कृषि व्यापार में तब्दीलियों पर साक्षात्कार

अभी हाल में सरकार ने कृषि संबंधी दो अध्यादेशों को पारित किया। “कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश-2020” और “मूल्य का आश्वासन और कृषि सेवा पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता अध्यादेश-2020”। प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री ने इन दोनों अध्यादेशों को “किसानों की आज़ादी” का रास्ता खोलने वाले अध्यादेश बताये हैं । इन अध्यादशों के बारे में मज़दूर एकता लहर ने देशभर के कई किसान नेताओं से बातचीत की। अखिल भारतीय स्वामीनाथन संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष, श्री विकल पचार के साथ मज़दूर एकता लहर द्वारा की गयी मुख्य बातें यहां पेश की जा रही हैं।

मज़दूर एकता लहर (म.ए.ल.) : हाल ही में सरकार ने कृषि संबंधी दो अध्यादेश पारित किये हैं। प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री ने इन्हें “किसानों की आज़ादी” का रास्ता खोलने वाला अध्यादेश बताया है। इनमें एक है “कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश-2020” जिसके अनुसार, अंतर-राज्यीय कृषि व्यापार की रुकावटें हटा दी जायेंगी। क्या इससे किसानों को अपने उत्पादों के लिए सही दाम न मिलने की समस्या हल होगी?

विकल पचार (वि.प.) : कृषि व्यापार को निजी कंपनियों के लिए और ज्यादा खोलने की तैयारी तो सरकार द्वारा फरवरी में ही कर दी गयी थी, जब बजट पेश हुआ था। सरकार कृषि क्षेत्र को कॉर्पोरेट हाउसेस को सौंपना चाहती है।

पूरे भारत में अभी तक कृषि उपज विपणन समिति (ए.पी.एम.सी.) कानून के अंतर्गत सिर्फ 6 प्रतिशत खरीद हो रही है। ए.पी.एम.सी. को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी.डी.एस.) के लिए हरियाणा, पंजाब जैसे राज्यों में गेहूं और धान की खरीद करनी पड़ती है। ए.पी.एम.सी. उस खरीद से पीछे हटना चाहती है। सरकार ने भारतीय खाद्य निगम का बजट घटा दिया है। मंडी एक्ट में बदलाव होने से सरकारी मंडियों की जगह पर प्राइवेट मंडियां आएंगी। जब सरकार किसानों को खुद के द्वारा घोषित किया गया न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं दे पा रही है, तो भूल जाइये कि कॉर्पोरेट हाउसेस (पूंजीवादी कंपनियों) की मंडियां किसानों को उनके उत्पादों का उचित भाव देंगी। बिहार में प्राइवेट मंडियां हैं। वहां के किसानों को उनकी फ़सलों का औना-पौना भाव मिलता है। गुजरात में प्राइवेट कंपनियों की मंडियों को बेचने पर फ़सलों का भाव, हरियाणा के मुकाबले 60 प्रतिशत भी नहीं मिल पा रहा है।

म.ए.ल. : “मूल्य का आश्वासन और कृषि सेवा पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता अध्यादेश-2020” – इसके बारे में माना जाता है कि यह बड़े पैमाने पर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए रास्ता खोल देगा। सरकार दावा कर रही है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से किसानों की आमदनी सुरक्षित होगी और बढ़ेगी। परन्तु कई मामलों में ऐसा पाया गया है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करने वाले किसान बड़ी-बड़ी कंपनियों की शर्तों में पूरी तरह बंध जाते हैं, उनके गुलाम जैसे बन जाते हैं (जैसे कि गुजरात में पेप्सिको के लिए आलू उगाने वाले किसानों का मामला)। इस पर आपके क्या विचार हैं?

वि.प. : कांट्रेक्ट फार्मिंग ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार अंग्रेज किसानों से नील की खेती कराते थे। किसान की ज़मीन भी बरबाद हो जाती थी। किसान को खुद के लिये अनाज बाहर से खरीदना पड़ता था। जब कांट्रेक्ट फार्मिंग की जायेगी तो बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने मुनाफ़ों की नज़र से, किसानों से खेती करवायेंगी। किसान अपनी आज़ादी से फ़सल नहीं पैदा कर सकेगा। पी.डी.एस. में शामिल लोगों को जो गेहूं, चावल या दूसरी चीजें मिल रही हैं उनमें कटौती होगी। बाज़ार में भाव उछलेंगे। कंट्रेक्ट फार्मिंग के अंदर शर्त यह है कि खेती के लिये बीज और दवाइयां कंट्रेक्टर देगा। किसान अपनी मेहनत लगायेगा। लेकिन, किसान कांट्रेक्टर द्वारा मांगी गई गुणवत्ता के मुताबिक फ़सल देने के लिए बाध्य होगा। फ़सल ज़मीन के अंदर पैदा होती है। ज़मीन कोई मशीन नहीं है कि एक साइज और एक गुणवत्ता वाली चीज का उत्पादन करेगी। जब आप सेब, टमाटर या मिर्च का उत्पादन करते हैं तो वह मौसम से प्रभावित होता है। कांट्रेक्टर अपनी शर्तों में ऐसी ही शर्तें रखेंगे जैसे कि वे एक निश्चित साईज, निश्चित रंग, निश्चित गुणवत्ता वाले उत्पादों को ही खरीदेंगे। इसके अलावा, अगर मौसम की खराबी या किसी अन्य कारण से फ़सल की गुणवत्ता में परिवर्तन आता है तो सारा का सारा नुकसान किसानों को भरना होगा। इस स्थिति में कांट्रेक्टर ने जो पैसा बीज और दवा पर लगाया है वह सारा का सारा खर्च किसानों से वसूला जायेगा।

म.ए.ल. : आपने मंडियों की बात उठाई है। ए.पी.एम.सी. मंडी व्यवस्था जो अब तक मौजूद रही है, उसमें क्या समस्याएं हैं? उनमें भ्रष्टाचार फैलाने और उन्हें नष्ट करने में सरकार का क्या हाथ रहा है?

वि.प. :  सरकारी मंडियों में भ्रष्टाचार ज़रूर है। पर किसान को चाहे दुखी करके ही सही, सरकारी मंडियों के ज़रिये, उसकी फ़सल का निर्धारित भाव मिल रहा था। मंडी एक्ट में बदलाव करके प्राइवेट मंडियों द्वारा खरीद की जायेगी। जैसे कि हरियाणा और पंजाब में नोटिस आ गया है कि मंडी की सोसाइटी में कर्मचारी कम किये जायें और कम किये जा रहे हैं। प्राईवेट मंडी में सरकार की तरफ से कोई जांच अधिकारी नहीं होगा और न ही सरकार की तरफ से कोई देख-रेख या ज़िम्मेदारी होगी। यानी कि कृषि उपज का भाव तय करने में प्राइवेट कंपनियों को खुली छूट दी जायेगी।

जहां तक सरकारी मंडियों में भष्टाचार का सवाल है, मंडियों के द्वारा मंडी एक्ट के नियमों और कानूनों को तय करने से किसानों को वंचित रखा गया। किसान बड़ी उम्मीद से न्यूनतम समर्थन मूल्य की आशा में अपनी फ़सल की उपज को लेकर मंडी जाता है। मंडी में उसे अपनी फ़सल की उपज को ढकने की कोई व्यवस्था नहीं मिलती। किसानों के लिए भोजन और पानी की कोई व्यवस्था नहीं होती। किसान मंडी में चार-चार दिन पड़ा रहता है और अंत में, सरकार की अनियमितताओं और भ्रष्टाचार से परेशान होकर ओेने-पोने दाम पर अपनी फ़सल की उपज को बेचकर निकल जाता है। यह खेल मंडी अधिकारी और बिचैलियों की मिलीभगत से चलता है। आज पूरे देश में अनाज मंडियों की यही हालत है। जैसे आज़ादी से पहले मंडियों में, किसानों की फ़सल की उपज की बोली लगाई जाती थी, उसको उछाल-उछाल कर देखा जाता था, आज भी अधिकतर सरकारी मंडियों में ऐसे ही हालात हैं। अगर सरकार की नीति थी कि मंडियों से भ्रष्टाचार ख़त्म हो, तो यह ख़त्म किया जा सकता था। लेकिन सरकार ने भ्रष्टाचार को मजबूत किया है।

‘मेरी फसल मेरा ब्यौरा’ – इस स्कीम से किसान की फ़सल और खेत का रिकार्ड सरकार के पास होता है। सरकारी तंत्र को पता है कि मैं दो एकड़ की खेती करने वाला किसान हूं, तो मेरे पास 40 क्विंटल गेहूं होगा। सरकार को चाहिए कि 6 महीने पहले ही 40 क्विंटल गेहूं को खरीदने का प्रबंध करे। मुझे टोकन जारी करे। मंडी में ले जाते ही मेरी फ़सल की उपज तौली जाये। सरकार मंडी में यह प्रबंध भी कर सकती थी कि जहां लूट-खसौट होती है, वहां सी.सी.टी.वी. कैमरे लगाए और उसकी निगरानी करे। इस प्रकार मंडी की हालत को सुधारा जा सकता है।

इसके अलावा, किसानों के ज़रिए जो टैक्स आ रहा है वह सरकार के लिए बहुत बड़ी कमाई है। सरकार उस टैक्स का इस्तेमाल करके मंडियों का आधुनिकीकरण कर सकती थी और लूट की व्यवस्था को फौरी तौर पर ख़त्म कर सकती थी। लेकिन केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार, दोनों नहीं चाहती हैं कि देश का किसान मजबूत हो और उसके दुखों को अंत हो।

म.ए.ल. : उपज की सुनिश्चित खरीदी और लागत का डेढ़ गुना दाम, इन मांगों को लेकर किसान लंबी लड़ाई करते आ रहे हैं। इस विषय पर आपके क्या विचार हैं?

वि.प. : केन्द्र सरकार न्यूनतम समर्थन (एम.एस.पी.) मूल्य को निर्धारित करती है। कृषि लागत और मूल्य आयोग (सी.ए.सी.पी.) में सरकार से किसानों ने उपज के मूल्य को निर्धारित करने में विसंगतियों के बारे में बात उठाई है। एम.एस.पी. कम्प्यूटर निर्धारित फार्मूला पर तय किया जाता है। पूरे भारत में ज़मीनों को एक ही नियम के अनुसार कम्प्यूटर में फीड किया गया है। जैसे कि, यह माना गया है कि हर खेत पर समान मात्रा में यूरिया डलेगा और सब जगह नदी का पानी उपलब्ध होगा। कम्प्यूटर यह नहीं देखता है कि कई खेतों में ट्यूबवेल से पानी लगता है, जहां नहर या पानी की कोई और उचित व्यवस्था नहीं है। इसलिए डीजल की लागत को एम.एस.पी. निर्धारित करने में नहीं गिना जाता है।

दूसरी बड़ी समस्या है कि एम.एस.पी. निर्धारित करने में भूमि का किराया नहीं शामिल किया जाता है। आप पाएंगे कि हिन्दोस्तान में अधिकांश जगहों पर भूमि को ठेके पर देने की चलन है। भूमि मालिक को भूमिहार किसान किराया देता है। उसके बाद, वह फ़सल को लेता है। उदाहरण के लिए एक छोटा व्यापारी कोई दुकान लेकर बैठता है तो वह अपनी दुकान का किराया भी अपनी लागत में जोड़ता है। सरकार और सी.ए.सी.पी. भूमि का किराया और परिवार के श्रम को एम.एस.पी. निर्धारित करने में मान्यता नहीं देते। कम्प्यूटर ने गेहूं की लागत निकाल दी 1150 रुपए प्रति क्विंटल। अनुमान लगाया गया कि दो खाद के कट्टे डले, उसकी क़ीमत लगाई गयी, फिर यह मान लिया गया कि नदी का पानी मिल रहा है, जिसके लिए न बिजली खर्च हो रही है और न ही डीजल। भूमि का एक स्टेंडर्ड बना दिया गया है। माना जाता है कि मैदानी भूमि है यानी श्रम भी कम लगेगा, इसलिए श्रम की कीमत को भी कम रखा जाता है।

तीसरी बात यह है कि प्रशासक किसान को मज़दूर की श्रेणी में नहीं मानते हैं। जैसे कि मज़दूर की न्यूनतम मज़दूरी का एक कानून होता है। किसान का एक ही व्यवसाय है। वह किसानी के अलावा, कोई अन्य कार्य नहीं कर रहा है। जब तक उसकी मज़दूरी, उसकी फ़सल की क़ीमत में नहीं जोड़ी जाएगी, तब तक क़ीमत चाहे डेढ़ गुना तय हो या दो गुना, यह किसान के साथ नाइंसाफी है।  क़ीमत के आंकड़े किसान के साथ बेइमानी हैं। सरकार के मंत्री बहुत ही बेशर्मी से बोलते हैं कि हमने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया है। देश के सभी किसान संगठनों ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार गेहूं की लागत का मूल्य 2600 रुपये प्रति क्विंटल निकाला है। जब सरकार डेढ़ गुणा देने की बात करती है तो गेहूं का मूल्य लगभग 4000 रुपए प्रति क्विंटल बनता है।

एक और बात, कृषि क्षेत्र में बाज़ार व्यवस्था प्रचलित होने से पहले, किसान की हालत इतनी बुरी नहीं थी जितनी आज है। उस समय मुद्रा से व्यापार नहीं होता था। आनाज के बदले दूसरे सामान लेकर होता था। जब से बाज़ारीकरण हो गया तब से मुद्रा, व्यवसाय और नौकरी, सभी के अंदर महंगाई दर बढ़ती रही है। लेकिन कृषि उत्पादों की क़ीमतों में वृद्धि को महंगाई दर में शामिल नहीं किया गया और उनकी क़ीमतें महंगाई दर के अनुसार बढ़ाई नहीं गईं। 70 के दशक में कृषि के लिये बीज, डीजल खरीदना नहीं पड़ता था। ये चीजें सरकार से नियंत्रित दामों पर मिल जाती हैं। अब सरकार हमें यह सब नियंत्रित दाम पर उपलब्ध कराने की ज़िम्मदारी नहीं लेती है। अब हमारा लागत का खर्च बढ़ गया है। लेकिन महंगाई की दर से अनाजों की क़ीमतें न बढ़ाने के कारण किसान बहुत पीछे चला गया है।

आज किसान कर्ज़ा लेकर अपने जीवन को किसी प्रकार धक्का देकर चलाने में लगा हुआ है। सरकार के खुद के आंकड़े बताते हैं कि प्रत्येक किसान परिवार की आय 3400 रुपये मासिक है। यह आय ग़रीबी रेखा की आय से भी नीचे आती है। 3400 रुपये में, किसान अपने बच्चों को कैसे पालेगा, पढ़ायेगा और कैसे अच्छी स्वास्थ्य सुविधायें देगा? वह बदहाली से तंग आकर आत्महत्या करेगा, बैंक या साहूकारों के पास अपनी ज़मीन गिरवी रखेगा। अगर 1970 के बाद निरंतर फ़सलों के दाम निधार्रित किये जाते तो आज हमें डेढ़ गुना मांगने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। सरकार की कृषि नीति शुरू से ही ठीक नहीं थी। और अब, साल दर साल, कृषि क्षेत्र में देशी-विदेशी बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों के ज्यादा से ज्यादा हद तक घुसने की वजह से, हर साल 3-4 प्रतिशत लोगों को खेती से मज़दूरी की तरफ धकेला जाता है।

म.ए.ल. : कृषि व्यापार में बड़ी-बड़ी इजारेदार पूंजी कंपनियां शामिल हो रही हैं। वे सीधे तौर पर उपज खरीदेंगी और दाम तय करेंगी। इस हालत में छोटे और मंझोले किसानों का क्या होगा?

वि.प. : देश में अधिकतम मंझोला और सीमांत किसान ही रह गया है। देश के 90 प्रतिशत किसानों के पास लगभग डेढ़ एकड़ ज़मीन है, यानी वह किसान छोटा और सीमांत किसान ही है। बड़ी कंपनियों का मुक़ाबला वही कर पायेगा जिसके पास भंडारण की क्षमता है। जिसके पास 6 महीने तक परिवार को चलाने की क्षमता है। छोटे और मंझोले किसान पर कर्ज़ का भार इतना होगा कि वह बड़ी कंपनियों से सौदा करने की हालत में नहीं होगा।

शुरू के सालों में बड़ी-बड़ी निजी कंपनियां किसानों को सरकारी दाम से थोड़ा ज्यादा दाम देंगी। ताकि जो छोटे व्यापारी पहले किसानों की फ़सल खरीदते हैं, उनको बाज़़ार से बाहर कर दिया जाए। टेलिकॉम सेक्टर को देखिये। शुरू में, टेलीकाम सेक्टर में लगभग 20 कंपनियां थीं। रेट घटते गए। अब सिर्फ तीन कंपनियां हैं – एयरटेल, जियो और वोडफोन-आइडिया। मनमर्जी से रेट तय कर रही हैं। सरकार खुद चाहती है कि कृषि पर उसका नियंत्रण खत्म हो। जब कोई कानून नहीं रहेगा, तो निश्चित तौर पर लूट को बढ़ावा दिया जाएगा। एक वक्त पर किसान अपनी भूमि इन बड़ी कंपनियों को देने के लिए मजबूर हो जायेंगे।

म.ए.ल. : किसान कर्ज़ माफ़ी को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। इसके बारे में आप क्या सोचते हैं?

वि.प. : हम कर्ज़ माफ़ी नहीं, बल्कि कर्ज-मुक्ति चाहते हैं। माफ़ी और मुक्ति में बहुत बड़ा अंतर है। हम स्वामीनाथन आयोग की बात करें। आयोग की रिपोर्ट 2005 में आई। 2005 से 2020 तक स्वामीनाथन आयोग के अनुसार हमें जो दाम मिलने चाहिये थे और जो दाम हमें मिला, उन दोनों में 75 लाख करोड़ रुपये का अंतर आता है। पूरे देश में किसानों पर लगभग 11.5 लाख करोड़ रुपये का कर्ज़ है। इसमें 3 लाख करोड़ रुपये तो इन कारपारेट घरानों का कर्ज़ा है। यानि 7 से 7.5 लाख करोड़ रुपये के कर्ज़ से देश के सभी सीमांत किसान कर्ज- मुक्त हो सकते हैं। दरअसल, किसानों को लूटा गया है।

हम सरकार से कह रहे हैं कि हमें आपसे पैसा नहीं चाहिए, आप सिर्फ हमारा पैसा, जो हमसे लूटा है, वह हमें वापस कर दीजिये। सरकार ने किसानों का कल्याण करने के तथाकथित उद्देश्य से स्वामीनाथन आयोग बनाया था। स्वामीनाथन आयोग को न तो कांग्रेस की सरकार ने लागू किया और न ही भाजपा की सरकार ने। 2005 में किसान को फ़सल का जो भाव मिलना चाहिए था, वह आज 2020 तक नहीं मिल पाया है। इन बीते सालों में छमाही फ़सलों की बात हम करें, यानी लगभग 28 फ़सलों के भाव में हमारे साथ ठगी हुई। बीते 14 सालों में हमारी आर्थिक स्थिति गिरती रही है। खाद, डीजल, ट्रेक्टर का भाव लगातार बढ़ता रहा है। सरकार की गलत नीति के चलते किसान कर्ज़ में डूब गया है। अगर सरकार की नीतियां उचित होतीं तो किसान कर्ज़ से बिल्कुल नहीं मरता। कर्ज़-मुक्ति पर किसान का पूरा हक़ है।

म.ए.ल. : हमारा देश कृषि प्रधान देश है। देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का बहुत बड़ा योगदान है। अगर हम कृषि को मौजूदा संकट से निकालना चाहते हैं, हम किसानों को एक खुशहाल जीवन देना चाहते हैं, तो आप के अनुसार आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?

वि.प. : लोग मानते हैं कि देश के अन्दर आज़ादी से पहले 84 प्रतिशत आबादी किसान थी। आज सरकार किसानों की आबादी को 58 प्रतिशत बताती है। जी.डी.पी. में अब हम 12 प्रतिशत पर हो गए, जबकि 1947 में हम 85 प्रतिशत पर थे। 1947 के बाद जितने भी बजट पेश हुए हैं, उनमें कृषि के लिए, यानी 58 प्रतिशत लोगों के लिए मात्र 2.5 प्रतिशत बजट दिया गया है, तो यह क्षेत्र कैसे तरक्की करेगा? दूसरी तरफ कॉर्पोरेट घरानों का बजट बढ़ाते-बढ़ाते, 2020 के बजट में देश का 22 प्रतिशत पैसा उन्हें दिया जा रहा है।

हमारा देश कृषि प्रधान है। हमारी धरती उपजाऊ रहे, इसके लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को कृषि की ढांचागत सुविधाओं को सुधारने के लिए किसान का बजट अलग से बनाना चाहिए। उसी प्रकार, कृषि पर निर्भर आबादी के अनुसार अलग से बजट होना चाहिए। हमारी राय है कि बजट का 50 प्रतिशत धन ज़रूरी सुविधाओं जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, परिवहन इत्यादि और बाकी 50 प्रतिशत में से, 34 प्रतिशत बजट कृषि पर लागू होना चाहिए। जब कृषि पर यह 34 प्रतिशत बजट लागू होगा, तभी आप किसानों के लिए वेयरहाउस बना सकेंगे। सब्जियों के भाव, जैसे टमाटर का भाव आज 60 रुपए है, लेकिन किसानों ने 1 रुपये किलो में बेचा है, क्योंकि उसके पास स्टोरेज नहीं है। सरकार को सामुदायिक कृषि को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे कृषि में सुधार आएगा, जैसा कि उदाहरण के लिए पोलैंड में किया जाता है।

सरकार दावा करती है कि हम किसानों की आमदनी दो गुनी कर देंगे। आप कैसे 2.5 प्रतिशत बजट से 58 प्रतिशत लोगों की आमदनी दुगनी कर देंगे। यह बिल्कुल असंभव है।

आज हम किसान न्यूनतम आय की मांग भी उठा रहे हैं। इसके पीछे एक तर्क यह है कि किसान जो कुछ भी पैदा कर रहा है वह चाहे, सब्जी हो, आनाज हो, दाल या तिल हो, वह सिर्फ खुद के लिए पैदा नहीं कर रहा है। वह देश के लिए पैदा कर रहा है। देश का कोई आदमी भूखा न सोए इसलिए वह पैदा कर रहा है। जिस प्रकार सीमाओं पर सैनिक देश का रक्षक है, वैसे ही किसान देश के भोजन का रक्षक है। हम सरकार की नियुक्ति के बिना सरकारी कर्मचारी हैं। सरकार यह सुनिश्चित करे, कि चाहे वह किसान का परिवार है या मज़दूर का उसे एक न्यूनतम आय मिले, ताकि वह एक अच्छा जीवन जी सके। अपने बच्चों को पढ़ा सके। स्वास्थ्य सेवा का लाभ ले सके। मूलभूत सुविधाएं सभी मज़दूरों-किसानों को मिल सकें। इसके लिए किसानों को मज़दूरों के साथ मिलकर संघर्ष करना होगा।

म.ए.ल. : इस सारी जानकारी के लिए हम आपके आभारी हैं। कृषि क्षेत्र को निजीकरण और तबाही से बचाने के लिए संघर्ष में हम आपके साथ, कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं।

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