों में लिंक रोड बनाने या पानी की सप्लाई आदि पर खर्च किया जाता है। हालांकि यहां भी भ्रष्टाचार है। इसके बावजूद, कोष का अधिकतम उपयोग गांवों के विकास पर किया जाता है।

अब आते हैं, जहां ए.पी.एम.सी. नहीं है। वहां प्राइवेट एजेंसियां किसानों से खरीद करती हैं। ये एजेंसियां उपज का दाम और गुणवत्ता मनमाने तरीके से तय करती हैं।

सरकार द्वारा स्थापित शान्ता कुमार कमेटी ने पहले ही कह दिया था कि हम एफ.सी.आई. को तोड़ेंगे। अब सरकार एफ.सी.आई. को खत्म करने की दिशा में चल रही है।

अध्यादेशों से दो स्तर पर समस्याएं आएंगी।

पहला कि किसान बर्बाद होंगे। उदाहरण के लिए अगर पंजाब में ए.पी.एम.सी. नहीं होती तो यहां के किसान अपनी फ़सल को प्राइवेट एजेंसी को कम दाम पर बेच रहे होते। आज व्यापारी, बिहार और उत्तर प्रदेश से उपज खरीदकर पंजाब में बेचते हैं क्योंकि पंजाब में एम.एस.पी. वाला मूल्य मिलता है।

दूसरा कि ए.पी.एम.सी. कानून के बिना मंडियों पर निर्भर रोज़गार ख़त्म हो जाएगा। उनका रोज़गार भी ख़त्म होगा, जो राज्य की एजेंसियों से जुड़े हैं। राज्य को प्राप्त होने वाली आय ख़त्म हो जायेगी।

ए.पी.एम.सी. कानून के तहत, मंडी का जो ढांचा अभी है वह सिर्फ पंजाब, हरियाणा और थोड़ा-सा उत्तर प्रदेश में है। इससे मात्र 6-7 प्रतिशत किसानों को ही फ़ायदा होता है। हमारा कहना है कि इस मंडी व्यवस्था का विस्तार और फैलाव पूरे देश में होना चाहिए। जिससे राज्य की एजेंसियां, किसानों की जीविका की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेह हों। उदाहरण के लिए पंजाब में धान और गेहूं की खेती के सीजन से दो महीने पहले ही एजेंसियां तैयारी करना शुरू कर देती हैं। वैसे ही जैसे एक धावक मैराथन की तैयारी करता है। व्यापारी, राजनीतिक नेता और सरकारी एजेंसियां पहले ही बोलने लगते हैं कि इस बार अक्तूबर में ख़रीद शुरू करेंगे।

किसान अपनी फ़सल की मार्केटिंग कैसे करेगा। वह अपनी फ़सल को एक जगह से दूसरी जगह कैसे ले जा सकता है। आज तक मैंने ऐसा होते नहीं देखा है। सरकार का असली मक़सद है कि किसानों की उपज को एम.एस.पी. पर खरीदने की अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटना।

घोषित एम.एस.पी. पर फ़सल बिकती नहीं है। उदाहरण के लिए इस बार मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य था 1800 रुपये। लेकिन पंजाब में किसानों को 600-700 या 1000 रुपये में बेचने को मजबूर किया जा रहा है। किसानों के संगठन, धान, गेहूं या कपास उगाने वाले क्षेत्र में एम.एस.पी. के लिए संघर्ष करते आ रहे हैं। आज तक देश में किसी किसान ने गेंहू और मक्का को एम.एस.पी. से ऊपर बेचा हो, ऐसा कोई दिखाई नहीं देता। इलेक्ट्रानिक्स एग्रीकल्चर मार्केटिंग या उद्योग लुभावनी चीजे हैं। हिन्दोस्तान का किसान अभी उस तरफ जा ही नहीं सकता है। वर्तमान व्यवस्था में फ़सल का एम.एस.पी. नहीं दिया गया तो किसानों का खात्मा होना लाजमी है।

किसान की आय कम होती है और वह भी 6 महीने बाद आती है। किसानों पर बहुत अधिक कर्ज़ है, जिसके कारण वे आत्यहत्या करने को मजबूर हैं। किसान और उसकी किसानी को राज्य के हस्तक्षेप की बहुत ज़रूरत है। किसान बाज़ार का मुक़ाबला नहीं कर सकता है।

इसलिए किसान को उपज की क़ीमत और बाज़ार दोनों ही चाहिएं। यह सरकार के नियंत्रण में होना चाहिए।

म.ए.ल. : दूसरे अध्यादेश के अनुसार, कृषि व्यापार की बड़ी-बड़ी कंपनियां देश के किसी भी हिस्से में किसानों के साथ फ़सल बोने से पहले ही उत्पाद की खरीदी का कान्ट्रैक्ट बना सकेंगी। क्या कान्ट्रैक्ट फार्मिंग से किसानों को फ़ायदा होगा?

डा. दर्शन पाल : सरकार ठेका खेती का नारा दे रही है। यहां बड़ी-बड़ी कंपनियां किसानों के साथ समझौता करेंगी कि हम तुमको मशीन और पूंजी देंगे और हम आपके उत्पादित माल को तय रेट पर खरीदेंगे। इसे वायदाबाज़ार भी कहते हैं।

इसके अलावा, एक वक्त के बाद बड़ी-बड़ी कृषि कंपनियां आकर किसानों से कहेंगी कि हम तुम्हारी भूमि को किराए पर लेते हैं। हम आपको इतना वेतन देंगे। हम आपकी कृषि पर इतना शेयर रखेंगे। इस खेल में आखरी में किसानों को ही नुकसान होगा। अडानी, अंबानी, कारगिल, मोनसेंटो, सिजेंटा जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियों के हाथों किसान की ज़मीन, मेहनत, उसके आत्मसम्मान और ज़मीर को बेचने या गिरवी रखने का काम ये अध्यादेश करेंगे।

किसानों की रोजी-रोटी को सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी राज्य की बनती है। अपनी उस ज़िम्मेदारी से हाथ खींचने के लिए ही सरकार ने ये दो अध्यादेश जारी किये हैं।

किसानों के सामने एक ही रास्ता है कि वे एकजुट होकर खुद को बचाएं।

म.ए.ल. : कृषि व्यापार में निजी कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार ए.पी.एम.सी. की मंडी व्यवस्था में समस्याओं की बात करती है। सरकारी मंडियों में इस समय किसानों को किस प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है?

डा. दर्शनपाल : मंडियों में समस्याएं तो हैं। पंजाब और हरियाणा की मंडियों में एक एजेंसी है जो पैसे उधारी पर देती है। इसे हम अपनी भाषा में कमीशन एजेंट (साहूकार) कहते हैं। कमीशन एजेंट और किसान के बीच कोई कानून नहीं है।

बैंकिंग संस्थाओं ने अब कर्ज़ देना शुरू कर दिया है। आज से 12 साल पहले, पंजाब के किसानों पर 35 करोड़ रुपये का कर्ज़ था। जिसमें से 65 प्रतिशत कमीशन एजेंटों का था। उस समय किसानों ने संघर्ष किया था। इसके लिए सरकार की तरफ से एक उच्चस्तरीय कमेटी बनी थी। कमेटी ने कर्ज़ और आत्महत्या को लेकर कुछ प्रस्ताव दिये थे। बैंकिंग संस्थानों को किसानों को कर्ज़ देने में आधुनिक होने का प्रस्ताव दिया था।

ज्यादा आत्महत्यायें कमीशन एजेंट द्वारा दिए गए कर्ज़ से होती हैं। हमारा मानना है कि बैंकिंग क्षेत्र द्वारा सस्ती ब्याज दर पर कर्ज़ देकर किसानों को कमीशन एजेंटों से बचाया जा सकता है।

दूसरा कि पंजाब की मंडियों में सरकारी खाद्य एजेंसियां किसानों का बहुत उत्पीड़न करती हैं। गुणवत्ता नियंत्रण सबसे ज्यादा तकलीफदेय है। मौसम बदल गया, वर्षा हो गयी, पाला पड़ गया या मक्के में नमी बढ़ गई। इन सबके बहाने इंस्पेक्टर और एजेंसियां किसानों को परेशान करती हैं। कमीशन एजेंट आकर कहेगा कि 100 किलो के बदले आपको 101 किलो देना पड़ेगा। जैसे कि इस बार गेहूं की फसल के दौरान तीन जिलों – पटियाला, मोहाली और फतेगढ़ साहिब में बारिश हो गयी, जब गेहूं पक रहा था। अब उपज में गेहूं का दाना छोटा हुआ है। उसका रंग भी खराब हो गया है। भारतीय खाद्य निगम ने तय कर दिया कि 5 रुपये से लेकर 28 रुपये तक प्रति क्विंटल कम मिलेगा। इससे किसानों को बहुत धक्का लगा। 6 महीने बाद किसान अपनी उपज को लेकर मंडी में इस उम्मीद से पहुंचता है कि उसे सही मूल्य मिलेगा। इसके खि़लाफ़ हमने संघर्ष किया, इसके बावजूद 5 रुपये कम के हिसाब से उपज को बेचना पड़ा।

पंजाब और हरियाणा के बाहर, देश की मंडियों में निजी खरीदारी ज्यादा होती है। व्यापारी किसानों का खूब शोषण करते हैं। किसान सोचकर जाता है कि उसे फ़सल का दाम 2,000 रुपये मिलेगा, लेकिन 1200 रुपये मिलता है। यानी किसान मंडियों से उत्पीड़ित होकर जाता है।

पंजाब में इस साल तक ऐसा हुआ है कि मंडी में किसान जब अपनी फ़सल को बेचता है तो उसका पैसा सीधे उसे नहीं मिलता, वह पैसा कमीशन एजेंट को मिलता है। कमीशन एजेंट उस पैसे को बैंक में रखकर कहता है कि पैसा अभी नहीं मिला और वह किसान को चक्कर लगवाता है। एजेंट किसानों को अपनी पगड़ी तक उतारने को मजबूर कर देते हैं। किसान आर्थिक और सामाजिक तौर पर परेशान होकर सदमे में मंडी से जाता है। किसान कभी-कभी भ्रष्ट इंस्पेक्टर का शिकार होता है। खरीदने वाली एजेंसी कभी-कभी अनाज के बोरों में ज्यादा भरकर कम तौलती है। खरीद शुरू होने पर किसानों को अपनी फ़सल की उपज को बेचने के लिए एक-दो रात मंडियों में रुकना पड़ता है।

इसके बावजूद, हम किसान यूनियन वालों का यही कहना है कि निजी व्यापारियों से सरकारी व्यवस्था कहीं अच्छी है, अगर बाज़ार में एम.एस.पी. पर खरीदी की गारंटी मिलती है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार, उत्तरप्रदेश, ओड़िशा, बंगाल आदि में निजी बाज़ार से किसानों को मिलता ही क्या है!

म.ए.ल. : कर्ज़ा माफ़ी की मांग को लेकर जो संघर्ष चल रहा है, उसके ऊपर आपका क्या विचार है?

डा. दर्शन पाल : हमारी मांग है कि किसानों को कर्ज़ मुक्त किया जाए।

सरकारी आयोग कहता है कि फ़सल का मूल्य उसकी लागत से 50 प्रतिशत अधिक मिलना चाहिए। मेरा मानना है कि मूल्य में लागत के खर्च की उचित तौर से गणना नहीं की जाती। जिसका फ़ायदा सीधा निजी व्यापारियों के हित में गया है।

किसानों पर कर्ज़ का मुख्य कारण है राज्य द्वारा अपनी ज़िम्मेदारी ठीक ढंग से न निभाना। सभी कानून कर्ज़ देने वाली एजेंसियों के हित में हैं न कि किसानों के हित में।

कर्ज़दार किसान जिसे हम डिफाल्टर किसान कहते हैं, अगर ऐसे 100 किसानों को लें, जिन पर कर्ज़ बकाया है। 15 साल का हिसाब करें, 4 प्रतिशत साधारण ब्याज लगाकर गणना करें तो पाएंगे कि 100 में 90 किसान अपना मूलधन और ब्याज दे चुके हैं। वे कर्ज़ में सिर्फ इसलिए डूबे हैं क्योंकि ब्याज की दर ज्यादा है और चक्रवृद्धि ब्याज देनी पड़ती है।

फ़सल उत्पादन में लागत जैसे उर्वरक, खाद्य, टेªक्टर आदि महंगे होते गए। हरित क्रांति के बाद किसान की उपज का मूल्य और लाभ बढ़ा था लेकिन धीरे-धीरे चीजों की महंगाई के चलते कृषि में लागत बढ़ती गयी। पैदावार नहीं बढ़ी क्योंकि भूमि को बढ़ा नहीं सकते। एक तरफ ज्यादा लागत और दूसरी तरफ, फ़सल के लिए मिलने वाली क़ीमत, इन के बीच फासला कम होता गया। किसान कर्ज़ की दलदल में फंसता गया और अंत में वह आत्महत्या के लिए मजबूर होता गया।

वे किसान सबसे ज्यादा कर्ज़ में हैं, जो सबसे ज्यादा नगदी फ़सल पैदा करते हैं। तमिलनाडु, महाराष्ट्र, तेलंगाना, पंजाब और कर्नाटक के किसानों ने बाज़ार से पैसा लेकर पैदावार की है और वही कर्ज़ में डूब गया। इसी बीच, प्राकृतिक आपदा के चलते किसानों का नुकसान भी बढ़ जाता है।

राज्य का काम है कि वह किसान और किसानी को बचाए और उसकी सुरक्षा करे। एक बार किसानों को कर्ज़ मुक्त करके कर्ज़ लेन-देन का एक कानून बनाए। कर्ज़ कितना हो और कितनी ब्याज दर पर हो? किसान को सस्ती दर पर कर्ज़ मिले। वह अपने बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक कामों में इसका इस्तेमाल करते हुए 6 महीने बाद, फ़सल बेचकर जो पैसा उसे मिलता है, उससे आसानी से अपना कर्ज़ चुका सके।

म.ए.ल. : किसानों की उपज की राज्य द्वारा लाभदायक दाम पर सुनिश्चित खरीदारी के साथ-साथ, सार्वजनिक वितरण व्यवस्था भी बहुत आवश्यक है ताकि सभी लोगों को सही मात्रा में, सही गुणवत्ता का और सही दाम पर खाद्य और सारी जरूरी चीजें मिलें। इस पर आपके विचार क्या हैं?

डा. दर्शन पाल : सरकार ने अनिवार्य वस्तुएं (संशोधन) अध्यादेश-2020 के ज़रिए अनाज और सब्ज़ियों को ज़रूरी चीज़ों की सूची से बाहर कर दिया है। यानी कृषि से जुड़ी बड़ी-बड़ी कंपनियां इन चीजों को अपने गोदामों में भर लेंगी और मनमाने दाम पर बेचेंगी।

हमारे देश में बहुत लोग हैं, जिनको एक सार्वजनिक वितरण प्रणाली की सख्त जरूरत है। उदाहरण के लिए अन्य राज्यों से आए मज़दूर अपने-अपने गांवों को जाने के लिए मजबूर हुए। उनके पलायन की मुख्य वजह भोजन के लिए कच्ची सामग्र्री – अनाज, दाल, चीनी और तेल, आदि का राज्य द्वारा सुनिश्चित न किया जाना था।

हमारे समाज में ऐतिहासिक रूप से कुछ तबके हैं, जो भोजन जुटा पाने में अक्षम हैं। कई ऐसे भी हैं जिनके पास रोज़गार के साधन नहीं हैं कि वे दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर सकें। जो रोज़ कमाते हैं, वे भोजन की न्यूनतम ज़रूरत को भी पूरा नहीं कर सकते। आज देश में बहुत बेरोज़गारी है। ऐसे में हमारे देश में सार्वजनिक वितरण व्यवस्था की सख्त ज़रूरत है।

म.ए.ल. : हाल में 27 जुलाई को पंजाब में हुए किसानों के प्रदर्षन और आगे के संघर्ष के बारे में बताएं।

डा. दर्शन पाल : पूरे हिन्दोस्तान में 250 से अधिक संगठनों का एक संयुक्त मोर्चा है। इसमें अधिकांश किसान संगठन हैं। इसमें पंजाब के 10 संगठन अपनी हिस्सेदारी करते हैं। इसके अलावा तीन संगठन और भी शामिल हैं। जब यह अध्यादेश आया तो पंजाब में इसके विरोध में संयुक्त बैठक हुई। बैठक में कृषि क्षेत्र के लिए अध्यादेश, बिजली अधिनियम-2020, पेट्रोल-डीजल की क़ीमतों में बढ़ोतरी के अलावा, राज्य के द्वारा बुद्धिजीवियों, सांस्कृतिक-समाजिक कार्यकर्ताओं, कलाकारों और अभिनेताओं को जेल में डाले जाने को लेकर बातचीत हुई। इनका विरोध करने के लिए 13 संगठन ने 20-26 जुलाई तक गांव-गांव में मोदी सरकार का पुतला दहन सहित झंडा मार्च किये, बैठकें कीं और रैलियां निकालीं। 27 जुलाई को अंतिम पड़ाव हुआ। जिसमें ये 13 संगठन, 10 हजार ट्रेक्टर लेकर आए थे। हर ट्रेक्टर पर तीन लोग थे। खासकर भाजपा और अकाली दल के सांसदों, विधानसभा सदस्यों, पदाधिकारियों के ऑफिसों और उनके आवास तक मार्च करने के बाद धरना दिया गया।

9 अगस्त को पूरे देश में किसान 9 मांगों को लेकर आन्दोलन करेंगे। इन मांगों में कृषि संबंधी अध्यादेषों और बिजली अधिनियम-2020 को रद्द करने, स्वामीनाथन आयोग को लागू करने और किसान के लिये कर्ज़ मुक्ति मुख्य हैं।

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