बैंकिंग व्यवस्था की समस्या का समाधान क्या है?

हमारे देश के बैंकों की समस्या बद से बदतर होती जा रही है और यह गहरी चिंता का विषय है। इस चिंता का स्रोत है पूंजीपतियों द्वारा बैंकों के कर्ज़ों को वापस न करने से पैदा हुआ संकट है, जिसका बोझ लोगों के कंधों पर डाला जा रहा है। पिछले 7 वर्षों में सार्वजनिक बैंकों ने कर्ज़दार पूंजीपतियों के कुल

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द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 75वीं वर्षगांठ पर

भाग 6 : द्वितीय विश्व युद्ध के सबक

इस समय द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 75वीं वर्षगांठ पर हमें कौन से मुख्य सबक लेने चाहिएं?

20वीं सदी के दोनों विश्व युद्ध दुनियाभर के बाज़ारों, संसाधनों और प्रभाव क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए साम्राज्यवादी ताक़तों के बीच तीव्र अंतर्विरोधों की वजह से हुए थे। साम्राज्यवादी ताक़तों ने अपनी लालच और मुनाफ़ों की चाहत के लिए, अपने तथा अन्य देशों के लोगों का इस्तेमाल कर युद्ध में उनकी बलि चढाई।

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द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 75वीं वर्षगांठ पर

भाग 5: युद्ध का अंत और विभिन्न देशों और लोगों के उद्देश्य

दूसरे विश्व युद्ध के अंत में, समाजवादी सोवियत संघ विजयी शक्तियों में से एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरा। वह दुनियाभर के उन सभी लोगों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत बन गया जो अपने देश को उपनिवेशवादी गुलामी से मुक्त करने के लिए लड़ रहे थे। दूसरी ओर अमरीकी साम्राज्यवाद एक प्रतिक्रियावादी, कम्युनिस्ट-विरोधी, साम्राज्यवादी खेमे के नेता के रूप में उभरकर सामने आया।

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कृषि अध्यादेशों के खि़लाफ़ उठे हरियाणा के किसान

10 सितम्बर, 2020 को हरियाणा के किसानों ने केन्द्र सरकार द्वारा हाल ही में पारित, कृषि क्षेत्र से संबंधित तीन अध्यादेशों का विरोध करने के लिए कुरुक्षेत्र में ‘किसान बचाओ, मंडी बचाओ’ के नारे के तहत महारैली की। इस महारैली को भारतीय किसान यूनियन सहित हरियाणा के 17 किसान संगठनों ने संयुक्त रूप से आयोजित किया था। इस महारैली में

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भाग 4 : द्वितीय विश्व युद्ध की प्रमुख लड़ाइयां

द्वितीय विश्व युद्ध में स्तालिनग्राद की लड़ाई सबसे निर्णायक मोड़ थी। स्तालिनग्राद के लोगों ने हर गली, हर घर और अपने शहर की एक-एक इंच ज़मीन को बचाने के लिए जंग लड़ी। कई महीनों तक चली इस बेहद कठिन जंग में जर्मन सेना की हार हुई, जिसे अभी तक अजेय माना जा रहा था। जर्मनी की सेना पूरी तरह से नष्ट हो गयी और आत्मसमर्पण के लिए मजबूर हो गयी।

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भाग 3 : द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले प्रमुख साम्राज्यवादी शक्तियों तथा सोवियत संघ की रणनीति

दुनियाभर के बाज़ारों और प्रभाव क्षेत्रों के पुनः बंटवारे के लिए नए साम्राज्यवादी युद्ध की शुरुआत 1930 में हो गयी थी। ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी को सोवियत संघ के ख़िलाफ़, जापान को चीन और सोवियत संघ के ख़िलाफ़ भड़काने की सोची-समझी नीति चलायी, ताकि ये सभी देश आपसी टकराव के चलते कमजोर हो जाएं। ऐसा करते हुए ब्रिटेन और फ्रांस जंग में कुछ देर बाद शामिल होने और विजेता बनकर उभरने की योजना बना रहे थे। अमरीका की रणनीति हालातों पर निगाह रखने और बाद में जंग में उतरने की थी ताकि अन्य साम्राज्यवादी ताक़तों के थक जाने के बाद वह स्पष्ट रूप से सबसे शक्तिशाली देश की तरह उभर कर आये।

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हमारे पाठकों से : आज़ादी के 73 साल बाद

3 सितम्बर को प्रकाषित लेख “आज़ादी के 73 साल बाद शोषण और दमन से मुक्त हिन्दोस्तान के लिए संघर्ष जारी है” में बहुत ही स्पष्ट रूप से बताया गया है कि कैसे दो धाराओं के बीच टकराव आज भी बरकरार है। और यह टकराव कोई नई बात नहीं हैं। तथाकथित आज़ादी के पहले और आज तक शासक वर्ग ने समझौते के रास्ते को अपनाया जो कि निजी स्वार्थ और मुनाफे की ओर जाता है।

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अधिकारों की हिफ़ाज़त में संघर्ष

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भाग 2 : 20वीं सदी में दो विश्व युद्धों के लिए कौन और क्या ज़िम्मेदार था?

20वीं सदी में दो महायुद्धों के लिए दुनिया के पुनर्विभाजन के ज़रिये अपने प्रभाव क्षेत्रों का विस्तार करने की कोशिशों में लगी साम्राज्यवादी ताक़तें ज़िम्मेदार थीं।

20वीं शताब्दी की शुरुआत तक पूंजीवाद अपने आखिरी और अंतिम चरण के साम्राज्यवाद पर पहुंच चुका था। दुनिया की सबसे बड़ी पूंजीवादी शक्तियों ने विश्व के सभी महाद्वीपों को अपने उपनिवेशों या अपने प्रभाव क्षेत्रों में बाँट लिया था। इसके आगे विस्तार केवल तभी संभव था जब वे एक दूसरे के इलाकों को युद्ध के ज़रिये हड़प लें।

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