अपने अधिकारों पर हमलों को रोकने के लिए संगठित हों!

सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल बनाएं!

मज़दूर एकता कमेटी का बयान, 18 नवंबर, 2020

साथियों,

26 नवंबर को पूरे देश में करोड़ों-करोड़ों मज़दूर हड़ताल करेंगे। यह हड़ताल मज़दूरों के अधिकारों पर सब तरफा हमलों के खिलाफ ख़िलाफ़ और निजीकरण कार्यक्रम के ख़िलाफ़ है।

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नोटबंदी की चौथी वर्षगांठ

सरकार नोटबंदी के असली इरादे  में बारें में झूठ बोलती आ रही है। वह कभी भी इस बात को स्वीकार नहीं करेगी कि नोटबंदी का असली इरादे  सबसे बड़े देशी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाना था, और जिसकी कीमत मज़दूरों, किसानों, और देश के अन्य मेहनतकश लोगों से वसूली गयी।

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कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस समाज की संपत्ति है

कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस मूल्यवान गैर-नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन हैं। वे सभी पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल पदार्थों के उत्पादन में उपयोग किए जाने वाले कच्चे माल हैं। समाज की सामाजिक और आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उनकी बहुत सीमित उपलब्धता के कारण हमारे देश में उनका नियोजित उपयोग करना विशेष रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण है।

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अक्टूबर क्रांति की 103 वीं वर्षगांठ :

श्रमजीवी क्रांति आज वक्त की जरूरत है 7 नवंबर 1917 को रूस के मज़दूर वर्ग ने अपने देश में राजनीतिक सत्ता पर कब्जा किया। इस घटना से पूरी दुनिया हिल उठी। इस श्रमजीवी क्रांति से दुनिया भर के पूंजीपतियों के दिलों में दहशत फैल गयी। लेकिन इस क्रांति ने दुनियाभर के तमाम मज़दूरों और दबे कुचले लोगों को प्ररित किया

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चार महीनों से वेतन का भुगतान न किये जाने के ख़िलाफ़ दिल्ली नगर निगम की नर्सों का विरोध प्रदर्शन

एक गैर-ज़िम्मेदार मज़दूर-विरोधी व्यवस्था

उत्तरी दिल्ली नगर निगम द्वारा संचालित चार अस्पतालों – कस्तूरबा गांधी अस्पताल, हिंदू राव अस्पताल, गिरधारी लाल मातृत्व अस्पताल और राजन बाबू टी.बी. अस्पताल में काम करने वाली सैकड़ों नर्सों ने 2 नवंबर, 2020 को अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी। नर्सों ने पिछले चार महीनों के अपने बकाया वेतन का भुगतान करने की मांग उत्तरी दिल्ली नगर निगम से की है।

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संयुक्त राष्ट्र संघ की 75वीं वर्षगांठ :

भाग-3: संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के बाद से प्रमुख घटनाक्रम

सोवियत संघ और समाजवादी खेमे की यह आशंका कि अमरीका और अन्य साम्राज्यवादी शक्तियां संयुक्त राष्ट्र संघ को अपने हित में इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगी, यह बहुत पहले ही सही साबित हो गया।

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संयुक्त राष्ट्र संघ की 75वीं वर्षगांठ :

भाग-4 : संयुक्त राष्ट्र के लिए आगे का रास्ता क्या है?

इस समय, संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों के बीच सुधार के लिए एक व्यापक और बढ़ती मांग नज़र आ रही है। इन सभी सदस्य देशों को यह गवारा नहीं है कि दुनिया में युद्ध और शांति से संबंधित सवालों पर संयुक्त राष्ट्र में सिर्फ पांच देशों के हाथों में वीटो की प्रथा को जारी रखा गया है। यह सब विशेष रूप से इसलिए नहीं किया जा सकता है, क्योंकि अमरीकी साम्राज्यवाद सहित यह वे ही शक्तियां हैं, जो दुनियाभर में अधिकांश टकराव और बढ़ते तनावों के लिए ज़िम्मेदार हैं। अपने स्वयं के स्वार्थ को बरकरार रखने के लिए, ये शक्तियां संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो शक्ति के साथ स्थायी सदस्यों की संख्या में किसी भी बदलाव का पूरी तरह से विरोध करती हैं या केवल अपने सहयोगियों या समर्थकों में से कुछ देशों को शामिल करने के लिए राज़ी हैं।

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26 नवंबर की देश-व्यापी हड़ताल के लिए ज़ोरदार तैयारियां

7 नवंबर को दिल्ली की अलग-अलग ट्रेड यूनियनों व फेडरेशनों के बैनर तले सैकड़ों मज़दूरों ने शहीदी पार्क से लेकर दिल्ली सचिवालय तक जुलूस निकाला। इसके आयोजक संगठन थे – एटक, सीटू, ए.आई.सी.सी.टी.यू., एच.एम.एस., मज़दूर एकता कमेटी, ए.आई.यू.टी.यू.सी., यू.टी.यू.सी., आई.सी.टी.यू., सेवा और एल.पी.एफ.।

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संयुक्त राष्ट्र संघ की 75वीं वर्षगांठ :

सभी राज्यों की स्वतंत्रता, संप्रभुता और समानता के आधार पर ही विश्व शांति सुनिश्चित की जा सकती है

इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ (यू.एन.) की स्थापना की 75वीं वर्षगांठ है। 24 अक्तूबर, 1945 को, संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर को उस समय के अधिकांश राज्यों द्वारा अनुमोदित किया गया था और तब संयुक्त राष्ट्र संघ आधिकारिक तौर पर अस्तित्व में आया था।

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संयुक्त राष्ट्र संघ की 75 वीं वर्षगांठ :

भाग-2 : संयुक्त राष्ट्र संघ क्यों और कैसे बनाया गया?

विश्व शांति को बनाए रखने के लिए समर्पित एक विश्व निकाय के विचार का जन्म प्रथम विश्व युद्ध से शुरू हुआ था। लीग ऑफ नेशन का गठन 1920 में 42 संस्थापक सदस्यों के साथ किया गया था। अपने 26 साल के लंबे इतिहास में लीग ऑफ नेशन ने किसी भी समय 50 से अधिक राज्यों को शामिल नहीं किया। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संगठन उस समय में हुए हमलों के ख़िलाफ़ कोई सार्थक कार्रवाई करने या उनको रोकने में पूरी तरह से विफल रहा। इसकी स्थापना के बीस साल से भी कम समय में ही, दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत, लीग ऑफ नेशन की विफलता और पतन को दर्शाता है, हालांकि औपचारिक रूप से इसकी समाप्ति 1946 में हुई थी।

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